मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 296, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंवर्ग-संघर्ष २८१ विलासिताका ही कारण बनता है । विलासितासे क्षीणता, क्लीवताकी वृद्धि होती है । इससे सततियोंकी कमी होती है और दूसरे कुलोंसे दत्तक लाये जाते हैं । यदि दत्तक हीन कुलसे आये तो उनमें विलासिता, अनाचार एव अनुदारताका और भी विस्तार होता है, और भी भीषण क्षीणता, क्लीवता घटती है, पुनश्च सततिकी हीनता बढती है । फलतः अधिकाधिक सम्पत्ति थोड़े से लोगोंके हाथमें रह जाती है । गरीबोंमें सम्पत्तिहीनता होते हुए भी संतानोंकी अधिकता होती है । इस तरह धनवान् निःसंतान और धनहीन बहुसंतान होने लगते हैं । दोनों जगह सदाचारकी कमी होनेसे धनवान्में अनाचार बढ़ते हैं, शोषण उत्पीड़नका विस्तार बढता है, धनहीनोंमें ईर्ष्या बढ़ती है, फलतः सघर्ष होता है । धनहीनोंका बहुमत शासन एव शासकोंका खात्मा कर देता है । बहुमतमे भी मुण्डगणनाकी ही प्रधानता रहती है । बहुमत शासनमें भी अल्पधन बहुधनवाले लोगोंका अस्तित्व रहता है । धनके आधारपर भी बहुमत बनाया जाता है । कभी-कभी बहुमतका अल्प मतपर अत्याचार होने लगता है । उसी समय धनवान् निर्धनका विरोध बढ़ जाता है । धनवानोंको शुद्ध शोषक मानकर उनके वोटोंका महत्त्व हटा दिया जाता है, फिर आर्थिक समानताके नामपर साम्यवाद स्थापित होता है । थोड़े दिनोंतक उसमें रुचि बढ़ती है, पर आगे चलकर व्यवस्थाकी दृष्टिसे वहाँ भी कुछ लोगोंका ही शासन-तन्त्रपर नियन्त्रण हो जाता है । व्यक्ति शासन-यन्त्रके नगण्य कल पुर्जे बन जाते हैं, शासन-यन्त्र मुट्ठीभर तानाशाहोंके हाथका खिलौना बन जाता है, साम्यवादी साथियोंमें ही फूट और शासक-शोषणकी भावना जग उठती है, इस तरह साम्यवाद अधिनायकवाद ही बन जाता है । शास्त्र, धर्म आदिका नियन्त्रण न होनेसे उच्छृङ्खलता बढ़ती है और फिर लोगोंकी धर्मनियन्त्रित शासन- तन्त्रकी पूरी प्रवृत्ति हो जाती है । इस तरह शासन-तन्त्रोंमें भी चक्रवत् परिवर्तन चलता रहता है । सुतरा धर्मनियन्त्रित होनेसे ही वर्ग कलहका अन्त होता है। वास्तविक सभ्यताके विकासकी बात भी तभी चल सकती है । इस प्रकार तथाकथित भौतिकवाद न सही, किंतु मूल भौतिक समस्त वस्तु अभौतिक चेतन वस्तुरूप प्रतिपत्तिका उपाय है। अतः भूतोंका पर्यवसान भी अभौतिक तन्त्रमें ही है । मनुष्य 'स्वय चेतन नहीं है, भूतोंका परिणाम है । यदि अचेतनमे भिन्न कोई स्वतन्त्र चेतन है तो उसकी 'प्रकृति पराधीनता, कष्ट भोगना या पाशविकतासे छुटकारा पानेके सग्राम' आदिका कुछ अर्थ ही नहीं है । जल- कणों या जलप्रपातो एव पाषाणोंके सघर्ष-जैसे ही मनुष्यके प्राकृतिक सघर्ष हैं । उससे किसी अभीप्सित पदार्थकी सिद्धि आदिकी बात नहीं उठती । अतएव वर्ग-कलह, वर्ग-सघर्ष, सामूहिक दलबंदी, दलविशेषके विजय आदिकी कहानी