मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६४ मार्क्सवाद और रामराज्य सभ्यताकी सीढ़ीपर चढ़कर वस्तु-जगत्के विषयमें मनुष्यका ज्ञान ज्यो-ज्यो बढ़ने लगा, त्यो त्यो देवताओकी संख्या घटने लगी । मनुष्य ज्यो अगणित पदार्थोंमें एक मेल देखने लगा, त्यो देवताओका बहुत्व भी एकत्वमें परिणत हो गया ।’ “पहले भूत या चैतन्य ? इस प्रश्नका आदिम असभ्य जातियोके प्रेत-तत्त्वसे बहुत निकट सम्बन्ध है । इस बातको स्मरण रखना चाहिये कि आदिम असभ्य मनुष्यको जीवनकी प्राथमिक बाते सोचनी पडी थी । अनुमानके ऊपर प्रतिष्ठित मन्त्र-तन्त्रोके द्वारा उसको जीवन-धारणका कौशल सीखना पड़ा था । उसकी यह कोशिश चाहे जितने बचपनकी हो, उसका मूल है जीवन-धारणकी अभिलाषा । इसलिये जीवन-मरणके रहस्यने आदिम मनुष्यको काफी चिन्तित कर डाला था । मनुष्यका शरीर जीवित-अवस्थामें एक प्रकारका और मरनेपर दूसरे प्रकारका क्यो होता है, जागरण, निद्रा, स्वप्न, रोग और व्याधि—ये सब क्यो होती हैं, स्वप्नमें जो मनुष्य-मूर्तियाँ दिखायी देती हैं, वे सब क्या हैं, स्वप्नमे मनुष्योकी जो छाया-मूर्तियाँ दिखायी देती हैं, वही शायद जीवनकी कुजी है, शायद इस छायामूर्तिका शरीर छोड़ना ही मृत्यु है—असभ्य मनुष्यकी प्रेतात्माकी धारणा इसी प्रकार बनी है । यहाँ इस धारणाकी ऐतिहासिक आलोचना करनेकी आवश्यकता नही, लेकिन इसमें सदेह नहीं कि यही प्रेतात्मा सभ्यताके साबुनमे धुलकर चैतन्य परमात्मा आदि बन गयी है । मानव आत्माके विषयमे असभ्य जातियोकी धारणा है कि यह सूक्ष्म भापकी तरह है । इसके शरीर त्याग देनेसे मृत्यु हो जाती है । “मनुष्य तथा अन्य उन्नत प्राणियोके शरीर-धारणके लिये श्वासक्रिया बहुत ही आवश्यक है । मरते समय श्वासक्रिया क्षीण होते होते बंद हो जाती है । आदिम असभ्य जातियोने भी इसको देखा था । इसीलिये श्वासक्रियाको ही उन्होने आत्मा मान लिया था । आस्ट्रेलियाके आदिम निवासियोको भाषामे ‘श्वास’ और ‘आत्मा’ इन सबके लिये एक ही शब्द है । हिन्दू तथा सभी आर्य भाषाओके भाषा-विज्ञानमें श्वास और आत्मबोधक शब्दोका निकट सम्बन्ध है । यूनानी ‘साइके’ और ‘न्यूमा’, लैटिन ‘एनिमस’, ‘एनिमा’, ‘स्पिरीट्स’, इनका रूप-परिवर्तन इसी प्रकारसे हुआ है ।” इसपर कहना यह है कि यद्यपि मस्तिष्क अतिभौतिक प्रतीत न हो, तथापि यह तो नहीं कहा जा सकता कि जिससे जो निश्चित हो, वह उसका स्वरूप ही होता है । यदि ऐसी ही बात हो तब तो ज्ञानसे ही सब ज्ञेय निश्चित किया जाता है, यहाँतक कि मस्तिष्क भी ज्ञानसे ही निश्चित किया जाता है, फिर क्या भौतिकवादी सबको ही ज्ञानस्वरूप माननेको तैयार हैं ? यदि नहीं, तब तो भले ही भौतिक मस्तिष्कसे ही ईश्वर विदित हो, परंतु वह भौतिक नही कहा जा सकता । स्वयं इन्द्रियाँ नीरूप एवं सूक्ष्म हैं, परंतु उनसे रूपादिमान् स्थूल प्रपञ्च विदित होता