मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 322, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंसीतातकको वनवास दिया था । शाहजहाँने हकीकतरायके मृत्युदण्डके बदलेमें काजीको भीषण दण्ड दिया, जो उसकी ही श्रेणीका था । सगरने अपने पुत्र असमञ्जस- को देशबहिष्कृत कर दिया था । अपराधी पुत्रको भी दण्ड देना, निरपराध शत्रुको भी दण्ड न देना ही न्याय कहलाता है । विश्वासघात, मित्रद्रोह, चोरी, व्यभिचार, परपीडन आदि अधर्म-अन्याय हैं । इसी प्रकार औचित्य-अनौचित्य, सत्य एव सिद्धान्तोके सम्बन्धमें भी मार्क्स- वादी कहते हैं कि 'ये कोई भी स्थिर नहीं होते ।' पर यदि सर्वसम्मत प्रमाण-न्याय, औचित्य, सत्यको आधार न माना जाय तो फिर कोई सिद्धान्त स्थिर करनेके लिये पुस्तकादि लिखनेका प्रयास भी मार्क्सने क्यो किया ? फिर तो उचित-अनुचित, प्रमाण-अप्रमाण, सत्तर्क-असत्तर्कसे कोई भी कुछ भी सिद्ध कर सकता है । फिर जब सभी सिद्धान्तों, सत्योंकी यही हालत है, तब मार्क्सद्वारा प्रचारित सिद्धान्तोंकी भी यही हालत होगी ।
मार्क्स और धर्म
भौतिकवादियोका कहना है कि "सभ्य मनुष्यका विश्वास है कि आध्यात्मिक शक्ति सदा मङ्गलमय है, लेकिन असभ्य मनुष्यके लिये यह शक्ति निष्ठुर है, इसलिये सदा ही उसको विपत्तिमें डालती रहती है । पत्थर जब गिरकर आदमीको घायल करता है, अचानक पेड़की डाल टूट जाती है, तब यह सब प्रकारके भूतों या पेड़के भूतकी शैतानीको छोड़कर और क्या है ? जबतक औजार—हथियारोंके ज्ञानकी वृद्धि नहीं हुई, तबतक असभ्य मनुष्य भूतोको वशीभूत करनेके लिये मन्त्र-तन्त्रके ही फेरमें पड़ा रहा । हथियार-औजारोंके ज्ञान बढ़नेके साथ-साथ प्राकृतिक शक्तिपर मनुष्यकी प्रभुता बढ़ने लगी । 'भौतिक शक्ति निष्ठुर ही नहीं है, बल्कि यह भलाई भी कर सकती है', जब इस धारणाका जन्म हुआ तब असभ्य मनुष्यके प्रेततत्त्व- पर सभ्यताकी मुहर पड़ी । प्रेत-तत्त्व असभ्य मनुष्यका है, देवता-तत्त्व इसके ऊपरकी सीढ़ी है—जो सभ्य मनुष्यका है । आदिम असभ्य मनुष्यके लिये प्रकृति निष्ठुर भयावह है । प्रकृतिके रहस्यका भेद जानकर सभ्य मनुष्य कहने लगा— 'मङ्गलमयी विश्वजननी' । यह परिवर्तन अकस्मात् एक दिनमे नहीं हो गया । आदिम भूत-प्रेतोंने सभ्य होकर यह रूप ग्रहण किया है । आदिम मनुष्यका प्रेत- तत्त्व सभ्यताकी सीढ़ीपर चढ़कर सूक्ष्म बन गया है । प्रकृति-जगत्को चलानेवाली है असख्य निष्ठुर प्रेतोंकी शक्ति; और इसी प्राथमिक कल्पनाका संशोधितरूप है देवताओकी कल्पना । ये सब देवता प्रकृति-जगत्के एक-एक हिस्सेके मालिक हैं । ये भलाई भी करते हैं और बुराई भी कर सकते हैं । जल, अग्नि, वायु—सभी प्राकृतिक शक्तियाँ किसी-न-किसी देवताके अधीन हैं । देव-समाज भी मनुष्य- समाजके साँचेपर ढला हुआहै । ये असंख्य देवता घटते-घटते एकईश्वरतक पहुँचे ।