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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 307

२६२ मार्क्सवाद और रामराज्य शास्त्रानुसार प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरेका मधु अर्थात् मोदहेतु माना गया है। पञ्च महायज्ञद्वारा विश्वका उपकारक बनता है। यज्ञसे देवताओका, ब्रह्मयज्ञसे ऋषियोका, भूतयज्ञसे कीट-पतंगों, पशु-पक्षियो, सभी प्राणियोका तर्पण किया जाता है, श्वान, काक, प्रेत, पिशाचादि सभी प्राणियोके तर्पणका प्रयत्न किया जाता है। अर्थात् मनुष्य केवल अपने लिये नहीं उत्पन्न हुआ है, किंतु सम्पूर्ण विश्वके तर्पणके लिये उसका जन्म है। भोजनकालमें जो भी भोजनार्थी आये, उसका नाम, गोत्र पूछे बिना उसे भोजन करानेका नियम है। रन्तिदेव आदि महापुरुषोंने ४८ दिनका निर्जल व्रत करनेके अनन्तर भी भोजन उपस्थित होनेपर नियमानुसार अतिथिकी प्रतीक्षा की। प्राप्त सत्तुक आदि सब कुछ ब्राह्मण, अन्त्यज आदिको प्रदान कर दिया था। जल पीनेके समय भी जब पुल्कसने आकर जल माँगा तो वह जल भी उसे दिया और प्राणान्त होते समय भी परमेश्वरसे यही प्रार्थना की कि 'प्रभो ! मुझे राज्य, स्वर्ग, अपवर्ग कुछ भी नहीं चाहिये, केवल दुखियोंका दुःख ही मुझे मिल जाय; जिससे वे सुखी हो जायें— न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम् । कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम् ॥ मन्वादिने भी यह नियम रखा है कि जिसके घरमें तीन वर्षोंके लिये भृत्यादि भरणकी सामग्री हो उसे सोमयज्ञ करके उसीमें अपना धन लगाना चाहिये । यस्य त्रैवार्षिकं भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये । अधिकं वापि विद्येत स सोमं पातुमर्हति ॥ (मनु० ११।७) विविध प्रकारके दानोका भी उद्देश्य असंतुलन मिटाना ही है। अतिरिक्त आयका पञ्चधा विभाजन करके राष्ट्रहितमें लगानेकी बात पीछे कही जा चुकी है। मनुने यह भी कहा है कि जो राजा असाधु पुरुषसे धन लेकर साधु-पुरुषोको प्रदान करता है, वह अपनेको नाव बनाकर उन दोनोको तार देता है— योऽसाधुभ्योऽर्थमादाय साधुभ्यः संप्रयच्छति । स कृत्वा प्लवमात्मानं संतारयति तावुभौ ॥ (मनु० ११।१९) इसी प्रकार अनुचित ढंगसे चोरबाजारी, चोरी, डाका, घूससे धनवान् बननेवाले असाधुओंसे धन छीनकर साधुओंको देना उचित है। ईमानदार धनवानोसे भी सहायता लेकर बिना रोजी-रोजगारवालोकी रोजीका प्रबन्ध करना राजाका कर्तव्य है। भूमिवालोंसे भी भूमि लेकर बेरोजगारी दूर की जा सकती है। हाँ, यह अवश्य है कि जिस कुँएसे पानी लिया जाय, उसको इस योग्य बनाये रक्खे कि वह आगे भी सहायता देने लायक रहे। किसी अगसे अस्थि या मासकी सहायता लेकर दूसरे अगकी आवश्यकता पूरी की जा सकती है, परंतु सहायक अंगको मिटा देना—नष्ट कर

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