भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्स-दर्शन ५५३ 'योगजविशेषता नहीं होती' यह कहना मूर्खता होगी । स्पष्ट ही देखते हैं कि 'जब चित्त शान्त, एकाग्र होता है तो सूक्ष्म ज्ञान उत्पन्न होता है । चित्तके चञ्चल एवं अशान्त होनेपर आँखों-देखी, कानों-सुनी बातोंका भी ठीक-ठीक ज्ञान नहीं होता ।' वाल्मीकीय रामायणके लिये ब्रह्माका वरदान है—'न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति' (वाल्मी० १।२।३३) इस काव्यमें तुम्हारा एक भी वाक्य अनृत नहीं होगा । यदि ये सब बातें झूठी हैं, तो जडवादियोंकी सम्पूर्ण ऐतिहासिक कल्पनाएँ और उनके कार्यकारणभाव भी सुतरां झूठे हैं । मनुष्योंको विचारने, सोचने, उन्नत करनेमें अवश्य स्वतन्त्रता है, परंतु उनके लिये भी शिक्षण, मार्गदर्शन अपेक्षित होते हैं । आज भी शिक्षणादिकी आवश्यकता सूर्यके समान स्पष्ट है । सर्वज्ञ ईश्वर, आप्त, महातपा, महर्षियोंके शिक्षण मार्गदर्शनके अनुसार सोचने, विचारने, उन्नतिके प्रयत्न करनेसे सफलता निश्चित होती है, मनमानी करनेसे भटककर परेशान होना पडता है । आज भी न्याय, नीति, शिक्षा, शिल्पादिके सम्बन्धमें परम्परासे ही शिक्षा ली जाती है । अदालतोंमें भी पुरानी नजीरें पेश की जाती हैं । नीतिके सम्बन्धमें भी पुरानी मान्य- ताओंकी खोज की जाती है । यदि अतीतसे शिक्षा नहीं लेनी है, तो फिर इतिहास- का महत्त्व ही क्या ? अतीत घटनाओमे कितनी ही अनिष्ट हैं, कितनी इष्ट हैं, कितनी भली हैं, कितनी बुरी हैं । अधिकांश अनाचार, पापाचार एवं बुराईकी ही घटनाएँ घटती हैं । अतः महर्षियों, शिष्टोंसे सम्मत, सत्य, लाभदायक इतिहास ही आदरणीय होता है । अतः राष्ट्रको अपने भविष्यनिर्माण करने, धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, राजनीतिक उचित शिक्षण प्राप्त करनेके लिये ही आप्त इतिहासोंका उल्लेख होता है । पूँजी जड है, वह स्वयं मुर्दा है, प्रयोक्ताओंके गुण एवं दोषसे उसमें गुण या दोष आते हैं। पूँजीद्वारा होनेवाले विकाससे पूँजीपतिका ही विनाश नहीं होता, किंतु मजदूरका भी होता है । अन्यथा उसकी भी बेकारी बढती है । बेकारी बढनेसे ही मजदूरोंका राज्य नहीं बन जाता । यदि यही बात हो तो फिर राज्य बनानेके लिये व्यक्ति या समूह बेकार ही प्रयत्न करे, परंतु ऐसा देखा नहीं जाता । इसके साथ ही यह भी समझना चाहिये कि वैज्ञानिक आविष्कारक आदि आधुनिक विकासके मूल हैं । यदि विकासके परम्परागत हेतु होनेसे पूँजीपतिका विनाश होता है, तो साक्षात् 'संश्लिष्ट' आविष्कारको एव मजदूरोंका विनाश क्यो न होगा ? जैसे पूँजीपतियोंका विनाश इतिहाससिद्ध है, वैसे ही पूँजीपतियोंसे अधिक सख्यामें मजदूरोका विनाश भी इतिहाससिद्ध है । फिर भी जैसे मजदूर रहते हैं, वैसे पूँजीपति भी हैं । यह दूसरी बात है कि मजदूरके नामपर कुछ सरकारी अधिना- यक पूँजीपति बन जाते हैं । किसी भी कार्यमें आनेवाले दोषों एव दुष्परिणामोंको