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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

काम ठप करके, पूँजीपतिको भी ज्यादा दाम देनेके लिये लाचार कर देते हैं। इतना ही क्यों ? सभी कुछ छीनकर उसे समाप्त भी कर डालते हैं। कुछ ऐश्वर्यमदोन्मत्त धनिकोंके प्रमादसे, कुछ उनके विरुद्ध किये गये अनुचित प्रचारसे ऐसा वातावरण बन जाता है कि निरपराध, शिष्ट, परोपकारी, धनवान्को भी अपमानित होना पड़ता है और कभी शिष्ट ईमानदार मजदूरको भी अत्याचारका शिकार बनना पड़ता है। सड़कोपर कभी रिक्सा या ताँगासे जब मोटरकारका एक्सीडेण्ट हो जाता है तो भले ही अपराध रिक्सेवालेका ही हो, फिर भी साधारण जनसमूह मोटरवालेको ही अपराधी ठहराता है। वस्तुतः दूकानदार एवं खरीदार-जैसा ही मजदूर तथा मालिकोका संघर्ष है। जब देहाती किसानोको टैक्स देने तथा वस्त्रादि आवश्यक वस्तु प्राप्त करनेके लिये रुपयोंकी अत्यधिक अपेक्षा होती है, तब उन्हे अपने गाढ़े पसीनेकी कमाईका गेहूँ, चावल, कपास, गन्ना आदि अल्प मूल्यमें ही देनेके लिये लाचार होना पड़ता है। परन्तु जब कभी उन्हे बेचनेकी आवश्यकता नहीं होती, तो वे अपनी वस्तुओका मनमाना दाम बढ़ा देते हैं, और अभाववाले लोग ज्यादा-से-ज्यादा दाम देनेको लाचार होते हैं। असंतुलनके कारण संघर्षसे किसीका लाभ नहीं होता । मजदूर आन्दोलन करके ज्यादा दाम प्राप्त करता है तो मालिक वस्त्रादिपर ज्यादा दाम बढ़ा देता है। उसके लिये किसानोको ज्यादा दाम देना पड़ता है तो वे अपने अन्नका दाम बढ़ा देते हैं। फलतः मजदूरोने आन्दोलनो- द्वारा ज्यादा मजदूरी पायी, वह उधर अन्न, वस्त्र खरीदनेमें खतम हो गयी। इधर मध्य श्रेणीके लोगोंका जीवन अधिक संकटपूर्ण हो जाता है। यह कहा जा चुका है कि केवल प्रचारके बलपर निर्माण एवं विध्वंसकार्य होता रहता है। वर्ग- भेद—वर्गविद्वेष पैदा कर अवश्य वर्गविध्वंस किया जा सकता है, संसारमें दुराचार, व्यभिचार भी होता है, डाकुओके दल भी संघटित होते हैं, उनको कभी-कभी पर्याप्त सफलता भी मिल जाती है, परन्तु एतावता वह धर्म, सदाचार या सिद्धान्त नहीं बन सकता। पूर्वोक्त युक्तिसे पैदावारके साधनापर यदि लोगोके व्यक्तिगत अधिकार वैध हैं, तब उनका मिटाना या समाज या राष्ट्रके नामपर कुछ तानाशाहोके हाथमें उत्पादन साधनोका जाना कथमपि उचित नहीं कहा जा सकता। यह भी कहा जा चुका है कि केवल मजदूरोके कारण ही उत्पादन-वृद्धि नहीं होती, किंतु वैज्ञानिकों, नरेशों, पूँजीपतियों एवं प्राकृतिक साधनों, कच्चे माल इत्यादिकोको ही इसका मुख्य श्रेय है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश एवं सामयिक वृष्टि विविध प्रकारके लोहा, कोयला, तामा, सीसा, पारा तथा सर्वोपरि ईश्वर-निर्मित प्राकृत दिल, दिमाग, मस्तिष्क आदिका भी इन सब विकासोमें प्रमुख हाथ है। इनके बिना मजदूर कुछ भी नहीं कर सकते। यह मार्क्सवादी भी मानते ही हैं। पूँजीपतियोके

वर्ग-संघर्ष २९१ कारण ही हजारों कल कारखानोंका बनना सम्भव हो सका । लाखों मजदूरोंको एकत्र रहकर संघटित होने एवं आन्दोलन करनेकी सुविधा प्राप्त हुई । अन्यथा देहातों, गाँवोंमें अपने खाने कमानेमें परेशान मजदूरोंके लिये यह कहाँ सम्भव था कि वे दूर- दूरसे चलकर लाखोंकी संख्यामें एकत्र हो सके । शास्त्रीय दृष्टिसे इसे उपजीव्य विरोध कहा जाता है । जैसे पितासे उत्पन्न पुत्र पिताका घातक नहीं हो सकता, वैसे ही पूँजीपतियोंके सहारे संघटित एवं बलवान् होनेवाले मजदूर पूँजीपतियोंकी सम्पत्ति छीनकर उन्हें नष्ट कर दें, यह कृतघ्नता समझी जाती है—'जेहि ते नीच बड़ाई पावा । सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा ॥' अग्निसे उत्पन्न धूम (मेघ) के द्वारा अग्निका नाश किया जाना ही इसका उदाहरण है—'धूम अनल संभव सुनु भाई । तेहि बुझाव घन पदवी पाई ॥' इसके अतिरिक्त जिस मजदूरवर्गने वेतन लेकर अपना श्रम बेच डाला, फिर उसे क्या अधिकार है कि वह उत्पादन-साधनों या उत्पन्न हुई वस्तुओपर अधिकार कर ले ? किसीने अपनी कोई चीज किसीके हाथ बेच दी, तो उसमें या उसके द्वारा प्राप्त फलमें उसका कोई भी अधिकार नहीं रहता । शास्त्रानुसार दक्षिणाके द्वारा क्रीत-ऋत्विजो- द्वारा होनेवाले यज्ञोंका फल यजमानको ही मिलता है, ऋत्विजोंको नहीं—'शास्त्रफलं प्रयोक्तरि तल्लक्षणत्वात्' (३।७।१८—३।८।५) इत्यादि पूर्व-मीमांसादर्शनमें यह स्पष्ट है। अवश्य ही ईश्वरके तुल्य जो भी अदृष्टोंद्वारा विश्व सृष्टिमें कारण है। अतः विश्वमें सभी प्राणियोंका हिस्सा है। इस दृष्टिसे न केवल मनुष्योंका ही अपितु प्राणिमात्र- का उसमें हिस्सा है। अतः सबको जीवित रहने, विकसित होनेका अधिकार है। अतएव किसीपर अन्याय, अत्याचार होना अनुचित है। पशु, पक्षी, वृक्ष आदिका भी अन्याय- पूर्ण संहार तथा शोषण पाप है । इस दृष्टिसे राज्यद्वारा एक सर्वसामान्य जीवन- स्तर निर्धारित होना आवश्यक होता है, जिसमें योग्यता, आवश्यकता तथा उत्पादनके अनुसार काम, दाम, आरामकी व्यवस्था की जाय और सभीको स्वस्थ, शिक्षित एवं विकसित होनेका अवसर मिले । इस दृष्टिसे मजदूरोंके भी वेतन का क्रम उचितरूपमें निर्धारित किया जाय । इस सम्बन्धमें न अत्यन्त समता ही लायी जा सकती है, न अत्यन्त विषमताका ही समर्थन किया जा सकता है। संतुलित समता, संतुलित विषमता ही मान्य हो सकती है। शरीरमें भी हाथ, पाँव, पेट, पीठ आदिमें तथा एक हाथकी ही अँगुलियोंमें भी मोटापन, पतलापन, लम्बाई-चौड़ाई आदि समान नहीं। कोई बड़ी, कोई छोटी, कोई मोटी, कोई पतली है, तथापि इनका एक संतुलन भी है। पेट बहुत मोटा हो जाय, हाथ-पैर दुबले हो जायँ तो शरीर स्वस्थ नहीं समझा जा सकता । निष्कर्ष यह है कि सामाजिक, आर्थिक संतुलन रहना बहुत आवश्यक है। इसी असंतुलनको दूर करनेके लिये भारतीय धर्मशास्त्रों, नीतिशास्त्रोंमें अनेक प्रकारके नियम हैं ।

२६२ मार्क्सवाद और रामराज्य शास्त्रानुसार प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरेका मधु अर्थात् मोदहेतु माना गया है। पञ्च महायज्ञद्वारा विश्वका उपकारक बनता है। यज्ञसे देवताओका, ब्रह्मयज्ञसे ऋषियोका, भूतयज्ञसे कीट-पतंगों, पशु-पक्षियो, सभी प्राणियोका तर्पण किया जाता है, श्वान, काक, प्रेत, पिशाचादि सभी प्राणियोके तर्पणका प्रयत्न किया जाता है। अर्थात् मनुष्य केवल अपने लिये नहीं उत्पन्न हुआ है, किंतु सम्पूर्ण विश्वके तर्पणके लिये उसका जन्म है। भोजनकालमें जो भी भोजनार्थी आये, उसका नाम, गोत्र पूछे बिना उसे भोजन करानेका नियम है। रन्तिदेव आदि महापुरुषोंने ४८ दिनका निर्जल व्रत करनेके अनन्तर भी भोजन उपस्थित होनेपर नियमानुसार अतिथिकी प्रतीक्षा की। प्राप्त सत्तुक आदि सब कुछ ब्राह्मण, अन्त्यज आदिको प्रदान कर दिया था। जल पीनेके समय भी जब पुल्कसने आकर जल माँगा तो वह जल भी उसे दिया और प्राणान्त होते समय भी परमेश्वरसे यही प्रार्थना की कि 'प्रभो ! मुझे राज्य, स्वर्ग, अपवर्ग कुछ भी नहीं चाहिये, केवल दुखियोंका दुःख ही मुझे मिल जाय; जिससे वे सुखी हो जायें— न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम् । कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम् ॥ मन्वादिने भी यह नियम रखा है कि जिसके घरमें तीन वर्षोंके लिये भृत्यादि भरणकी सामग्री हो उसे सोमयज्ञ करके उसीमें अपना धन लगाना चाहिये । यस्य त्रैवार्षिकं भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये । अधिकं वापि विद्येत स सोमं पातुमर्हति ॥ (मनु० ११।७) विविध प्रकारके दानोका भी उद्देश्य असंतुलन मिटाना ही है। अतिरिक्त आयका पञ्चधा विभाजन करके राष्ट्रहितमें लगानेकी बात पीछे कही जा चुकी है। मनुने यह भी कहा है कि जो राजा असाधु पुरुषसे धन लेकर साधु-पुरुषोको प्रदान करता है, वह अपनेको नाव बनाकर उन दोनोको तार देता है— योऽसाधुभ्योऽर्थमादाय साधुभ्यः संप्रयच्छति । स कृत्वा प्लवमात्मानं संतारयति तावुभौ ॥ (मनु० ११।१९) इसी प्रकार अनुचित ढंगसे चोरबाजारी, चोरी, डाका, घूससे धनवान् बननेवाले असाधुओंसे धन छीनकर साधुओंको देना उचित है। ईमानदार धनवानोसे भी सहायता लेकर बिना रोजी-रोजगारवालोकी रोजीका प्रबन्ध करना राजाका कर्तव्य है। भूमिवालोंसे भी भूमि लेकर बेरोजगारी दूर की जा सकती है। हाँ, यह अवश्य है कि जिस कुँएसे पानी लिया जाय, उसको इस योग्य बनाये रक्खे कि वह आगे भी सहायता देने लायक रहे। किसी अगसे अस्थि या मासकी सहायता लेकर दूसरे अगकी आवश्यकता पूरी की जा सकती है, परंतु सहायक अंगको मिटा देना—नष्ट कर

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देना अनुचित है। उसे पुष्ट बनाकर उसकी कमी पूरी करनी ही ठीक है। यही जड़वाद, अध्यात्मवादमें भेद है। अध्यात्मवादी अपनी शक्ति, सम्पत्तिको विश्व-सेवामें समर्पित करनेको लालायित रहता है, भारतीय नीतिके अनुसार दूसरे व्यक्तिकी वस्तु लेनेसे हर प्रकार बचना चाहता है। पर देनेवाला हर प्रकार अपनी वस्तु दूसरेको देना चाहता है। शास्त्र प्रतिग्रहसे बचनेका आदेश भी करते हैं और देनेवालेको हर प्रकारसे देनेका उपदेश भी। प्रतिग्रहसमर्थ पुरुषको भी प्रतिग्रहमे बचना चाहिये— 'प्रतिग्रहसमर्थोऽपि प्रसङ्गं तत्र वर्जयेन् ।' (मनु० ४।१८६) पर देनेवालेको कहते हैं कि— 'श्रद्धया देयम्, अश्रद्धया देयम्, श्रिया देयम्, ह्रिया देयम्, भिया देयम्।' (तैत्तिरीय उप० १।११।३) स्वतः श्रद्धासे दे, दूसरोंकी प्रेरणासे दे, लज्जासे दे, भयसे दे। टोला-पड़ोसके लोग भूखे रहेंगे तो कोई भी धनी अपनी कोठीमें सुखकी नींद सो न सकेगा। चोरी, डाका, लूट, खसोट आदि अवश्य ही मचेगी। इस दृष्टिसे देनेवाला हर तरह देना चाहता है। लेनेवाला बचना चाहता है। अतः लीजिये, लीजिये, नहीं, नहींका घोष सुनायी पड़ता है। आधुनिक साम्यवादियोंमें ठीक इसका उल्टा है। गरीबों-मजदूरोंके नामपर लेनेवाले कहते हैं, 'लड़कर लेंगे, झगड़कर लेंगे, मरकर-मारकर लेंगे, लेंगे।' देनेवाले कहते हैं—'नहीं देंगे, मर जायेंगे, मिट जायेंगे पर नहीं देंगे।' इस तरह यहाँ 'दो-दो, नहीं-नहीं' का घोष चलता है। अध्यात्मवादमें एक मुख्य उपासना है, जिसमें निर्गुण ब्रह्म जाननेके लिये विराट्, हिरण्यगर्भ तथा अव्याकृत ब्रह्मकी उपासना करनी पड़ती है। यह उपासना अहंग्रहरूपसे होती है। उपासकको अपने व्यष्टि स्वरूपको हटाकर समष्टिरूपकी भावना करनी पड़ती है, अर्थात् अपनेको साधारण देह न मानकर महाविराट् मानना पड़ता है। फिर तो द्युलोकको अपना मूर्द्धा, सूर्यको चक्षु, वायुको, प्राण, अन्तरिक्षको उदर, समुद्रको वस्ती, पृथिवीको पैर मानता है। जिसमें अहंता लानी हो उसमें पहले घनिष्ठ ममता लानी पड़ती है। जिनमें साधारण ममता होती है, उनमें अहंता नहीं होती। देहमें घनिष्ठ ममता होती है, अतः उसमें ही अहंता होती है। इतनी ममता दृढ होनेसे ही अहंता उत्पन्न होती है। जब कभी पुत्र-कलत्रमें ममता घनिष्ठ हो जाती है, तब उनमें भी अहंता उत्पन्न होती है। इसीलिये उनके दुःख-सुखमें दुःखी-सुखी होनेकी बात चलती है। अतएव जैसे प्राणी देहके भोजन-वस्त्र विविध सुख- साधनोंके लिये तथा दुःख दूर करनेके लिये प्रयत्नशील होता है, वैसे ही जब पुत्र-कलत्रादि भी ममता एवं अहंताके आस्पद होते हैं, तब उनके भी दुःख- निवृत्ति एवं सुखप्राप्तिके लिये प्राणी सदा ही तत्पर होता है। यह ममता क्रमेण विकसित होती है। साधारण प्राणी देहमें ही ममता रखता है, पर साधक धीरे

धीरे सकुंचित व्यष्टि अभिमानको मिटाकर, उसे कुटुम्ब, ग्राम, मण्डल, राज्य, राष्ट्र एवं विश्वमें विकसित करता है। इसीलिये साधारण प्राणी अपने ही दुःखमे दुखी और सुखमें सुखी होते हैं। पर उच्च भावनावाले लोग कुटुम्ब, ग्रामके दुःख-सुखमें दुखी-सुखी होते हैं। और अधिक उच्च लोग सारी पृथ्वीको ही कुटुम्ब मानकर सारे विश्वको अपनी आत्मा मानकर संसारके ही सुख-दुःखमें सुखी- दुखी होते हैं। इसीलिये अधिकांश अपने दुःख-सुखमें रोते-हँसते हैं, पर दूसरोंके दुःखमें रोनेवाले और दूसरोंके सुखमें हँसनेवाले महापुरुष होते हैं। इसका निष्कर्ष यह निकलता है कि जैसे सामान्य प्राणी अपने सुख-प्राप्ति दुःख-निवृत्तिमें निरन्तर प्रयत्नशील होता है, वैसे ही महापुरुष समष्टि जगत्‌की दुःख-निवृत्ति और सुख साधनमें लगे रहते हैं। इस दृष्टिसे राजा-प्रजा सभी समष्टि हित-साधनमें संलग्न रहकर एक इस प्रकारका जीवन निर्धारित करते और कम-से-कम उस स्थितिमें राष्ट्रके प्रत्येक नागरिकको पहुँचानेका प्रयत्न करते हैं। विविध प्रकारकी सहायता तथा बिना सूद-ऋणादिद्वारा रोजी-रोजगार देकर मजदूरी या नौकरी देकर सभीके लिये उचित रोटी, कपड़ा, औषध, शिक्षा, निवासकी व्यवस्था की जाती है। उसी दृष्टिसे वेतनका भी निर्धारण होता है। योग्यता एवं परिस्थिति- के अनुसार किसीको नौकरी, किसीको कोई व्यापार, किसीको कोई उद्योग, किसीको खेती करने आदिकी व्यवस्था करके सबकी ही रोजीकी व्यवस्था की जाती है। इतनेपर भी हानिका डर एव लाभका प्रलोभन हुए बिना आलस्य-प्रमादका त्यागकर उत्साहके साथ तत्परतापूर्वक परिश्रममें जबतक प्रवृत्ति न होगी, तबतक सफलता सम्भव नहीं। संघटनकी कुंजी यह तो हुई विघटनकी बात। अब जहाँ ‘संघे शक्तिः कलौ युगे’ की बात आजकल बहुत होती है, वहाँ भी संघटनकी योजनाएँ कैसे सफल हो, इस विषयमें सभी परेशान हैं। वास्तवमें जो संघटन पर रातों-दिन व्याख्यान दे और लेख लिख रहे हैं, जो स्वय प्रान्त, समाज, राष्ट्रके संघटनपर जमीन-आसमानके कुलाबे एक किया करते हैं, उनके स्वाभाविक स्वार्थसे सम्बन्ध रखनेवाले सभी काम प्रायः विघटनके मूल होते हैं। सौहार्द, सामञ्जस्य, सौमनस्य, मनुष्यत्वकी बातें वहींतक होती हैं, जहाँतक उनके निजी स्वार्थमें बाधा नहीं आती। फिर बाहरकी तो बात ही दूसरी है, पहले उनके घरोंमें ही कितना संघटन है? कुटुम्बियों, बन्धु-वर्गों, स्त्री, पुत्र, माता-पितामें क्या सौहार्द है?- यदि नहीं तो बाहर कैसे होगा? वस्तुतः यह धारणा भ्रान्तिपूर्ण है कि व्यक्तियोंके सुधार बिना सामूहिक सुधार हो जायगा। यह सच है कि राष्ट्र, प्रान्त, समाजके वातावरणका प्रभाव व्यक्तियोंपर पड़ता है, पर व्यक्तियोंके ही समूहको तो समाज, राष्ट्र आदि कहा जाता है। यदि सभी व्यक्ति आत्मसुधारकी ओर ध्यान न देकर

[header] वर्ग-संघर्ष २९५ केवल समूह-सुधारके लिये प्रयत्नशील होंगे तो क्या स्वप्नमें भी वैयक्तिक या सामूहिक सुधार हो सकता है ? कुछ व्यक्तियोंके समूहको कुटुम्ब, कुछ कुटुम्बोंके समूहको ग्राम या नगर कहा जाता है और उनके समूहको ही प्रान्त एव राष्ट्र कहा जाता है । अतः जबतक वैयक्तिक, सामूहिक दोनों ही सुधारकी ओर ध्यान न दिया जाय, तबतक सफलताका स्वप्न देखना बेकार है । इसीलिये भगवान् मनु इस राष्ट्रिय, सामाजिक व्यवस्थाको ही लक्ष्यमें रखकर कौटुम्बिक, सामाजिक व्यवस्थापर जोर देते हैं और कुटुम्बपतिको वैयक्तिक नियन्त्रणके लिये यह बतलाते हैं कि धर्मबुद्धिसे ऐसा नियन्त्रण करे कि जिससे कुटुम्ब और समाजके विघटनका मूल विवाद ही न उठने पाये । असहिष्णुता, अक्षमता, स्वार्थपरायणता आदि दोष ही विवाद और कटुता फैलाकर विघटन करते हैं । मनुका कहना है कि प्रति व्यक्तिको चाहिये कि वह ऋत्विक्, पुरोहित, आचार्य, मातुल, अतिथि, आश्रित, बालक, बूढ़े, रोगी, वैद्य, जातिवालों, सम्बन्धी, बान्धव, माता, पिता, बहन, भाई, पुत्र, स्त्री, बेटी तथा नौकर-चाकरोंके साथ विवाद न करे— ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मातुलातिथिसंश्रितैः । बालवृद्धातुरैर्वैद्यैर्ज्ञातिसम्बन्धिबान्धवैः ॥ मातापितृभ्यां जामीभिर्भ्रात्रा पुत्रेण भार्यया । दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत् ॥ ( ४ । १७९-८० ) अगर उपर्युक्त व्यक्तियोंमें एक व्यक्तिके चलते विवाद और विघटन न हुआ तो कौन कह सकता है कि उसीके दृष्टान्तसे दूसरे भी वैसा कर एक महासंघटनका सूत्रपात न करेंगे ? पर सहवाससे खटपट होना स्वाभाविक है। राग, रोष, ईर्ष्या, मद, मोह आदि बड़े-बड़े योगियोंके मनमें भी विकार, अपराग पैदा कर देते हैं । संघर्षसे बचना तो बड़ा कठिन है, स्वार्थोंके सम्बन्धसे पिता-पुत्रादिमें भी विवाद खड़ा होता है, फिर दूसरोंमें तो कहना ही क्या ? अतएव मनु इसे धर्म बतलाकर इसके पालनसे परलोक-सिद्धि बतलाते हैं । धार्मिक पुरुष कठिन-से- कठिन कष्ट सहकर भी धर्मको बचाते हैं । धर्म-बुद्धिसे एक सम्राट् भी अपने गुरुका सेवक बनता है । उनके किये हुए अपमानोंको श्रद्धासे सहन करता है और उसके मनमें विकारका लेश भी नहीं आता । इसलिये मनुका कहना है कि इनसे साथ झगड़ा बचाकर गृहस्थ सब पापोंसे छूट जाता है— एतैर्विवादान् संत्यज्य सर्वपापैः प्रमुच्यते । एभिर्जितैश्च जयति सर्वांल्लोकानिमान् गृही ॥ (मनु० ४ । १८१)

५५२ मार्क्सवाद और रामराज्य हानि और अन्तमें किसीको लाभ भी होता है—यह कार्य-कारणभाव मान्य ही है। सब घटनाओंका कार्य-कारणभाव सर्वथा ही असङ्गत है। यदि सभी घटनाओं- का परस्पर कार्य-कारणभाव हो तो कार्यकारणभावकी कल्पना ही समाप्त हो जाती है। किसीका कोई कारण होकर अन्यका अकारण हो तभी कार्य-कारणभावकी विशेषता होती है। कुलालका पिता भी यद्यपि कुलालजननद्वारा घटका कारण कहा जा सकता है तथा बाणनिर्माता भी किसीके वधमें परम्परया कारण हो सकता है, परंतु तार्किकोंने ऐसे कारणोंको 'अन्यथासिद्ध' कहा है। अन्यथा- सिद्धिशून्य कार्याव्यवहित पूर्वक्षणवर्तीको ही कारण कहा जाता है। कालान्तरभावी स्वर्गादिके प्रति अग्निहोत्रादि पूर्वक्षणवर्ती नहीं हो सकता। अतः बीचमें अपूर्व (अदृष्टरूप) व्यापार मानकर उसके द्वारा कार्य-कारणभाव निश्चित होता है। 'तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकत्व' ही व्यापार है। अग्निहोत्रादिजन्य होकर अग्निहोत्रादिजन्य स्वर्गका जनक अदृष्ट है। काकके बैठने, तालके गिरनेमें यद्यपि कार्य-कारणभाव प्रतीत होता है, तथापि 'काकतालीयन्याय' का अकार्य- कारणभाव स्पष्ट ही है। इसके अतिरिक्त 'इति-ह-आस' (इतिहास) ऐसा हुआ— इस ऐतिह्यको ही इतिहास कहते हैं। 'वटे यक्षः' यह प्रसिद्धि इतिहास नहीं है। अन्ध- परम्पराकी प्रसिद्धि अप्रमाण और आप्तपरम्पराकी प्रसिद्धि प्रमाण होती है। इसीलिये अतीत घटनाओंके सम्बन्धमें वचन या लेख ही प्रमाण होते हैं। कुछ अंशोंमें अनुमान भी सहायक होते हैं। करोड़ों वर्षोंकी अगणित घटनाओंका उल्लेख हो ही नहीं सकता। यदि एक-एक वर्षकी घटनाओंका एक-एक पन्नेमें भी संकलन करे तो भी करोड़ों पन्नोंका इतिहास होगा। उसे कौन कितने दिनमें पढ़ेगा, फिर कब निष्कर्ष निकालेगा ? सम्पूर्ण घटनाओंका ज्ञान न होनेसे अधूरी घटनाके अधूरे ज्ञानसे निकाला हुआ निष्कर्ष भी अधूरा ही होगा। फिर घटनाओ- की सच्चाई जाननेमें भी पर्याप्त भ्रम रहता है, आँखों-देखी घटनाओंके सम्बन्धमें विभिन्न संवाददाताओं, समाचार एजेन्सियोंमें पर्याप्त मतभेद रहता है। समाचार- पत्रों एव सम्पादकीय लेखोंमें जाते-जाते एक ही घटनाका रूप सैकड़ों ढंगका बन जाता है। इसीलिये पुरानी घटनाओंका पढ़ना-लिखना गड़े मुर्दोंके उखाड़ने- जैसा ही व्यर्थ होता है। म्यूनिसिपल बोर्डोंमें मनुष्योंके ही जनमने मरनेका लेखा-जोखा होता है, मच्छरों-मक्खियोंके जीने-मरनेका लेखा-जोखा नहीं रहता; क्योंकि उनका कोई महत्त्व नहीं होता। वैसे ही प्रतिवर्ष इतिहासमें मुख्य-मुख्य व्यक्तियों एवं घटनाओंका ही उल्लेख होता है, लाखो ही नहीं, करोड़ों व्यक्तियों एवं घटनाओंका उल्लेख छोड़ दिया जाता है। क्योकि लेखक उनका महत्त्व नहीं मानता। परंतु एतावता क्या कोई कह सकता है कि 'उनमें कोई व्यक्ति या घटना भी महत्त्वपूर्ण नहीं?' इसीलिये भारतीय महर्षियोंने योगज ऋतम्भरा प्रज्ञाके द्वारा ही अतीत महत्त्वपूर्ण आवश्यक घटनाओंका साक्षात्कार कर उनका उल्लेख किया है।

मार्क्स-दर्शन ५५३ 'योगजविशेषता नहीं होती' यह कहना मूर्खता होगी । स्पष्ट ही देखते हैं कि 'जब चित्त शान्त, एकाग्र होता है तो सूक्ष्म ज्ञान उत्पन्न होता है । चित्तके चञ्चल एवं अशान्त होनेपर आँखों-देखी, कानों-सुनी बातोंका भी ठीक-ठीक ज्ञान नहीं होता ।' वाल्मीकीय रामायणके लिये ब्रह्माका वरदान है—'न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति' (वाल्मी० १।२।३३) इस काव्यमें तुम्हारा एक भी वाक्य अनृत नहीं होगा । यदि ये सब बातें झूठी हैं, तो जडवादियोंकी सम्पूर्ण ऐतिहासिक कल्पनाएँ और उनके कार्यकारणभाव भी सुतरां झूठे हैं । मनुष्योंको विचारने, सोचने, उन्नत करनेमें अवश्य स्वतन्त्रता है, परंतु उनके लिये भी शिक्षण, मार्गदर्शन अपेक्षित होते हैं । आज भी शिक्षणादिकी आवश्यकता सूर्यके समान स्पष्ट है । सर्वज्ञ ईश्वर, आप्त, महातपा, महर्षियोंके शिक्षण मार्गदर्शनके अनुसार सोचने, विचारने, उन्नतिके प्रयत्न करनेसे सफलता निश्चित होती है, मनमानी करनेसे भटककर परेशान होना पडता है । आज भी न्याय, नीति, शिक्षा, शिल्पादिके सम्बन्धमें परम्परासे ही शिक्षा ली जाती है । अदालतोंमें भी पुरानी नजीरें पेश की जाती हैं । नीतिके सम्बन्धमें भी पुरानी मान्य- ताओंकी खोज की जाती है । यदि अतीतसे शिक्षा नहीं लेनी है, तो फिर इतिहास- का महत्त्व ही क्या ? अतीत घटनाओमे कितनी ही अनिष्ट हैं, कितनी इष्ट हैं, कितनी भली हैं, कितनी बुरी हैं । अधिकांश अनाचार, पापाचार एवं बुराईकी ही घटनाएँ घटती हैं । अतः महर्षियों, शिष्टोंसे सम्मत, सत्य, लाभदायक इतिहास ही आदरणीय होता है । अतः राष्ट्रको अपने भविष्यनिर्माण करने, धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, राजनीतिक उचित शिक्षण प्राप्त करनेके लिये ही आप्त इतिहासोंका उल्लेख होता है । पूँजी जड है, वह स्वयं मुर्दा है, प्रयोक्ताओंके गुण एवं दोषसे उसमें गुण या दोष आते हैं। पूँजीद्वारा होनेवाले विकाससे पूँजीपतिका ही विनाश नहीं होता, किंतु मजदूरका भी होता है । अन्यथा उसकी भी बेकारी बढती है । बेकारी बढनेसे ही मजदूरोंका राज्य नहीं बन जाता । यदि यही बात हो तो फिर राज्य बनानेके लिये व्यक्ति या समूह बेकार ही प्रयत्न करे, परंतु ऐसा देखा नहीं जाता । इसके साथ ही यह भी समझना चाहिये कि वैज्ञानिक आविष्कारक आदि आधुनिक विकासके मूल हैं । यदि विकासके परम्परागत हेतु होनेसे पूँजीपतिका विनाश होता है, तो साक्षात् 'संश्लिष्ट' आविष्कारको एव मजदूरोंका विनाश क्यो न होगा ? जैसे पूँजीपतियोंका विनाश इतिहाससिद्ध है, वैसे ही पूँजीपतियोंसे अधिक सख्यामें मजदूरोका विनाश भी इतिहाससिद्ध है । फिर भी जैसे मजदूर रहते हैं, वैसे पूँजीपति भी हैं । यह दूसरी बात है कि मजदूरके नामपर कुछ सरकारी अधिना- यक पूँजीपति बन जाते हैं । किसी भी कार्यमें आनेवाले दोषों एव दुष्परिणामोंको

५५४ मार्क्सवाद और रामराज्य बुद्धिमान्, ईमानदार मिटानेका प्रयत्न करता है और सफल होता है; कोई खास वर्ग या व्यक्ति ही ऐसा करता है, यह नहीं कहा जा सकता । फिर धर्म- नियन्त्रित शासन सुतरा ईश्वरीय एवं आर्ष सम्मतियोके अनुसार आगत दोषोंको तो दूर कर ही सकता है। श्रेणी और वृत्ति मार्क्सवादी कहते है कि 'जीविका पैदा करनेके क्रममें जो मनुष्य जिस स्थान- पर है वही उसकी श्रेणी है। मनुष्य जीविका उपार्जन करनेके ढंगके अनुसार अपने रहन-सहनका ढग बना लेता है, अतएव जीविकोपार्जनका ढग बदलनेसे समाजका रूप भी बदल जाता है। समाजमें पैदावारकी दृष्टिसे श्रेणियाँ अपना-अपना स्थान रखती हैं। पैदावारके फल या पैदावारके साधनोपर अधिकार करनेके लिये जो संघर्ष चलता है, वही मनुष्यसमाजका इतिहास है, वही मनुष्यसमाजके विकासका मार्ग है। विकासके मार्गमें विरोध आना आवश्यक है, विरोधसे नया विधान तैयार होता है। नया विधान समाजके विकासको आगे बढाता है।' शरीर- मात्रको आत्मा माननेवाले शरीरभिन्न आत्मा एवं उसका जन्मान्तर होने, ईश्वर एवं धर्माधर्मका रहस्य न समझनेवाले चार्वाकप्राय जडवादियोकी दृष्टिमें उपर्युक्त बाते ठीक ही हैं । परंतु तद्विपरीत रामराज्यवादीको 'पशुओ, वृक्षों-जैसी ही मनुष्योकी भी जन्मना ही ब्राह्मणादि श्रेणी मान्य है। जीविका चलानी हर मनुष्यकी मुख्य समस्या नहीं, किंतु लौकिक-पारलौकिक विविध अभ्युदय एव परम निःश्रेयस ही उसका मुख्य उद्देश्य है । तदर्थ धर्म, संस्कृति, ज्ञान, विज्ञान, शिल्प, संगीत, कला-कौशलका आविर्भाव परमावश्यक होता है। केवल मनुष्योके लिये ही जीविका कोई असाधारण समस्या नहीं है। वह पशु-पक्षियोके लिये भी अपेक्षित ही होती है। आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥ (हितो०) अतएव आस्तिकोके यहाँ वर्णानुसारिणी जीविका होती है। जीविकानुसारी वर्ण नहीं। वर्णोंके भेदसे ही शास्त्रोक्त कर्मोंका भी भेद है। राजसूय, वाजपेयादि क्षत्रिय-ब्राह्मणादिके भेदसे विहित हैं । इस तरह धर्मकी दृष्टिसे ब्राह्मणादि श्रेणियाँ ही मुख्य एव उपादेय हैं । धनी, गरीब, पूँजीपति, मजदूर आदि वास्तविक श्रेणी ही नहीं हैं। ऐसी कृत्रिम श्रेणियाँ सदा ही हानिकारक होती हैं। ब्राह्मणों, क्षत्रियो, वैश्यों, शूद्रों—सभीमे ये अमीर-गरीब होते हैं। बुद्धिमान्, निर्बुद्धि, दुर्बल, सबल कं ई जाति नहीं होती । उनके विवाह, खानदान आदि भी इन्हीं अकृत्रिम श्रेणियोंमे होते हैं। इन श्रेणियोंमे साधनोके हथियानेके लिये कभी भी सघर्ष नहीं हुआ । मार्क्स-जैसे कुछ लोगोद्वारा यह कृत्रिम भेद उत्पन्न किया

जाता और उनमें संघर्ष, विद्वेष फैलाकर अपना मतलब गाँठनेका प्रयत्न किया जाता है । लाखो वर्षोंके पुराने इतिहासमे किसीकी भूमि-सम्पत्ति, कल-कारखाना छीननेका श्रेणीबद्ध प्रयत्न नहीं होता था । हाँ, एक राजा दूसरे राजापर राज्य छीनने- के लिये प्रयत्न करता था । कुछ व्यक्ति कुछ व्यक्तियोंकी कोई वस्तु छीननेका प्रयत्न यदि करते थे तो वे दण्डके भागी होते थे । मार्क्सवादियोंके मनगढन्त इतिहासकी घटनाएँ केवल हजार-पाँच सौ वर्षकी ही हैं । सभी देशों, सभी धर्मोंके पुराने इतिहासोंमें मार्क्सवादी-क्रमकी गन्ध भी नहीं प्रतीत होती । इतना ही क्यों, युक्तियों एवं शास्त्रोंसे मालूम पड़ता है कि ऐसी क्रान्तियाँ क्षुद्रोपद्रवमात्र हैं । इनका कोई ऐतिहासिक महत्त्व नहीं । वेदों, रामायण, महाभारत तथा पुराणोंमें करोड़ों, अरबों वर्षों एवं अगणित युगों, कल्पों तथा विभिन्न सृष्टियोंके इतिहास हैं । जैसे प्रतिवर्ष वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा आदि ऋतुओका समान- रूपसे आवर्तन होता रहता है, वैसे ही प्रतिकल्प प्रतिसृष्टिमें समानरूपसे सूर्य, चन्द्र आदि उत्पन्न होते हैं । अनेक ढंगकी प्रधान-प्रधान वस्तुएँ एक-

५५६ मार्क्सवाद और रामराज्य धर्म और अर्थ मार्क्सवादी कहते हैं कि धर्म, प्रेम या परोपकारके नामपर सर्वस्व लुटा देने या प्राण न्योछावर कर देनेका भी आधार आर्थिक ही है, क्योकि सब कुछ संतोष- तृप्तिके लिये ही किया जाता है । अन्यायके विरोधमे आत्मबलिदान करता हुआ भी प्राणी सब कुछ स्वार्थके उद्देश्यसे करता है । परंतु यहाँ स्वार्थका अर्थ व्यक्ति न समझकर श्रेणी समझना उचित है । समाजमें व्यवस्था एवं शान्ति न रहनेसे समाजके नुकसानके साथ व्यक्तिका भी नुकसान होता है । समाजकी रक्षामें ही व्यक्तिकी भी रक्षा होती है; परंतु जडवादमें उपर्युक्त बाते सङ्गत नहीं होतीं । जो देहमात्रको आत्मा मानता है, देहके नष्ट हो जानेपर आत्माका नाश मानता है वह आत्मनाशके काममे कभी भी प्रवृत्त नहीं हो सकता । आत्माके नष्ट हो जानेपर समाजकी रक्षासे फिर किसकी रक्षा होगी ? जिसकी रक्षाके लिये समाजकी रक्षा करनी है, जब उसका नाश सामने ही है तो उसकी रक्षाके लिये समाज-रक्षाकी बात ही कहाँ उठती है ? शान्ति या संतोषके लिये त्याग भी वहीतक किया जा सकता है जहाँतक जिसे शान्ति-संतोष चाहिये, वह बना रहे । जब शान्ति- संतोषका भोक्ता ही नष्ट हो जायगा तो शान्ति-संतोषका सुख कौन भोगेगा ? अध्यात्मवादी देहादिके नष्ट हो जानेपर भी सुख-शान्ति-संतोष भोगनेवाली आत्मा- को अमर मानते हैं । अतः उनका त्याग, बलिदान बन सकता है । आत्म- कल्याणके लिये धर्मार्थ, परोपकारार्थ प्राणत्यागतक करना उनकी दृष्टिसे उचित हो सकता है । अध्यात्मवादमें भी दो प्रकारका स्वार्थ होता है—एक संकुचित और दूसरा वास्तविक । जहाँ 'स्व' शब्दका अर्थ देहादि ही माना जाय वह संकुचित स्वार्थ है । वहाँ रोटी-कपड़े आदि लौकिक अभीष्ट वस्तुओंकी प्राप्ति ही स्वार्थ गिना जाता है । परंतु जहाँ 'स्व' शब्दका अर्थ देहादिभिन्न नित्य आत्मा माना जाता है, वहाँ स्वार्थका अभिप्राय वस्तुभूतस्वरूप परमेश्वरका साक्षात्कार, परमेश्वरप्राप्ति, अनर्थ- निवृत्ति तथा परमानन्दस्वरूप मोक्षप्राप्ति ही है । यह सच्चा स्वार्थ कहा जाता है— 'स्वारथ साँच जीव कहँ एहू । मन क्रम बचन राम पद नेहू ॥' इसी वास्तविक स्वार्थके अभिप्रायसे कहा गया है कि 'सब कुछ आत्माके लिये ही होता है । सर्वभूत, सर्वलोक, सर्वदेव आदिकोंमें प्रेम सर्वभूत, सर्वलोक, सर्व- देवके लिये नहीं, किंतु आत्माके लिये ही होता है । 'न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवति आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति ।' ( बृहदा० उ० ) परंतु यहाँ प्रबोध होनेपर व्यष्टि समष्टि दो नहीं रह जाते । अविद्या-दशामें ही सर्वस्वरूप आत्मा- में असर्वता अध्यारोपित है । बोध होनेपर अध्यारोपित असर्वताके बाधित होनेपर स्वाभाविक सर्वता ही व्यक्त हो जाती है । अतः वास्तविक स्वार्थ समष्टि-व्यष्टिका एक ही होता है; परंतु जडवादमे यह सब सम्भव नहीं ।

मार्क्स-दर्शन ५५७ किसीके पैदावारका साधन छीनना सदासे सभी पाप समझते रहे। परान्न- परद्रव्य मार्गमें पडा हो या अपने घरमें ही कोई डाल गया हो तब भी नही लेते थे— ‘परान्नं परद्रव्यं वा पथि वा यदि वा गृहे। अदत्तं नैव गृह्णीयादेतद्ब्राह्मणलक्षणम्।' दायभागमें प्राप्त अपनी बपौती सम्पत्तिको ही अपनी सम्पत्ति मानते थे। दान-पुरस्कार तथा परिश्रमाजित सम्पत्तिको ही अपनी वैध सम्पत्ति मानते थे। फिर छीनने, अपहरण करनेका उनसे सम्बन्ध ही क्या हो सकता था ? लोक, परलोक, ईश्वर, धर्म न माननेवाला जडवादी ही दूसरोकी सम्पत्ति लेनेकी सलाह दे सकना है। आस्तिक दूसरेकी गिरी हीरेकी माला या लाखोका नोटका बडल जिसके हैं, उन्हीं- को लौटा देनेकी सलाह देगा, परन्तु एक कम्युनिष्ट ऐसी सलाह दे ही कैसे सकता है ? आस्तिककी दृष्टिमें सब मनुष्य ही नही, किंतु सभी प्राणी परमेश्वरकी संतान हैं। फिर भी शिष्य गुरु को, पुत्र माता-पिताको, पत्नी पतिको, नौकर मालिकको पूज्य और अपनेको सेवक मानते हैं। पूज्यको सेव्य समझते हैं। व्यवहारमें वह सेव्य-सेवक-भाव मान्य होता है। अतएव आस्तिक किसी को गुलाम नहीं मानता। मनुष्य मनुष्यमें सेव्य-सेवकभाव चलता है। यह अब भी है और सदा रहेगा। नाम भले बदल जाय, पर वस्तु कभी नहीं बदल सकती। मिश्रकी पिरामिड, यूनान एव भारतकी विशाल इमारतोंके बनानेमें गरीबोको रोजी और नौकरी मिली है, उनका पोषण हुआ है। उनकी सम्पत्ति छीनकर ये सब चीजें नहीं बनायी गयीं। सब सम्पत्ति गरीबो, मजदूरोकी ही होती, तो वे गरीब और मजदूर ही क्यों होते ? मजदूरोने पैदावारमें हाथ बँटाया तो उसके बदलेमें वेतन पाया। कमाईका सारा फल मजदूर- का ही है, यह सिद्धान्त असिद्ध है। हाँ, उनका जीवन उन्नत और समृद्ध हो इसके लिये आस्तिकोका सदा प्रयत्न रहा। फलस्वरूप वे सुखी भी रहे। देशमें कोई दरिद्र, दुखी, अविद्वान् नहीं रहता था। 'न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपः।' 'नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना ॥' सभ्यता, संस्कृति, शिल्प, संगीतका विकास अमीर, गरीब सबके ही हितकी चीज है। रूसी विद्वान् साहित्य, संगीत ज्योतिषके अध्ययनमे संलग्न हो रहे हैं, एतावता क्या वे भी शोषक हो जायेंगे ? वैज्ञानिक लोग अनेक प्रकारके अविष्कारमें लगे हैं, वे भी तो किसान-मजदूरोंकी ही कमाई खाते हैं ? पर क्या वे शोषक कहे जायेंगे ? वस्तुतः जो भी अपने कर्त्तव्यका पालन करते हैं, वे शोषक नहीं कहे जाते। शासक, शिक्षक, अन्वेषक यदि शोषक नही तो शिल्प, संगीत, साहित्यके अभ्यासमें लगे लोग भी शोषक कैसे कहे जा सकते हैं ? श्रमके अतिरिक्त प्राकृतिक साधनोंका भी उत्पादनमें प्रमुख हाथ रहता है। अतः श्रमवालोको यदि लाभका अंश मिलता है, तो साधनवालोंका भी लाभमें हिस्सा होना अनिवार्य है। श्रमवाले- को उचित पारिश्रमिक मिलना चाहिये और साधनवालोको लाभ। शरीर, मस्तिष्क, श्रमशक्ति भी वस्तुतः प्राकृतिक ही वस्तु है। मनुष्योंने इतर यन्त्रोंके समान

मस्तिष्क एव देहोका निर्माण नहीं किया । जैसे इन प्राकृतिक साधनोसे मनुष्य लाभ उठाता है, वैसे ही अन्य प्राकृतिक साधनोसे दूसरोको भी लाभ उठानेका अधिकार है । मशीनो, कल-कारखानोके विस्तारसे उत्पादनमें वृद्धि, वस्तुओकी बहुलतासे दाममे कमी होना, कम मजदूरोका उपयोग, अधिकोकी बेकारी आदिका होना तो अनिवार्य है । परंतु बच्चो एव स्त्रियोसे काम लेना, चार घंटेके बदले मजदूरोसे बारह घंटे काम लेना, कम मजदूरी देना और उन्हे असहाय छोड़ देना आदि जुर्म है । यह कहीं भी हो, इसका समर्थन नही किया जा सकता । यह सार्वदेशिक एव सार्वकालिक इतिहासकी बात नहीं । अन्यान्य अनाचारोके समान यह भी शुद्ध उपद्रव ही है, जो सर्वथा हेय है । यह अतिरञ्जित बीभत्स वर्णन एक वर्गके प्रति घृणा फैलानेके उद्देश्यसे भी हो सकता है । वैसे रूसमें विरो- धियोके साथ लोग इससे भी अधिक भीषण दुर्व्यवहारकी बात करते है । भौतिकवादी ईश्वर एव धर्मके सम्बन्धमे बहुत उलटा प्रचार करते हैं और कहते हैं कि 'इस पक्षमे सब कुछ ईश्वरकी इच्छासे ही होता है । मनुष्यके विचार भी ईश्वरप्रेरणाके ही अधीन होते हैं । ईश्वरवादी ससारको मिथ्या मानकर उससे भागनेके ही फेरमें रहते हैं ।' वे कहते हैं कि 'इतिहास इस पक्षका समर्थन नहीं करता ।' परंतु ये बाते बहुत ही छिछली हैं । लाखो-करोडों वर्षका इतिहास वस्तुतः ईश्वरवादका ही समर्थक है । ईश्वरवादियोने ही बडा-बड़ा पुरुषार्थ किया है । समुद्रमे सौ योजनका पुल ईश्वरवादियोने ही तैयार किया है । अखण्ड भूमण्डल- का साम्राज्य, पुष्पकविमान-जैसे वायुयान, हाईड्रोजनबमसे करोडो गुना अधिक शक्तिशाली ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र ईश्वरवादियोने ही प्रकट किये हैं । मनुष्योके अति रिक्त दिव्य शक्तियोके साथ प्रत्यक्ष व्यवहार भी उन्होने ही किया है । एक देहात्म- वादी उसी बड़े काममे हाथ लगा सकता है, जिसका फल वह जीवनमें देख सके । उसके जीवनमें जिसका फल सम्भव नही, उस काममें वह किस उद्देश्यसे प्रवृत्त होगा ? परंतु आत्मवादी आत्माको अमर मानता है, वह जानता है कि 'इस जन्ममें नहीं तो जन्मान्तरमे मेरे प्रयत्नका फल होगा ही ।' वह कोटि-कोटि जन्मतक भी किसी बडे कामको पूरा करनेका दृढ संकल्प कर सकता है—'जन्म कोटि लगि रगर हमारी । बरौं संभु न त रहौ कुमारी ॥' कई पीढीके प्रयत्न करनेसे गङ्गाके लानेका प्रयत्न भी इसी कोटिका था । जैसे अङ्कुरोत्पत्तिमें पर्जन्य साधारण कारण है, अङ्कुरके रूप, रस, फल आदि विचित्रताका असाधारण कारण पर्जन्य नहीं, किंतु बीजकी निजी विशेषता है, वैसे ही ईश्वर सर्व प्रवृत्तियोंमे साधारण कारण है । तत्तद्विशिष्ट फलोंकी प्राप्तिमें प्राणियोंके पुरुषार्थ ही मुख्य कारण हैं । प्राणियोंके अपने पुरुषार्थ- प्रमादके अनुसार ही सफलता-असफलता चलती है । योगवाशिष्ठ आदिमें पुरुषार्थका जितना जबर्दस्त समर्थन है, जडवादी कभी भी उतने पुरुषार्थकी कल्पना नहीं कर सकते ।

कई लोग आजकल कहते हैं कि 'आस्तिकलोग जीने-मरने, स्वर्ग-नरककी ही चिन्तामें परेशान रहते हैं । इसीलिये उन्होंने लौकिक-भौतिक उन्नतिमें सफलता नहीं पायी । भौतिक लोग स्वर्ग-नरककी चिन्तासे मुक्त थे, अतः वैज्ञानिक उन्नतिमें बढ़ गये । परन्तु यह उनका भ्रम है, हम भौतिक वैज्ञानिक उन्नतिकी चर्चा कर आये हैं । अलबत्ता आत्मा-परमात्मा माननेवाला, स्वर्ग-नरकविश्वासी प्राणियोंको परमेश्वरका अंश मानकर उन्हें सतानेमें सकुचायेगा । कोई प्राणी एक कारी- गरके बनाये हुए खिलौनेको बिगाड़नेमें सकुचाता है, फिर कोई समझदार ईश्वरके बनाये प्राणियोंको सताने या मौतके घाट उतारनेसे अवश्य सकुचायेगा । भौतिक- वादी पाप पुण्य, स्वर्ग-नरकसे डरते नहीं, अतः भीषण-से-भीषण नरसंहारमें, प्राणि- संहारमें उन्हें कुछ भी संकोच नहीं। उसका स्वार्थ भीषण-से-भीषण घृणित-से- घृणित कार्यसे भी सम्पन्न हो तो भी वे स्वार्थ-साधनके लिये तैयार हो जाते हैं। मार्क्सके दर्शन, जीव-विकास एवं मृत्यु आदिकी समालोचना पिछले प्रकरणमें की जा चुकी है। डार्विन हैक्ल आदिके सिद्धान्त भारतीय दर्शनोंकी कसौटीपर मिनट- भर भी नहीं ठहरते । बहुत से समाजवादी मार्क्सवादी भी मार्क्सके अर्थसम्बन्धी दर्शनसे सहमत होते हुए भी उसके अध्यात्मविचारसे सहमत नहीं होते । अनेकों लोग समाज- वादी होते हुए भी ईश्वर एवं धर्ममें विश्वास रखते हैं । विशेषतः भारतमे हजारमे नौ सौ निन्यानवे समाजवादी धार्मिक एवं ईश्वरवादी होते हैं, परंतु मार्क्सवादी दृष्टिकोणसे वे गलत रास्तेपर ही समझे जाते हैं । यह दुरंगा ढंग उनकी दृष्टिमें सर्वथा अवैज्ञानिक है । उनका कहना है कि जब आत्मा-परमात्माका अस्तित्व विज्ञान एवं तर्कद्वारा सिद्ध नहीं होता तो वह क्यों माना जाय ? ईश्वर इन्द्रियोंका विषय नहीं, किंतु अनुभवका विषय है। ऐसे विश्वासोको अन्ध विश्वास ही कहते हैं । उनके मतानुसार भूत-प्रेतकी कल्पनाके समान ही ईश्वरकी कल्पना है। वे कहते हैं कि विज्ञानकी उन्नतिके लिये मनुष्यने ईश्वरकी कल्पनामें भी उन्नति कर ली है । आरम्भकालकी भूत-प्रेतकी कल्पना ही मध्यकालमे परिष्कृत होकर देवी-देवताके रूपमें प्रकट होती है। अधिक प्रगतिशील युगमें देवी देवताकी कल्पना भी परिष्कृत होकर एक ईश्वरका रूप ले लेती है और परिष्कृत होकर वही कल्पना अद्वैत निर्गुण-निराकार ब्रह्मका रूप धारण कर लेती है । मार्क्सका कहना है कि जो वस्तु है ही नहीं उसपर विश्वास करनेसे क्या लाभ ? और झूठी कल्पनासे मनुष्यको क्या आश्रय मिलेगा ? और क्या उत्थान होगा ? सबसे बडी अडचन यह है कि अध्यात्म- वादियोके मतानुसार आत्मा परमात्मामें परिवर्तन नहीं होता । सुतरा ईश्वरनिर्दिष्ट धार्मिक-सामाजिक नियमोंमें भी रद्दोबदल नहीं हो सकता । परंतु मार्क्सके मता- नुसार कोई धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक नियम शाश्वत नहीं है। उनमें रद्दोबदल होता ही रहता है । तभी उसका राष्ट्रीयकरण समाजीकरण चल सकता है । ईश्वर

मानना एवं उसके निर्दिष्ट नियमोंको न मानना यह अर्धजरतीयन्याय कैसे चलेगा ? अपरिवर्तनीय ईश्वर एवं धर्मको मानते हुए व्यक्तिगत सम्पत्ति-भूमिका समाजी- करणके नामपर छीनना कथमपि नहीं हो सकता । मार्क्सवादी कहते हैं कि धार्मिक, आध्यात्मिक विचारवाले समाजकी प्रगतिका सदा ही विरोध करते हैं । फ्रांसके वाल्टेयरने कहा था कि यदि परमेश्वर नहीं है तो हमें स्वयं परमेश्वर गढ़ लेना चाहिये, क्योकि उसका भय मनुष्योंको उचित मार्गपर चलानेमें सहायक होता है । परंतु मार्क्स ऐसे काल्पनिक भयसे लाभकी अपेक्षा हानि ही देखता है । उसे भय है कि ईश्वर माननेवाला व्यक्ति ईश्वरीय शास्त्र एवं ईश्वरीय नियमोंको भी माननेके लिये बाध्य होता है । फिर उसे श्रेणी-संघर्ष एवं किसी व्यक्तिगत सम्पत्ति एवं भूमिके छीन लेनेके सिद्धान्तमें विश्वास जमना असम्भव हो जायगा । वस्तुतः ईमानदारीकी बात यही है कि मार्क्सवादी, ईश्वरवादी दोनोंका समन्वय हो नहीं सकता । अन्ततः जो ईश्वरवादी हैं उन्हे मार्क्सवाद छोड़ना ही पड़ेगा । मार्क्सकी अर्थनीति ईश्वर एवं धर्मके रहते-रहते चल ही नहीं सकती । ईश्वरवादी मार्क्सवादी बनकर या तो मार्क्सवादियोंको धोखा देते हैं या अपनेको धोखा देते हैं । जब भौतिक सूक्ष्म वस्तुओंके ज्ञानमें अणुवीक्षण आदि अनेक साधन अपेक्षित होते हैं तब परमाणु एवं आकाशसे भी परम सूक्ष्म अह महान् अव्यक्त एवं इन सब- से परम सूक्ष्म स्वप्रकाश सत्स्वरूप परमेश्वर बिना साधनोंके कैसे बुद्ध्यारूढ़ हो सकता है। स्वधर्मानुष्ठानद्वारा शुद्धान्तःकरण प्राणी विवेक, वैराग्य, शान्ति, दान्ति, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा-समाधान एवं मुमुक्षुत्व आदिसे युक्त होकर उपनिषद्, गीता, ब्रह्मसूत्रका विचार करनेसे परमेश्वरको समझ सकता है । शङ्कराचार्य उदयनाचार्यके तर्कोंको सुनकर कोई समझदार पुरुष नहीं कह सकता कि ईश्वर भीरु मस्तिष्ककी कल्पना है या अन्धविश्वासकी चीज है । अभय सत्त्वशुद्धि ज्ञानयोगव्यवस्थिति- पूर्ण तर्क एव योगाभ्यासजनित एकाग्रता आदि जिसके समझनेके साधन हैं उसे अन्ध- विश्वासकी बात समझना बड़ी भयंकर मूर्खता है । भूत-प्रेतकी कल्पनाने ही परिष्कृत होकर निर्गुण ब्रह्मकल्पनाका रूप ले लिया, यह कथन भी अनभिज्ञतामूलक है, लाखों वरस पहलेसे ही सबकी मान्यता साथ-साथ चली आ रही है । तामस प्राणियोंके लिये भूत-प्रेत, सात्त्विकोंके लिये देवी-देवता एवं सर्वोच्च अधिकारीके लिये सगुण परमेश्वर एव साक्षात्कारसम्पन्न अत्यन्त अन्तर्मुखके लिये निर्गुणब्रह्मका उपदेश है। तत्त्वविद् भी व्यावहारिक दृष्टिसे सबका सम्मान करता है। कर्मकाण्ड, देवता आदिकी व्यावहारिक सत्ता तत्त्ववित्को ही नहीं अपितु सर्वज्ञशिरोमणि ईश्वरको भी मान्य है। उत्पत्तिके साधन और न्याय मार्क्सवादी कहते हैं कि 'न्याय भी सदा एक-सा नहीं रहता; किंतु उसमें रद्दोबदल होता रहता है। जैसे प्राचीन भारतमें शूद्रोंका विद्या पढ़ना अन्याय और

एक पुरुषको दो पत्नियाँ रखना न्याय था । विधवाका सती होना महापुण्य था, परंतु आज वह अपराध है। न्याय क्या है, इसका निर्णय रहता है उन लोगोंके फैसलेपर, जिनके हाथमें शक्ति रहती है। जिस श्रेणीके हाथमें पैदावारके साधन होते हैं, वही न्याय अन्यायका निर्णय करती है । जिससे उनके हितोंकी रक्षा हो, उनके हाथमें शक्ति बनी रहे, उसी ढगके तरीकोको वे न्याय कहा करते हैं। पूँजी- वादी समाजमें जिस तरह पूँजीपतिके कब्जेमें पूँजी बनी रहे, वही न्याय है। वे व्यक्तिकी पूँजी छीननेको महापाप बतलाते हे । समाजमे मुनाफा कमाकर पूँजी बढानेके अधिकारको न्याय कहते हैं । कम मूल्यमें सौदा खरीदकर अधिक दाममें वेचने, सौ रुपयेका काम कराकर नौकरको पचास रुपया देनेको भी न्याय कहते हैं। रूस इन सब बातोको अन्याय समझता है। पूँजीवादी देशोंमें पूँजीपतिके हितकी बात न्याय है। और रूसमें मजदूरोके हितकी बात न्याय है।' वस्तुतः ऐसी ही भ्रान्त धारणाओंके कारण भौतिकवादी अपने विरोधियोंको कुचलनेके लिये अमानवताका व्यवहार करते हैं और उसे भी न्याय समझते हैं। समाजके नामपर व्यक्तियोंकी भूमि-सम्पत्ति छीनकर विचार-स्वातन्त्र्यपर प्रतिबन्ध लगाकर व्यक्तियोके शरीर, वाणी एव मस्तिष्कपर ताला लगा देने-जैसे बुरे-से-बुरे पापको अपनी हित-रक्षाका साधन समझकर उसे न्याय कहते हैं। भारतमे विद्या, ज्ञान, जानकारीपर कभी भी प्रतिबन्ध नहीं था । विदुर, धर्मव्याध, मूक आदि शूद्र एव अन्त्यज भी परम ज्ञानवान् थे और समाजमे आदरणीय थे । बड़े-बड़े ब्राह्मण, ऋषि-महर्षि भी धर्मव्याधके पास धार्मिक परामर्शके लिये जाते थे । जिन वेदादि ग्रन्थोका विधिपूर्वक अध्ययन पुण्यविशेषकी दृष्टिसे जिन वर्णोंके लिये विहित है, उनका अध्ययन उन्हींके लिये आज भी है, तब भी था। जो वेदादि शास्त्रके अनुसार अदृष्ट अर्थमे विश्वास रखते हैं वे तदनुसारी नियम प्रसन्नतासे ही मानते हैं। यहाँ किसी श्रेणीके स्वार्थका प्रश्न ही नहीं उठता। जो वेदोंको किसी दूसरी श्रेणीके स्वार्थकी चीज समझते हैं, वे पुण्यकी दृष्टिसे उनका अध्ययन करना ही क्यो चाहेगे ? फिर उनके लिये निषेधका प्रश्न ही क्यो उठेगा ? जो विधिपूर्वक वेदाध्ययनसे जिस आधारपर किसीके लिये पुण्य मानेगा, उसी आधारपर किसीके लिये उसे पाप भी मानना ही पड़ेगा । आजकल मूर्तिपूजाके सम्बन्धमे भी यही बात है। पाषाणादि मूर्तिमें देवताका अस्तित्व माननेपर ही मूर्तिपूजाका प्रश्न उठता है। जो मूर्तिमे देवताकी सत्ता नहीं मानता, उसके लिये मूर्तिपूजाका प्रसङ्ग ही नही आता । प्रत्यक्षानुमानादिके आधारपर मूर्तिमे देवता सिद्ध हो, तब तो कम्युनिष्ट भी अवश्य ही मूर्तिपूजक बन जायेंगे । अतः कहना होगा कि प्रत्यक्षानुमानसे मूर्तिमे देवताका अस्तित्व एव उसकी पूजासे लाभ सिद्ध नहीं होता। केवल शास्त्रप्रमाण माननेसे ही मूर्तिमें प्रतिष्ठाविधिके मा० रा० ३६-

५६२ मार्क्सवाद और रामराज्य द्वारा देवताका आवाहन-प्रतिष्ठापन होता है, तभी उसकी पूजासे पुण्यकी बात उठती है । फलतः मूर्तिप्रतिष्ठा पूजादिविधायक शास्त्रोंमें विश्वास रखनेवाला जब मूर्तिपूजामें प्रवृत्त होगा तो उसे उस शास्त्रकी अन्य बातें भी माननी पड़ेगी । यदि शास्त्रोंके अनुसार ही मन्दिरस्थ प्रतिष्ठित मूर्तिमें और म्यूजियममें रहनेवाली मूर्तियों तथा आपणस्थ (बाजारमें बिकनेवाली) मूर्तियोंमें विशेषता सिद्ध होती है, तो उन्हीं शास्त्रोंके अनुसार यह भी मानना होगा कि अमुक-अमुक हेतुओंसे मूर्तिसे देवत्व नष्ट हो जाता है और अमुकको मूर्तिपूजासे कुछ लाभ न होगा किन्तु उलटा नुकसान होगा । यह सब बातें भी उन्हीं शास्त्रोंसे माननी पड़ेगी । शास्त्रोंकी दृष्टिसे न्याय-अन्यायका निर्णय किसी श्रेणीके हित या अहितकी दृष्टिसे नहीं होता । ब्राह्मणको राजसूय करना अधर्म कहा गया है, क्षत्रियके लिये वही धर्म है । वैश्यके लिये वाजपेय करना अधर्म कहा गया है वही ब्राह्मणके लिये धर्म है । इसी तरह वैश्यस्तोम, निषादस्थपति इष्टि, वैश्य एवं शूद्रविशेषके लिये धर्म है, अन्यके लिये अधर्म । यहाँ उन अनुष्ठाताओंके हिताहितकी दृष्टिसे धर्माधर्मका निर्णय किया गया है, शासक या धनवान् श्रेणीकी दृष्टिसे नहीं । औषध-विशेषके सेवनका विधि-निषेध रोगियोंके हिताहितसे सम्बन्ध रखता है, शासक-शासित-श्रेणियोंसे नहीं । किसी अवस्थामें किसी रोगीको किसी औषधसे लाभ हो सकता है और किसी औषधसे हानि । उसी दृष्टिसे विधि-निषेध होता है । हर जगह श्रेणी-स्वार्थकी बात जोड़ना कलुषित मनोवृत्तिका ही परिचायक है । इसी तरह अवस्था- विशेषमें दो पत्नीका होना तब भी धर्म था और अब भी धर्म है । अवस्था-विशेषमें वही तब भी अधर्म था और अब भी अधर्म है । यदि संतानके लिये, पिण्ड-श्राद्धके लिये अपने पूर्वजोंका नाम चलानेके लिये, पूर्व पत्नीकी सम्मतिसे ही दूसरा विवाह किया जाय तो इसमें अन्याय-जैसी कोई बात नहीं । कोई विधवा सती न होकर वैधव्य धर्म पालन करे तब भी उसकी सद्गति शास्त्रसम्मत है । वह धर्म उसपर लादा नहीं जाता, उसकी इच्छापर निर्भर है । यहाँ उसीके हिता- हितका सम्बन्ध है, अन्यका स्वार्थ नहीं । अथ च विधवाका सती होना तब भी धर्म था और अब भी धर्म है । कानून बन जानेमात्रसे धर्म-अधर्ममें भेद नहीं पड़ता । ईश्वरीय धर्माधर्ममें सरकारें रद्दोबदल, हस्तक्षेप करनेमें सर्वथा असमर्थ हैं, क्योंकि धर्माधर्मका वास्तविक फल देना सरकारोंके हाथकी बात ही नहीं है । इसी तरह रूसी कानूनसे व्यक्तिगत सम्पत्ति छीनना भी धर्म नहीं हो सकता । वस्तुतः जो कानून स्वार्थकी दृष्टिसे बनाये जाते हैं, कोई भी तटस्थ विवेचक उन कानूनोंको न्याय नहीं कह सकता । न्याय स्व-पर-पक्षपातविहीन होता है, जिसके आधारपर रामचन्द्रने एक विद्वान् बलवान् धनवान् ब्राह्मण एवं नगण्य श्वानके विवादमें अपराधी ब्राह्मणको ही दण्ड दिया था । धोबीके मुकाबिले

सीतातकको वनवास दिया था । शाहजहाँने हकीकतरायके मृत्युदण्डके बदलेमें काजीको भीषण दण्ड दिया, जो उसकी ही श्रेणीका था । सगरने अपने पुत्र असमञ्जस- को देशबहिष्कृत कर दिया था । अपराधी पुत्रको भी दण्ड देना, निरपराध शत्रुको भी दण्ड न देना ही न्याय कहलाता है । विश्वासघात, मित्रद्रोह, चोरी, व्यभिचार, परपीडन आदि अधर्म-अन्याय हैं । इसी प्रकार औचित्य-अनौचित्य, सत्य एव सिद्धान्तोके सम्बन्धमें भी मार्क्स- वादी कहते हैं कि 'ये कोई भी स्थिर नहीं होते ।' पर यदि सर्वसम्मत प्रमाण-न्याय, औचित्य, सत्यको आधार न माना जाय तो फिर कोई सिद्धान्त स्थिर करनेके लिये पुस्तकादि लिखनेका प्रयास भी मार्क्सने क्यो किया ? फिर तो उचित-अनुचित, प्रमाण-अप्रमाण, सत्तर्क-असत्तर्कसे कोई भी कुछ भी सिद्ध कर सकता है । फिर जब सभी सिद्धान्तों, सत्योंकी यही हालत है, तब मार्क्सद्वारा प्रचारित सिद्धान्तोंकी भी यही हालत होगी ।

मार्क्स और धर्म

भौतिकवादियोका कहना है कि "सभ्य मनुष्यका विश्वास है कि आध्यात्मिक शक्ति सदा मङ्गलमय है, लेकिन असभ्य मनुष्यके लिये यह शक्ति निष्ठुर है, इसलिये सदा ही उसको विपत्तिमें डालती रहती है । पत्थर जब गिरकर आदमीको घायल करता है, अचानक पेड़की डाल टूट जाती है, तब यह सब प्रकारके भूतों या पेड़के भूतकी शैतानीको छोड़कर और क्या है ? जबतक औजार—हथियारोंके ज्ञानकी वृद्धि नहीं हुई, तबतक असभ्य मनुष्य भूतोको वशीभूत करनेके लिये मन्त्र-तन्त्रके ही फेरमें पड़ा रहा । हथियार-औजारोंके ज्ञान बढ़नेके साथ-साथ प्राकृतिक शक्तिपर मनुष्यकी प्रभुता बढ़ने लगी । 'भौतिक शक्ति निष्ठुर ही नहीं है, बल्कि यह भलाई भी कर सकती है', जब इस धारणाका जन्म हुआ तब असभ्य मनुष्यके प्रेततत्त्व- पर सभ्यताकी मुहर पड़ी । प्रेत-तत्त्व असभ्य मनुष्यका है, देवता-तत्त्व इसके ऊपरकी सीढ़ी है—जो सभ्य मनुष्यका है । आदिम असभ्य मनुष्यके लिये प्रकृति निष्ठुर भयावह है । प्रकृतिके रहस्यका भेद जानकर सभ्य मनुष्य कहने लगा— 'मङ्गलमयी विश्वजननी' । यह परिवर्तन अकस्मात् एक दिनमे नहीं हो गया । आदिम भूत-प्रेतोंने सभ्य होकर यह रूप ग्रहण किया है । आदिम मनुष्यका प्रेत- तत्त्व सभ्यताकी सीढ़ीपर चढ़कर सूक्ष्म बन गया है । प्रकृति-जगत्को चलानेवाली है असख्य निष्ठुर प्रेतोंकी शक्ति; और इसी प्राथमिक कल्पनाका संशोधितरूप है देवताओकी कल्पना । ये सब देवता प्रकृति-जगत्के एक-एक हिस्सेके मालिक हैं । ये भलाई भी करते हैं और बुराई भी कर सकते हैं । जल, अग्नि, वायु—सभी प्राकृतिक शक्तियाँ किसी-न-किसी देवताके अधीन हैं । देव-समाज भी मनुष्य- समाजके साँचेपर ढला हुआहै । ये असंख्य देवता घटते-घटते एकईश्वरतक पहुँचे ।

५६४ मार्क्सवाद और रामराज्य सभ्यताकी सीढ़ीपर चढ़कर वस्तु-जगत्‌के विषयमें मनुष्यका ज्ञान ज्यो-ज्यो बढ़ने लगा, त्यो त्यो देवताओकी संख्या घटने लगी । मनुष्य ज्यो अगणित पदार्थोंमें एक मेल देखने लगा, त्यो देवताओका बहुत्व भी एकत्वमें परिणत हो गया ।’ “पहले भूत या चैतन्य ? इस प्रश्नका आदिम असभ्य जातियोके प्रेत-तत्त्वसे बहुत निकट सम्बन्ध है । इस बातको स्मरण रखना चाहिये कि आदिम असभ्य मनुष्यको जीवनकी प्राथमिक बाते सोचनी पडी थी । अनुमानके ऊपर प्रतिष्ठित मन्त्र-तन्त्रोके द्वारा उसको जीवन-धारणका कौशल सीखना पड़ा था । उसकी यह कोशिश चाहे जितने बचपनकी हो, उसका मूल है जीवन-धारणकी अभिलाषा । इसलिये जीवन-मरणके रहस्यने आदिम मनुष्यको काफी चिन्तित कर डाला था । मनुष्यका शरीर जीवित-अवस्थामें एक प्रकारका और मरनेपर दूसरे प्रकारका क्यो होता है, जागरण, निद्रा, स्वप्न, रोग और व्याधि—ये सब क्यो होती हैं, स्वप्नमें जो मनुष्य-मूर्तियाँ दिखायी देती हैं, वे सब क्या हैं, स्वप्नमे मनुष्योकी जो छाया-मूर्तियाँ दिखायी देती हैं, वही शायद जीवनकी कुजी है, शायद इस छायामूर्तिका शरीर छोड़ना ही मृत्यु है—असभ्य मनुष्यकी प्रेतात्माकी धारणा इसी प्रकार बनी है । यहाँ इस धारणाकी ऐतिहासिक आलोचना करनेकी आवश्यकता नही, लेकिन इसमें सदेह नहीं कि यही प्रेतात्मा सभ्यताके साबुनमे धुलकर चैतन्य परमात्मा आदि बन गयी है । मानव आत्माके विषयमे असभ्य जातियोकी धारणा है कि यह सूक्ष्म भापकी तरह है । इसके शरीर त्याग देनेसे मृत्यु हो जाती है । “मनुष्य तथा अन्य उन्नत प्राणियोके शरीर-धारणके लिये श्वासक्रिया बहुत ही आवश्यक है । मरते समय श्वासक्रिया क्षीण होते होते बंद हो जाती है । आदिम असभ्य जातियोने भी इसको देखा था । इसीलिये श्वासक्रियाको ही उन्होने आत्मा मान लिया था । आस्ट्रेलियाके आदिम निवासियोको भाषामे ‘श्वास’ और ‘आत्मा’ इन सबके लिये एक ही शब्द है । हिन्दू तथा सभी आर्य भाषाओके भाषा-विज्ञानमें श्वास और आत्मबोधक शब्दोका निकट सम्बन्ध है । यूनानी ‘साइके’ और ‘न्यूमा’, लैटिन ‘एनिमस’, ‘एनिमा’, ‘स्पिरीट्स’, इनका रूप-परिवर्तन इसी प्रकारसे हुआ है ।” इसपर कहना यह है कि यद्यपि मस्तिष्क अतिभौतिक प्रतीत न हो, तथापि यह तो नहीं कहा जा सकता कि जिससे जो निश्चित हो, वह उसका स्वरूप ही होता है । यदि ऐसी ही बात हो तब तो ज्ञानसे ही सब ज्ञेय निश्चित किया जाता है, यहाँतक कि मस्तिष्क भी ज्ञानसे ही निश्चित किया जाता है, फिर क्या भौतिकवादी सबको ही ज्ञानस्वरूप माननेको तैयार हैं ? यदि नहीं, तब तो भले ही भौतिक मस्तिष्कसे ही ईश्वर विदित हो, परंतु वह भौतिक नही कहा जा सकता । स्वयं इन्द्रियाँ नीरूप एवं सूक्ष्म हैं, परंतु उनसे रूपादिमान् स्थूल प्रपञ्च विदित होता

ही है। इसी तरह मस्तिष्क आदिद्वारा अभौतिक आत्मा, ब्रह्म आदिका बोध होता ही है। परिवर्तनशील भौतिकवादियोंका भूत ही नयी-नयी पोशाकोंमें भले उपस्थित हो, उपनिषदोंका ब्रह्म तो सदासे ही औपाधिकरूपमें अनेक रस और निरुपाधिक- रूपसे एकरस ही रहा है और वैसे ही रहेगा। जिसको भौतिकवादी वस्तु कहते हैं, वही अवस्तु है। जिसे वे अवस्तु समझते हैं, विचारकी दृष्टिसे वही वस्तु है। स्थूलदर्शी कार्यको ही वस्तु समझता है। एक स्थूलदर्शी पटको सत्य मानता है, परंतु एक सूक्ष्मदर्शी तन्तुभिन्न पटको ही असत् कहता है। इसी तरह कारण- परम्पराका विचार करते हुए तन्तु भी अंशुसे भिन्न असत् है। अंशु भी बिनौला- मात्र है, बिनौला भी पृथ्वीमात्र है, पृथ्वी भी जलमात्र ही है, जल तेजसे भिन्न होकर कुछ नहीं ठहरता। तेज वायुमात्र है, वायु आकाशमात्र ठहरता है; किंतु स्थूलदर्शियोंको यह सब ढोंग ही जँचता है। अन्तिम सत्यका विचार सर्वदा ही उपयुक्त है, चाहे श्रेणीविभाजित जीवन हो चाहे समष्टिवादी जीवन। सभीके लिये विक्षेपशून्य, निष्प्रपञ्च, सत्य, स्वप्रकाश ब्रह्म अपेक्षित है। इन्द्र भी अनन्त आनन्दसामग्री भुलाकर निष्प्रपञ्च सौषुप्त सुखकी ओर प्रवृत्त होता है। कोई कितना भी निर्द्वन्द्व, शान्त एव सुखी क्यो न हो, सुषुप्तिकी निष्प्रपञ्चताके बिना उसे विश्राम नहीं मिलता। 'ईश्वरको न युक्तिसे जाना जा सकता है, न उसे प्रकाशित किया जा सकता है' यह कान्ट का कथन; तथा 'ईश्वर वाङ्मनसगोचर नहीं है' यह हिंदूदर्शनोंका कथन, यह सिद्ध नहीं करते कि ईश्वर अवास्तव एव असत् है। किंतु उनका अभिप्राय यही है कि श्रद्धा, समाधान तथा एकाग्रताके बिना ईश्वरका साक्षात्कार नही हो सकता। ईश्वरके अस्तित्वमें अनुमान, आगमादि अनेको प्रमाण हैं। श्रुति ब्रह्म या आत्माको साक्षात् अपरोक्ष ही बतलाती है—'यदेव साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म ।' (बृहदा० उप० ३। ५। १) विज्ञाता प्रमाता प्रमाणानपेक्षरूपसे ही स्वतःसिद्ध होता है। सशय, विपर्यय एवं अज्ञान मिटानेके लिये ही प्रमाण अपेक्षित होते हैं। आत्मा अन्यत्र सदिहान होता हुआ भी स्वयं असंदिग्ध है, अन्यत्र विपर्ययज्ञानवान् होता हुआ भी स्वयं अविपर्यस्त रहता है। अन्यत्र अनुमिमान होता हुआ भी (अनुमान करता हुआ भी) स्वयं अपरोक्ष रहता है। फिर प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय आदि सभी जिस अखण्ड बोधके अनुग्रहसे भासित होते हैं, उसे किससे सिद्ध किया जाय ? यही बात 'विज्ञातारमरे केन विजानीयात्' इत्यादि श्रुतियोद्वारा कही गयी है। अतएव प्रमाणसिद्ध एव स्वतःसिद्ध ईश्वर या ब्रह्म परमकल्याणकारी होनेसे ग्राह्य, उपास्य एव ज्ञेय है। अनादि स्वतःसिद्ध वस्तुको बुद्ध्यारूढ करनेके लिये युक्ति, श्रुति आदि अपेक्षित होती है। इतिहास घटनाओं- का ही होता है, फिर भी औपचारिकरूपसे 'तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्', 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' इत्यादि श्रौत इतिहासके आधारपर सर्वकारण-स्वप्रकाश ब्रह्म- का अस्तित्व सिद्ध होता ही है। तदनुगुण युक्ति भी श्रुतिने ही दी है। जैसे अन्न