भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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२८० मार्क्सवाद और रामराज्य यह भी कहा जाता है कि ‘मनुष्यने हजारों वर्षतक प्रकृतिकी निष्ठुर पराधीनतामें रहकर कष्ट भोगा । पाशविक दशासे छुटकारा पानेके लिये संग्राम किया । हजारो वर्षोंतक समाजकी स्थापनाके लिये उद्योग किया और बहुत विकास भी प्राप्त किया, फिर भी उसे न्याय तथा मानवीय अधिकारोंकी प्राप्ति न हुई ।’ कहते हैं—‘सामाजिक वर्गों और वर्गकलहका सिद्धान्त मार्क्सने आविष्कृत किया है । यद्यपि उससे पहले भी वर्ग-कलहका अस्तित्व देखा और समझा जा रहा था, तथापि श्रमजीवी दल पहले नगण्य था, अतः ऐतिहासिक महत्त्व प्राप्त न था ।’ पर वस्तुस्थिति यह है कि धर्मनियन्त्रित पूँजीपति एवं समाज राष्ट्रके विकास एवं कल्याणके कारण हैं । शास्त्र तथा धर्म-निरपेक्ष उच्छृङ्खल पूँजीवाद शोषणका कारण होता है । पूँजी स्वतः निन्द्य नहीं है, मालिकोंकी अच्छाई- बुराईसे पूँजीमें अच्छाई-बुराईका व्यवहार होता है । साम्यवादमे भी जनता नहीं तो सरकारको पूँजीपति बनना ही पड़ता है । उसके बिना कोई भी विकास- योजना, संग्राम, शस्त्रास्त्र सफल नहीं हो सकता । सामान्यरूपसे सरकारी भूमि, सम्पत्ति, उद्योग-धंधे या पूँजीका कोई मनमानी उद्योग नहीं कर सकता । परंतु बाढ़, भूकम्प, दुष्काल आदि विपत्तियोंके समय सरकारी पूँजी आदिका उद्योग जनहितके काममें हो सकता है । उसी तरह व्यक्तिगत भूमि, सम्पत्ति, पूँजी भी रहनेमें कोई अहित नहीं । जैसे सरकारी खजानेकी पूँजी राष्ट्रकी है, वैसे ही व्यक्तिगत खजानेकी पूँजी भी राष्ट्रकी समझी जा सकती है; क्योंकि अवसरपर राष्ट्रके काममें उसका उपयोग किया जा सकता है । आज भी युद्धकाल अथवा असाधारण राष्ट्र-विप्लवमें सरकारोंका अधिकार होता है कि वे व्यक्तिगत सम्पत्ति, मोटर, मकान आदिको राष्ट्रहितकी दृष्टिसे अपने कब्जेमें ले ले । पूँजीके दुरुपयोग या अपव्ययपर सरकार कभी भी प्रतिबन्ध लगा सकती है । भेद यही रहता है कि जहाँ सरकारी वस्तुओंमें साधारण ममत्व होता है और सेवक नामधारी नौकरोंद्वारा लापरवाही, दुरुपयोग, लोहाकाण्ड, जीपकाण्डके समान भ्रष्टाचार होता है । व्यक्तिगत वस्तुओंमें व्यक्तिको प्राणतुल्य ममता होती है, लापरवाही दुरुपयोगकी भावना नगण्य होती है । हाँ, मूलधन आदिसे होनेवाली आमदनी विशेषतया अतिरिक्त आयपर शुक्रके अनुसार पूर्वोक्त पञ्चधा विभागका नियम होना अनिवार्य है । वस्तुतः शास्त्रीय उचित व्यवस्था-पालनमें प्रमाद होनेसे ही अनेक अनर्थ बढ़ते हैं । प्रायः शास्त्र, सज्जन, समाजकी उपेक्षासे सदाचार, संयम, नीति-नैपुण्य आदि सद्गुणोंका विनाश होता है । ऐसी हालतमें धन केवल