भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मानना एवं उसके निर्दिष्ट नियमोंको न मानना यह अर्धजरतीयन्याय कैसे चलेगा ? अपरिवर्तनीय ईश्वर एवं धर्मको मानते हुए व्यक्तिगत सम्पत्ति-भूमिका समाजी- करणके नामपर छीनना कथमपि नहीं हो सकता । मार्क्सवादी कहते हैं कि धार्मिक, आध्यात्मिक विचारवाले समाजकी प्रगतिका सदा ही विरोध करते हैं । फ्रांसके वाल्टेयरने कहा था कि यदि परमेश्वर नहीं है तो हमें स्वयं परमेश्वर गढ़ लेना चाहिये, क्योकि उसका भय मनुष्योंको उचित मार्गपर चलानेमें सहायक होता है । परंतु मार्क्स ऐसे काल्पनिक भयसे लाभकी अपेक्षा हानि ही देखता है । उसे भय है कि ईश्वर माननेवाला व्यक्ति ईश्वरीय शास्त्र एवं ईश्वरीय नियमोंको भी माननेके लिये बाध्य होता है । फिर उसे श्रेणी-संघर्ष एवं किसी व्यक्तिगत सम्पत्ति एवं भूमिके छीन लेनेके सिद्धान्तमें विश्वास जमना असम्भव हो जायगा । वस्तुतः ईमानदारीकी बात यही है कि मार्क्सवादी, ईश्वरवादी दोनोंका समन्वय हो नहीं सकता । अन्ततः जो ईश्वरवादी हैं उन्हे मार्क्सवाद छोड़ना ही पड़ेगा । मार्क्सकी अर्थनीति ईश्वर एवं धर्मके रहते-रहते चल ही नहीं सकती । ईश्वरवादी मार्क्सवादी बनकर या तो मार्क्सवादियोंको धोखा देते हैं या अपनेको धोखा देते हैं । जब भौतिक सूक्ष्म वस्तुओंके ज्ञानमें अणुवीक्षण आदि अनेक साधन अपेक्षित होते हैं तब परमाणु एवं आकाशसे भी परम सूक्ष्म अह महान् अव्यक्त एवं इन सब- से परम सूक्ष्म स्वप्रकाश सत्स्वरूप परमेश्वर बिना साधनोंके कैसे बुद्ध्यारूढ़ हो सकता है। स्वधर्मानुष्ठानद्वारा शुद्धान्तःकरण प्राणी विवेक, वैराग्य, शान्ति, दान्ति, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा-समाधान एवं मुमुक्षुत्व आदिसे युक्त होकर उपनिषद्, गीता, ब्रह्मसूत्रका विचार करनेसे परमेश्वरको समझ सकता है । शङ्कराचार्य उदयनाचार्यके तर्कोंको सुनकर कोई समझदार पुरुष नहीं कह सकता कि ईश्वर भीरु मस्तिष्ककी कल्पना है या अन्धविश्वासकी चीज है । अभय सत्त्वशुद्धि ज्ञानयोगव्यवस्थिति- पूर्ण तर्क एव योगाभ्यासजनित एकाग्रता आदि जिसके समझनेके साधन हैं उसे अन्ध- विश्वासकी बात समझना बड़ी भयंकर मूर्खता है । भूत-प्रेतकी कल्पनाने ही परिष्कृत होकर निर्गुण ब्रह्मकल्पनाका रूप ले लिया, यह कथन भी अनभिज्ञतामूलक है, लाखों वरस पहलेसे ही सबकी मान्यता साथ-साथ चली आ रही है । तामस प्राणियोंके लिये भूत-प्रेत, सात्त्विकोंके लिये देवी-देवता एवं सर्वोच्च अधिकारीके लिये सगुण परमेश्वर एव साक्षात्कारसम्पन्न अत्यन्त अन्तर्मुखके लिये निर्गुणब्रह्मका उपदेश है। तत्त्वविद् भी व्यावहारिक दृष्टिसे सबका सम्मान करता है। कर्मकाण्ड, देवता आदिकी व्यावहारिक सत्ता तत्त्ववित्को ही नहीं अपितु सर्वज्ञशिरोमणि ईश्वरको भी मान्य है। उत्पत्तिके साधन और न्याय मार्क्सवादी कहते हैं कि 'न्याय भी सदा एक-सा नहीं रहता; किंतु उसमें रद्दोबदल होता रहता है। जैसे प्राचीन भारतमें शूद्रोंका विद्या पढ़ना अन्याय और