भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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वर्ग-संघर्ष २९१ कारण ही हजारों कल कारखानोंका बनना सम्भव हो सका । लाखों मजदूरोंको एकत्र रहकर संघटित होने एवं आन्दोलन करनेकी सुविधा प्राप्त हुई । अन्यथा देहातों, गाँवोंमें अपने खाने कमानेमें परेशान मजदूरोंके लिये यह कहाँ सम्भव था कि वे दूर- दूरसे चलकर लाखोंकी संख्यामें एकत्र हो सके । शास्त्रीय दृष्टिसे इसे उपजीव्य विरोध कहा जाता है । जैसे पितासे उत्पन्न पुत्र पिताका घातक नहीं हो सकता, वैसे ही पूँजीपतियोंके सहारे संघटित एवं बलवान् होनेवाले मजदूर पूँजीपतियोंकी सम्पत्ति छीनकर उन्हें नष्ट कर दें, यह कृतघ्नता समझी जाती है—'जेहि ते नीच बड़ाई पावा । सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा ॥' अग्निसे उत्पन्न धूम (मेघ) के द्वारा अग्निका नाश किया जाना ही इसका उदाहरण है—'धूम अनल संभव सुनु भाई । तेहि बुझाव घन पदवी पाई ॥' इसके अतिरिक्त जिस मजदूरवर्गने वेतन लेकर अपना श्रम बेच डाला, फिर उसे क्या अधिकार है कि वह उत्पादन-साधनों या उत्पन्न हुई वस्तुओपर अधिकार कर ले ? किसीने अपनी कोई चीज किसीके हाथ बेच दी, तो उसमें या उसके द्वारा प्राप्त फलमें उसका कोई भी अधिकार नहीं रहता । शास्त्रानुसार दक्षिणाके द्वारा क्रीत-ऋत्विजो- द्वारा होनेवाले यज्ञोंका फल यजमानको ही मिलता है, ऋत्विजोंको नहीं—'शास्त्रफलं प्रयोक्तरि तल्लक्षणत्वात्' (३।७।१८—३।८।५) इत्यादि पूर्व-मीमांसादर्शनमें यह स्पष्ट है। अवश्य ही ईश्वरके तुल्य जो भी अदृष्टोंद्वारा विश्व सृष्टिमें कारण है। अतः विश्वमें सभी प्राणियोंका हिस्सा है। इस दृष्टिसे न केवल मनुष्योंका ही अपितु प्राणिमात्र- का उसमें हिस्सा है। अतः सबको जीवित रहने, विकसित होनेका अधिकार है। अतएव किसीपर अन्याय, अत्याचार होना अनुचित है। पशु, पक्षी, वृक्ष आदिका भी अन्याय- पूर्ण संहार तथा शोषण पाप है । इस दृष्टिसे राज्यद्वारा एक सर्वसामान्य जीवन- स्तर निर्धारित होना आवश्यक होता है, जिसमें योग्यता, आवश्यकता तथा उत्पादनके अनुसार काम, दाम, आरामकी व्यवस्था की जाय और सभीको स्वस्थ, शिक्षित एवं विकसित होनेका अवसर मिले । इस दृष्टिसे मजदूरोंके भी वेतन का क्रम उचितरूपमें निर्धारित किया जाय । इस सम्बन्धमें न अत्यन्त समता ही लायी जा सकती है, न अत्यन्त विषमताका ही समर्थन किया जा सकता है। संतुलित समता, संतुलित विषमता ही मान्य हो सकती है। शरीरमें भी हाथ, पाँव, पेट, पीठ आदिमें तथा एक हाथकी ही अँगुलियोंमें भी मोटापन, पतलापन, लम्बाई-चौड़ाई आदि समान नहीं। कोई बड़ी, कोई छोटी, कोई मोटी, कोई पतली है, तथापि इनका एक संतुलन भी है। पेट बहुत मोटा हो जाय, हाथ-पैर दुबले हो जायँ तो शरीर स्वस्थ नहीं समझा जा सकता । निष्कर्ष यह है कि सामाजिक, आर्थिक संतुलन रहना बहुत आवश्यक है। इसी असंतुलनको दूर करनेके लिये भारतीय धर्मशास्त्रों, नीतिशास्त्रोंमें अनेक प्रकारके नियम हैं ।