भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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कई लोग आजकल कहते हैं कि 'आस्तिकलोग जीने-मरने, स्वर्ग-नरककी ही चिन्तामें परेशान रहते हैं । इसीलिये उन्होंने लौकिक-भौतिक उन्नतिमें सफलता नहीं पायी । भौतिक लोग स्वर्ग-नरककी चिन्तासे मुक्त थे, अतः वैज्ञानिक उन्नतिमें बढ़ गये । परन्तु यह उनका भ्रम है, हम भौतिक वैज्ञानिक उन्नतिकी चर्चा कर आये हैं । अलबत्ता आत्मा-परमात्मा माननेवाला, स्वर्ग-नरकविश्वासी प्राणियोंको परमेश्वरका अंश मानकर उन्हें सतानेमें सकुचायेगा । कोई प्राणी एक कारी- गरके बनाये हुए खिलौनेको बिगाड़नेमें सकुचाता है, फिर कोई समझदार ईश्वरके बनाये प्राणियोंको सताने या मौतके घाट उतारनेसे अवश्य सकुचायेगा । भौतिक- वादी पाप पुण्य, स्वर्ग-नरकसे डरते नहीं, अतः भीषण-से-भीषण नरसंहारमें, प्राणि- संहारमें उन्हें कुछ भी संकोच नहीं। उसका स्वार्थ भीषण-से-भीषण घृणित-से- घृणित कार्यसे भी सम्पन्न हो तो भी वे स्वार्थ-साधनके लिये तैयार हो जाते हैं। मार्क्सके दर्शन, जीव-विकास एवं मृत्यु आदिकी समालोचना पिछले प्रकरणमें की जा चुकी है। डार्विन हैक्ल आदिके सिद्धान्त भारतीय दर्शनोंकी कसौटीपर मिनट- भर भी नहीं ठहरते । बहुत से समाजवादी मार्क्सवादी भी मार्क्सके अर्थसम्बन्धी दर्शनसे सहमत होते हुए भी उसके अध्यात्मविचारसे सहमत नहीं होते । अनेकों लोग समाज- वादी होते हुए भी ईश्वर एवं धर्ममें विश्वास रखते हैं । विशेषतः भारतमे हजारमे नौ सौ निन्यानवे समाजवादी धार्मिक एवं ईश्वरवादी होते हैं, परंतु मार्क्सवादी दृष्टिकोणसे वे गलत रास्तेपर ही समझे जाते हैं । यह दुरंगा ढंग उनकी दृष्टिमें सर्वथा अवैज्ञानिक है । उनका कहना है कि जब आत्मा-परमात्माका अस्तित्व विज्ञान एवं तर्कद्वारा सिद्ध नहीं होता तो वह क्यों माना जाय ? ईश्वर इन्द्रियोंका विषय नहीं, किंतु अनुभवका विषय है। ऐसे विश्वासोको अन्ध विश्वास ही कहते हैं । उनके मतानुसार भूत-प्रेतकी कल्पनाके समान ही ईश्वरकी कल्पना है। वे कहते हैं कि विज्ञानकी उन्नतिके लिये मनुष्यने ईश्वरकी कल्पनामें भी उन्नति कर ली है । आरम्भकालकी भूत-प्रेतकी कल्पना ही मध्यकालमे परिष्कृत होकर देवी-देवताके रूपमें प्रकट होती है। अधिक प्रगतिशील युगमें देवी देवताकी कल्पना भी परिष्कृत होकर एक ईश्वरका रूप ले लेती है और परिष्कृत होकर वही कल्पना अद्वैत निर्गुण-निराकार ब्रह्मका रूप धारण कर लेती है । मार्क्सका कहना है कि जो वस्तु है ही नहीं उसपर विश्वास करनेसे क्या लाभ ? और झूठी कल्पनासे मनुष्यको क्या आश्रय मिलेगा ? और क्या उत्थान होगा ? सबसे बडी अडचन यह है कि अध्यात्म- वादियोके मतानुसार आत्मा परमात्मामें परिवर्तन नहीं होता । सुतरा ईश्वरनिर्दिष्ट धार्मिक-सामाजिक नियमोंमें भी रद्दोबदल नहीं हो सकता । परंतु मार्क्सके मता- नुसार कोई धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक नियम शाश्वत नहीं है। उनमें रद्दोबदल होता ही रहता है । तभी उसका राष्ट्रीयकरण समाजीकरण चल सकता है । ईश्वर