भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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काम ठप करके, पूँजीपतिको भी ज्यादा दाम देनेके लिये लाचार कर देते हैं। इतना ही क्यों ? सभी कुछ छीनकर उसे समाप्त भी कर डालते हैं। कुछ ऐश्वर्यमदोन्मत्त धनिकोंके प्रमादसे, कुछ उनके विरुद्ध किये गये अनुचित प्रचारसे ऐसा वातावरण बन जाता है कि निरपराध, शिष्ट, परोपकारी, धनवान्को भी अपमानित होना पड़ता है और कभी शिष्ट ईमानदार मजदूरको भी अत्याचारका शिकार बनना पड़ता है। सड़कोपर कभी रिक्सा या ताँगासे जब मोटरकारका एक्सीडेण्ट हो जाता है तो भले ही अपराध रिक्सेवालेका ही हो, फिर भी साधारण जनसमूह मोटरवालेको ही अपराधी ठहराता है। वस्तुतः दूकानदार एवं खरीदार-जैसा ही मजदूर तथा मालिकोका संघर्ष है। जब देहाती किसानोको टैक्स देने तथा वस्त्रादि आवश्यक वस्तु प्राप्त करनेके लिये रुपयोंकी अत्यधिक अपेक्षा होती है, तब उन्हे अपने गाढ़े पसीनेकी कमाईका गेहूँ, चावल, कपास, गन्ना आदि अल्प मूल्यमें ही देनेके लिये लाचार होना पड़ता है। परन्तु जब कभी उन्हे बेचनेकी आवश्यकता नहीं होती, तो वे अपनी वस्तुओका मनमाना दाम बढ़ा देते हैं, और अभाववाले लोग ज्यादा-से-ज्यादा दाम देनेको लाचार होते हैं। असंतुलनके कारण संघर्षसे किसीका लाभ नहीं होता । मजदूर आन्दोलन करके ज्यादा दाम प्राप्त करता है तो मालिक वस्त्रादिपर ज्यादा दाम बढ़ा देता है। उसके लिये किसानोको ज्यादा दाम देना पड़ता है तो वे अपने अन्नका दाम बढ़ा देते हैं। फलतः मजदूरोने आन्दोलनो- द्वारा ज्यादा मजदूरी पायी, वह उधर अन्न, वस्त्र खरीदनेमें खतम हो गयी। इधर मध्य श्रेणीके लोगोंका जीवन अधिक संकटपूर्ण हो जाता है। यह कहा जा चुका है कि केवल प्रचारके बलपर निर्माण एवं विध्वंसकार्य होता रहता है। वर्ग- भेद—वर्गविद्वेष पैदा कर अवश्य वर्गविध्वंस किया जा सकता है, संसारमें दुराचार, व्यभिचार भी होता है, डाकुओके दल भी संघटित होते हैं, उनको कभी-कभी पर्याप्त सफलता भी मिल जाती है, परन्तु एतावता वह धर्म, सदाचार या सिद्धान्त नहीं बन सकता। पूर्वोक्त युक्तिसे पैदावारके साधनापर यदि लोगोके व्यक्तिगत अधिकार वैध हैं, तब उनका मिटाना या समाज या राष्ट्रके नामपर कुछ तानाशाहोके हाथमें उत्पादन साधनोका जाना कथमपि उचित नहीं कहा जा सकता। यह भी कहा जा चुका है कि केवल मजदूरोके कारण ही उत्पादन-वृद्धि नहीं होती, किंतु वैज्ञानिकों, नरेशों, पूँजीपतियों एवं प्राकृतिक साधनों, कच्चे माल इत्यादिकोको ही इसका मुख्य श्रेय है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश एवं सामयिक वृष्टि विविध प्रकारके लोहा, कोयला, तामा, सीसा, पारा तथा सर्वोपरि ईश्वर-निर्मित प्राकृत दिल, दिमाग, मस्तिष्क आदिका भी इन सब विकासोमें प्रमुख हाथ है। इनके बिना मजदूर कुछ भी नहीं कर सकते। यह मार्क्सवादी भी मानते ही हैं। पूँजीपतियोके