भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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५६२ मार्क्सवाद और रामराज्य द्वारा देवताका आवाहन-प्रतिष्ठापन होता है, तभी उसकी पूजासे पुण्यकी बात उठती है । फलतः मूर्तिप्रतिष्ठा पूजादिविधायक शास्त्रोंमें विश्वास रखनेवाला जब मूर्तिपूजामें प्रवृत्त होगा तो उसे उस शास्त्रकी अन्य बातें भी माननी पड़ेगी । यदि शास्त्रोंके अनुसार ही मन्दिरस्थ प्रतिष्ठित मूर्तिमें और म्यूजियममें रहनेवाली मूर्तियों तथा आपणस्थ (बाजारमें बिकनेवाली) मूर्तियोंमें विशेषता सिद्ध होती है, तो उन्हीं शास्त्रोंके अनुसार यह भी मानना होगा कि अमुक-अमुक हेतुओंसे मूर्तिसे देवत्व नष्ट हो जाता है और अमुकको मूर्तिपूजासे कुछ लाभ न होगा किन्तु उलटा नुकसान होगा । यह सब बातें भी उन्हीं शास्त्रोंसे माननी पड़ेगी । शास्त्रोंकी दृष्टिसे न्याय-अन्यायका निर्णय किसी श्रेणीके हित या अहितकी दृष्टिसे नहीं होता । ब्राह्मणको राजसूय करना अधर्म कहा गया है, क्षत्रियके लिये वही धर्म है । वैश्यके लिये वाजपेय करना अधर्म कहा गया है वही ब्राह्मणके लिये धर्म है । इसी तरह वैश्यस्तोम, निषादस्थपति इष्टि, वैश्य एवं शूद्रविशेषके लिये धर्म है, अन्यके लिये अधर्म । यहाँ उन अनुष्ठाताओंके हिताहितकी दृष्टिसे धर्माधर्मका निर्णय किया गया है, शासक या धनवान् श्रेणीकी दृष्टिसे नहीं । औषध-विशेषके सेवनका विधि-निषेध रोगियोंके हिताहितसे सम्बन्ध रखता है, शासक-शासित-श्रेणियोंसे नहीं । किसी अवस्थामें किसी रोगीको किसी औषधसे लाभ हो सकता है और किसी औषधसे हानि । उसी दृष्टिसे विधि-निषेध होता है । हर जगह श्रेणी-स्वार्थकी बात जोड़ना कलुषित मनोवृत्तिका ही परिचायक है । इसी तरह अवस्था- विशेषमें दो पत्नीका होना तब भी धर्म था और अब भी धर्म है । अवस्था-विशेषमें वही तब भी अधर्म था और अब भी अधर्म है । यदि संतानके लिये, पिण्ड-श्राद्धके लिये अपने पूर्वजोंका नाम चलानेके लिये, पूर्व पत्नीकी सम्मतिसे ही दूसरा विवाह किया जाय तो इसमें अन्याय-जैसी कोई बात नहीं । कोई विधवा सती न होकर वैधव्य धर्म पालन करे तब भी उसकी सद्गति शास्त्रसम्मत है । वह धर्म उसपर लादा नहीं जाता, उसकी इच्छापर निर्भर है । यहाँ उसीके हिता- हितका सम्बन्ध है, अन्यका स्वार्थ नहीं । अथ च विधवाका सती होना तब भी धर्म था और अब भी धर्म है । कानून बन जानेमात्रसे धर्म-अधर्ममें भेद नहीं पड़ता । ईश्वरीय धर्माधर्ममें सरकारें रद्दोबदल, हस्तक्षेप करनेमें सर्वथा असमर्थ हैं, क्योंकि धर्माधर्मका वास्तविक फल देना सरकारोंके हाथकी बात ही नहीं है । इसी तरह रूसी कानूनसे व्यक्तिगत सम्पत्ति छीनना भी धर्म नहीं हो सकता । वस्तुतः जो कानून स्वार्थकी दृष्टिसे बनाये जाते हैं, कोई भी तटस्थ विवेचक उन कानूनोंको न्याय नहीं कह सकता । न्याय स्व-पर-पक्षपातविहीन होता है, जिसके आधारपर रामचन्द्रने एक विद्वान् बलवान् धनवान् ब्राह्मण एवं नगण्य श्वानके विवादमें अपराधी ब्राह्मणको ही दण्ड दिया था । धोबीके मुकाबिले