मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएक पुरुषको दो पत्नियाँ रखना न्याय था । विधवाका सती होना महापुण्य था, परंतु आज वह अपराध है। न्याय क्या है, इसका निर्णय रहता है उन लोगोंके फैसलेपर, जिनके हाथमें शक्ति रहती है। जिस श्रेणीके हाथमें पैदावारके साधन होते हैं, वही न्याय अन्यायका निर्णय करती है । जिससे उनके हितोंकी रक्षा हो, उनके हाथमें शक्ति बनी रहे, उसी ढगके तरीकोको वे न्याय कहा करते हैं। पूँजी- वादी समाजमें जिस तरह पूँजीपतिके कब्जेमें पूँजी बनी रहे, वही न्याय है। वे व्यक्तिकी पूँजी छीननेको महापाप बतलाते हे । समाजमे मुनाफा कमाकर पूँजी बढानेके अधिकारको न्याय कहते हैं । कम मूल्यमें सौदा खरीदकर अधिक दाममें वेचने, सौ रुपयेका काम कराकर नौकरको पचास रुपया देनेको भी न्याय कहते हैं। रूस इन सब बातोको अन्याय समझता है। पूँजीवादी देशोंमें पूँजीपतिके हितकी बात न्याय है। और रूसमें मजदूरोके हितकी बात न्याय है।' वस्तुतः ऐसी ही भ्रान्त धारणाओंके कारण भौतिकवादी अपने विरोधियोंको कुचलनेके लिये अमानवताका व्यवहार करते हैं और उसे भी न्याय समझते हैं। समाजके नामपर व्यक्तियोंकी भूमि-सम्पत्ति छीनकर विचार-स्वातन्त्र्यपर प्रतिबन्ध लगाकर व्यक्तियोके शरीर, वाणी एव मस्तिष्कपर ताला लगा देने-जैसे बुरे-से-बुरे पापको अपनी हित-रक्षाका साधन समझकर उसे न्याय कहते हैं। भारतमे विद्या, ज्ञान, जानकारीपर कभी भी प्रतिबन्ध नहीं था । विदुर, धर्मव्याध, मूक आदि शूद्र एव अन्त्यज भी परम ज्ञानवान् थे और समाजमे आदरणीय थे । बड़े-बड़े ब्राह्मण, ऋषि-महर्षि भी धर्मव्याधके पास धार्मिक परामर्शके लिये जाते थे । जिन वेदादि ग्रन्थोका विधिपूर्वक अध्ययन पुण्यविशेषकी दृष्टिसे जिन वर्णोंके लिये विहित है, उनका अध्ययन उन्हींके लिये आज भी है, तब भी था। जो वेदादि शास्त्रके अनुसार अदृष्ट अर्थमे विश्वास रखते हैं वे तदनुसारी नियम प्रसन्नतासे ही मानते हैं। यहाँ किसी श्रेणीके स्वार्थका प्रश्न ही नहीं उठता। जो वेदोंको किसी दूसरी श्रेणीके स्वार्थकी चीज समझते हैं, वे पुण्यकी दृष्टिसे उनका अध्ययन करना ही क्यो चाहेगे ? फिर उनके लिये निषेधका प्रश्न ही क्यो उठेगा ? जो विधिपूर्वक वेदाध्ययनसे जिस आधारपर किसीके लिये पुण्य मानेगा, उसी आधारपर किसीके लिये उसे पाप भी मानना ही पड़ेगा । आजकल मूर्तिपूजाके सम्बन्धमे भी यही बात है। पाषाणादि मूर्तिमें देवताका अस्तित्व माननेपर ही मूर्तिपूजाका प्रश्न उठता है। जो मूर्तिमे देवताकी सत्ता नहीं मानता, उसके लिये मूर्तिपूजाका प्रसङ्ग ही नही आता । प्रत्यक्षानुमानादिके आधारपर मूर्तिमे देवता सिद्ध हो, तब तो कम्युनिष्ट भी अवश्य ही मूर्तिपूजक बन जायेंगे । अतः कहना होगा कि प्रत्यक्षानुमानसे मूर्तिमे देवताका अस्तित्व एव उसकी पूजासे लाभ सिद्ध नहीं होता। केवल शास्त्रप्रमाण माननेसे ही मूर्तिमें प्रतिष्ठाविधिके मा० रा० ३६-