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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

मार्क्स-दर्शन ५५३ 'योगजविशेषता नहीं होती' यह कहना मूर्खता होगी । स्पष्ट ही देखते हैं कि 'जब चित्त शान्त, एकाग्र होता है तो सूक्ष्म ज्ञान उत्पन्न होता है । चित्तके चञ्चल एवं अशान्त होनेपर आँखों-देखी, कानों-सुनी बातोंका भी ठीक-ठीक ज्ञान नहीं होता ।' वाल्मीकीय रामायणके लिये ब्रह्माका वरदान है—'न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति' (वाल्मी० १।२।३३) इस काव्यमें तुम्हारा एक भी वाक्य अनृत नहीं होगा । यदि ये सब बातें झूठी हैं, तो जडवादियोंकी सम्पूर्ण ऐतिहासिक कल्पनाएँ और उनके कार्यकारणभाव भी सुतरां झूठे हैं । मनुष्योंको विचारने, सोचने, उन्नत करनेमें अवश्य स्वतन्त्रता है, परंतु उनके लिये भी शिक्षण, मार्गदर्शन अपेक्षित होते हैं । आज भी शिक्षणादिकी आवश्यकता सूर्यके समान स्पष्ट है । सर्वज्ञ ईश्वर, आप्त, महातपा, महर्षियोंके शिक्षण मार्गदर्शनके अनुसार सोचने, विचारने, उन्नतिके प्रयत्न करनेसे सफलता निश्चित होती है, मनमानी करनेसे भटककर परेशान होना पडता है । आज भी न्याय, नीति, शिक्षा, शिल्पादिके सम्बन्धमें परम्परासे ही शिक्षा ली जाती है । अदालतोंमें भी पुरानी नजीरें पेश की जाती हैं । नीतिके सम्बन्धमें भी पुरानी मान्य- ताओंकी खोज की जाती है । यदि अतीतसे शिक्षा नहीं लेनी है, तो फिर इतिहास- का महत्त्व ही क्या ? अतीत घटनाओमे कितनी ही अनिष्ट हैं, कितनी इष्ट हैं, कितनी भली हैं, कितनी बुरी हैं । अधिकांश अनाचार, पापाचार एवं बुराईकी ही घटनाएँ घटती हैं । अतः महर्षियों, शिष्टोंसे सम्मत, सत्य, लाभदायक इतिहास ही आदरणीय होता है । अतः राष्ट्रको अपने भविष्यनिर्माण करने, धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, राजनीतिक उचित शिक्षण प्राप्त करनेके लिये ही आप्त इतिहासोंका उल्लेख होता है । पूँजी जड है, वह स्वयं मुर्दा है, प्रयोक्ताओंके गुण एवं दोषसे उसमें गुण या दोष आते हैं। पूँजीद्वारा होनेवाले विकाससे पूँजीपतिका ही विनाश नहीं होता, किंतु मजदूरका भी होता है । अन्यथा उसकी भी बेकारी बढती है । बेकारी बढनेसे ही मजदूरोंका राज्य नहीं बन जाता । यदि यही बात हो तो फिर राज्य बनानेके लिये व्यक्ति या समूह बेकार ही प्रयत्न करे, परंतु ऐसा देखा नहीं जाता । इसके साथ ही यह भी समझना चाहिये कि वैज्ञानिक आविष्कारक आदि आधुनिक विकासके मूल हैं । यदि विकासके परम्परागत हेतु होनेसे पूँजीपतिका विनाश होता है, तो साक्षात् 'संश्लिष्ट' आविष्कारको एव मजदूरोंका विनाश क्यो न होगा ? जैसे पूँजीपतियोंका विनाश इतिहाससिद्ध है, वैसे ही पूँजीपतियोंसे अधिक सख्यामें मजदूरोका विनाश भी इतिहाससिद्ध है । फिर भी जैसे मजदूर रहते हैं, वैसे पूँजीपति भी हैं । यह दूसरी बात है कि मजदूरके नामपर कुछ सरकारी अधिना- यक पूँजीपति बन जाते हैं । किसी भी कार्यमें आनेवाले दोषों एव दुष्परिणामोंको

५५४ मार्क्सवाद और रामराज्य बुद्धिमान्, ईमानदार मिटानेका प्रयत्न करता है और सफल होता है; कोई खास वर्ग या व्यक्ति ही ऐसा करता है, यह नहीं कहा जा सकता । फिर धर्म- नियन्त्रित शासन सुतरा ईश्वरीय एवं आर्ष सम्मतियोके अनुसार आगत दोषोंको तो दूर कर ही सकता है। श्रेणी और वृत्ति मार्क्सवादी कहते है कि 'जीविका पैदा करनेके क्रममें जो मनुष्य जिस स्थान- पर है वही उसकी श्रेणी है। मनुष्य जीविका उपार्जन करनेके ढंगके अनुसार अपने रहन-सहनका ढग बना लेता है, अतएव जीविकोपार्जनका ढग बदलनेसे समाजका रूप भी बदल जाता है। समाजमें पैदावारकी दृष्टिसे श्रेणियाँ अपना-अपना स्थान रखती हैं। पैदावारके फल या पैदावारके साधनोपर अधिकार करनेके लिये जो संघर्ष चलता है, वही मनुष्यसमाजका इतिहास है, वही मनुष्यसमाजके विकासका मार्ग है। विकासके मार्गमें विरोध आना आवश्यक है, विरोधसे नया विधान तैयार होता है। नया विधान समाजके विकासको आगे बढाता है।' शरीर- मात्रको आत्मा माननेवाले शरीरभिन्न आत्मा एवं उसका जन्मान्तर होने, ईश्वर एवं धर्माधर्मका रहस्य न समझनेवाले चार्वाकप्राय जडवादियोकी दृष्टिमें उपर्युक्त बाते ठीक ही हैं । परंतु तद्विपरीत रामराज्यवादीको 'पशुओ, वृक्षों-जैसी ही मनुष्योकी भी जन्मना ही ब्राह्मणादि श्रेणी मान्य है। जीविका चलानी हर मनुष्यकी मुख्य समस्या नहीं, किंतु लौकिक-पारलौकिक विविध अभ्युदय एव परम निःश्रेयस ही उसका मुख्य उद्देश्य है । तदर्थ धर्म, संस्कृति, ज्ञान, विज्ञान, शिल्प, संगीत, कला-कौशलका आविर्भाव परमावश्यक होता है। केवल मनुष्योके लिये ही जीविका कोई असाधारण समस्या नहीं है। वह पशु-पक्षियोके लिये भी अपेक्षित ही होती है। आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥ (हितो०) अतएव आस्तिकोके यहाँ वर्णानुसारिणी जीविका होती है। जीविकानुसारी वर्ण नहीं। वर्णोंके भेदसे ही शास्त्रोक्त कर्मोंका भी भेद है। राजसूय, वाजपेयादि क्षत्रिय-ब्राह्मणादिके भेदसे विहित हैं । इस तरह धर्मकी दृष्टिसे ब्राह्मणादि श्रेणियाँ ही मुख्य एव उपादेय हैं । धनी, गरीब, पूँजीपति, मजदूर आदि वास्तविक श्रेणी ही नहीं हैं। ऐसी कृत्रिम श्रेणियाँ सदा ही हानिकारक होती हैं। ब्राह्मणों, क्षत्रियो, वैश्यों, शूद्रों—सभीमे ये अमीर-गरीब होते हैं। बुद्धिमान्, निर्बुद्धि, दुर्बल, सबल कं ई जाति नहीं होती । उनके विवाह, खानदान आदि भी इन्हीं अकृत्रिम श्रेणियोंमे होते हैं। इन श्रेणियोंमे साधनोके हथियानेके लिये कभी भी सघर्ष नहीं हुआ । मार्क्स-जैसे कुछ लोगोद्वारा यह कृत्रिम भेद उत्पन्न किया

जाता और उनमें संघर्ष, विद्वेष फैलाकर अपना मतलब गाँठनेका प्रयत्न किया जाता है । लाखो वर्षोंके पुराने इतिहासमे किसीकी भूमि-सम्पत्ति, कल-कारखाना छीननेका श्रेणीबद्ध प्रयत्न नहीं होता था । हाँ, एक राजा दूसरे राजापर राज्य छीनने- के लिये प्रयत्न करता था । कुछ व्यक्ति कुछ व्यक्तियोंकी कोई वस्तु छीननेका प्रयत्न यदि करते थे तो वे दण्डके भागी होते थे । मार्क्सवादियोंके मनगढन्त इतिहासकी घटनाएँ केवल हजार-पाँच सौ वर्षकी ही हैं । सभी देशों, सभी धर्मोंके पुराने इतिहासोंमें मार्क्सवादी-क्रमकी गन्ध भी नहीं प्रतीत होती । इतना ही क्यों, युक्तियों एवं शास्त्रोंसे मालूम पड़ता है कि ऐसी क्रान्तियाँ क्षुद्रोपद्रवमात्र हैं । इनका कोई ऐतिहासिक महत्त्व नहीं । वेदों, रामायण, महाभारत तथा पुराणोंमें करोड़ों, अरबों वर्षों एवं अगणित युगों, कल्पों तथा विभिन्न सृष्टियोंके इतिहास हैं । जैसे प्रतिवर्ष वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा आदि ऋतुओका समान- रूपसे आवर्तन होता रहता है, वैसे ही प्रतिकल्प प्रतिसृष्टिमें समानरूपसे सूर्य, चन्द्र आदि उत्पन्न होते हैं । अनेक ढंगकी प्रधान-प्रधान वस्तुएँ एक-

५५६ मार्क्सवाद और रामराज्य धर्म और अर्थ मार्क्सवादी कहते हैं कि धर्म, प्रेम या परोपकारके नामपर सर्वस्व लुटा देने या प्राण न्योछावर कर देनेका भी आधार आर्थिक ही है, क्योकि सब कुछ संतोष- तृप्तिके लिये ही किया जाता है । अन्यायके विरोधमे आत्मबलिदान करता हुआ भी प्राणी सब कुछ स्वार्थके उद्देश्यसे करता है । परंतु यहाँ स्वार्थका अर्थ व्यक्ति न समझकर श्रेणी समझना उचित है । समाजमें व्यवस्था एवं शान्ति न रहनेसे समाजके नुकसानके साथ व्यक्तिका भी नुकसान होता है । समाजकी रक्षामें ही व्यक्तिकी भी रक्षा होती है; परंतु जडवादमें उपर्युक्त बाते सङ्गत नहीं होतीं । जो देहमात्रको आत्मा मानता है, देहके नष्ट हो जानेपर आत्माका नाश मानता है वह आत्मनाशके काममे कभी भी प्रवृत्त नहीं हो सकता । आत्माके नष्ट हो जानेपर समाजकी रक्षासे फिर किसकी रक्षा होगी ? जिसकी रक्षाके लिये समाजकी रक्षा करनी है, जब उसका नाश सामने ही है तो उसकी रक्षाके लिये समाज-रक्षाकी बात ही कहाँ उठती है ? शान्ति या संतोषके लिये त्याग भी वहीतक किया जा सकता है जहाँतक जिसे शान्ति-संतोष चाहिये, वह बना रहे । जब शान्ति- संतोषका भोक्ता ही नष्ट हो जायगा तो शान्ति-संतोषका सुख कौन भोगेगा ? अध्यात्मवादी देहादिके नष्ट हो जानेपर भी सुख-शान्ति-संतोष भोगनेवाली आत्मा- को अमर मानते हैं । अतः उनका त्याग, बलिदान बन सकता है । आत्म- कल्याणके लिये धर्मार्थ, परोपकारार्थ प्राणत्यागतक करना उनकी दृष्टिसे उचित हो सकता है । अध्यात्मवादमें भी दो प्रकारका स्वार्थ होता है—एक संकुचित और दूसरा वास्तविक । जहाँ 'स्व' शब्दका अर्थ देहादि ही माना जाय वह संकुचित स्वार्थ है । वहाँ रोटी-कपड़े आदि लौकिक अभीष्ट वस्तुओंकी प्राप्ति ही स्वार्थ गिना जाता है । परंतु जहाँ 'स्व' शब्दका अर्थ देहादिभिन्न नित्य आत्मा माना जाता है, वहाँ स्वार्थका अभिप्राय वस्तुभूतस्वरूप परमेश्वरका साक्षात्कार, परमेश्वरप्राप्ति, अनर्थ- निवृत्ति तथा परमानन्दस्वरूप मोक्षप्राप्ति ही है । यह सच्चा स्वार्थ कहा जाता है— 'स्वारथ साँच जीव कहँ एहू । मन क्रम बचन राम पद नेहू ॥' इसी वास्तविक स्वार्थके अभिप्रायसे कहा गया है कि 'सब कुछ आत्माके लिये ही होता है । सर्वभूत, सर्वलोक, सर्वदेव आदिकोंमें प्रेम सर्वभूत, सर्वलोक, सर्व- देवके लिये नहीं, किंतु आत्माके लिये ही होता है । 'न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवति आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति ।' ( बृहदा० उ० ) परंतु यहाँ प्रबोध होनेपर व्यष्टि समष्टि दो नहीं रह जाते । अविद्या-दशामें ही सर्वस्वरूप आत्मा- में असर्वता अध्यारोपित है । बोध होनेपर अध्यारोपित असर्वताके बाधित होनेपर स्वाभाविक सर्वता ही व्यक्त हो जाती है । अतः वास्तविक स्वार्थ समष्टि-व्यष्टिका एक ही होता है; परंतु जडवादमे यह सब सम्भव नहीं ।

मार्क्स-दर्शन ५५७ किसीके पैदावारका साधन छीनना सदासे सभी पाप समझते रहे। परान्न- परद्रव्य मार्गमें पडा हो या अपने घरमें ही कोई डाल गया हो तब भी नही लेते थे— ‘परान्नं परद्रव्यं वा पथि वा यदि वा गृहे। अदत्तं नैव गृह्णीयादेतद्ब्राह्मणलक्षणम्।' दायभागमें प्राप्त अपनी बपौती सम्पत्तिको ही अपनी सम्पत्ति मानते थे। दान-पुरस्कार तथा परिश्रमाजित सम्पत्तिको ही अपनी वैध सम्पत्ति मानते थे। फिर छीनने, अपहरण करनेका उनसे सम्बन्ध ही क्या हो सकता था ? लोक, परलोक, ईश्वर, धर्म न माननेवाला जडवादी ही दूसरोकी सम्पत्ति लेनेकी सलाह दे सकना है। आस्तिक दूसरेकी गिरी हीरेकी माला या लाखोका नोटका बडल जिसके हैं, उन्हीं- को लौटा देनेकी सलाह देगा, परन्तु एक कम्युनिष्ट ऐसी सलाह दे ही कैसे सकता है ? आस्तिककी दृष्टिमें सब मनुष्य ही नही, किंतु सभी प्राणी परमेश्वरकी संतान हैं। फिर भी शिष्य गुरु को, पुत्र माता-पिताको, पत्नी पतिको, नौकर मालिकको पूज्य और अपनेको सेवक मानते हैं। पूज्यको सेव्य समझते हैं। व्यवहारमें वह सेव्य-सेवक-भाव मान्य होता है। अतएव आस्तिक किसी को गुलाम नहीं मानता। मनुष्य मनुष्यमें सेव्य-सेवकभाव चलता है। यह अब भी है और सदा रहेगा। नाम भले बदल जाय, पर वस्तु कभी नहीं बदल सकती। मिश्रकी पिरामिड, यूनान एव भारतकी विशाल इमारतोंके बनानेमें गरीबोको रोजी और नौकरी मिली है, उनका पोषण हुआ है। उनकी सम्पत्ति छीनकर ये सब चीजें नहीं बनायी गयीं। सब सम्पत्ति गरीबो, मजदूरोकी ही होती, तो वे गरीब और मजदूर ही क्यों होते ? मजदूरोने पैदावारमें हाथ बँटाया तो उसके बदलेमें वेतन पाया। कमाईका सारा फल मजदूर- का ही है, यह सिद्धान्त असिद्ध है। हाँ, उनका जीवन उन्नत और समृद्ध हो इसके लिये आस्तिकोका सदा प्रयत्न रहा। फलस्वरूप वे सुखी भी रहे। देशमें कोई दरिद्र, दुखी, अविद्वान् नहीं रहता था। 'न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपः।' 'नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना ॥' सभ्यता, संस्कृति, शिल्प, संगीतका विकास अमीर, गरीब सबके ही हितकी चीज है। रूसी विद्वान् साहित्य, संगीत ज्योतिषके अध्ययनमे संलग्न हो रहे हैं, एतावता क्या वे भी शोषक हो जायेंगे ? वैज्ञानिक लोग अनेक प्रकारके अविष्कारमें लगे हैं, वे भी तो किसान-मजदूरोंकी ही कमाई खाते हैं ? पर क्या वे शोषक कहे जायेंगे ? वस्तुतः जो भी अपने कर्त्तव्यका पालन करते हैं, वे शोषक नहीं कहे जाते। शासक, शिक्षक, अन्वेषक यदि शोषक नही तो शिल्प, संगीत, साहित्यके अभ्यासमें लगे लोग भी शोषक कैसे कहे जा सकते हैं ? श्रमके अतिरिक्त प्राकृतिक साधनोंका भी उत्पादनमें प्रमुख हाथ रहता है। अतः श्रमवालोको यदि लाभका अंश मिलता है, तो साधनवालोंका भी लाभमें हिस्सा होना अनिवार्य है। श्रमवाले- को उचित पारिश्रमिक मिलना चाहिये और साधनवालोको लाभ। शरीर, मस्तिष्क, श्रमशक्ति भी वस्तुतः प्राकृतिक ही वस्तु है। मनुष्योंने इतर यन्त्रोंके समान

मस्तिष्क एव देहोका निर्माण नहीं किया । जैसे इन प्राकृतिक साधनोसे मनुष्य लाभ उठाता है, वैसे ही अन्य प्राकृतिक साधनोसे दूसरोको भी लाभ उठानेका अधिकार है । मशीनो, कल-कारखानोके विस्तारसे उत्पादनमें वृद्धि, वस्तुओकी बहुलतासे दाममे कमी होना, कम मजदूरोका उपयोग, अधिकोकी बेकारी आदिका होना तो अनिवार्य है । परंतु बच्चो एव स्त्रियोसे काम लेना, चार घंटेके बदले मजदूरोसे बारह घंटे काम लेना, कम मजदूरी देना और उन्हे असहाय छोड़ देना आदि जुर्म है । यह कहीं भी हो, इसका समर्थन नही किया जा सकता । यह सार्वदेशिक एव सार्वकालिक इतिहासकी बात नहीं । अन्यान्य अनाचारोके समान यह भी शुद्ध उपद्रव ही है, जो सर्वथा हेय है । यह अतिरञ्जित बीभत्स वर्णन एक वर्गके प्रति घृणा फैलानेके उद्देश्यसे भी हो सकता है । वैसे रूसमें विरो- धियोके साथ लोग इससे भी अधिक भीषण दुर्व्यवहारकी बात करते है । भौतिकवादी ईश्वर एव धर्मके सम्बन्धमे बहुत उलटा प्रचार करते हैं और कहते हैं कि 'इस पक्षमे सब कुछ ईश्वरकी इच्छासे ही होता है । मनुष्यके विचार भी ईश्वरप्रेरणाके ही अधीन होते हैं । ईश्वरवादी ससारको मिथ्या मानकर उससे भागनेके ही फेरमें रहते हैं ।' वे कहते हैं कि 'इतिहास इस पक्षका समर्थन नहीं करता ।' परंतु ये बाते बहुत ही छिछली हैं । लाखो-करोडों वर्षका इतिहास वस्तुतः ईश्वरवादका ही समर्थक है । ईश्वरवादियोने ही बडा-बड़ा पुरुषार्थ किया है । समुद्रमे सौ योजनका पुल ईश्वरवादियोने ही तैयार किया है । अखण्ड भूमण्डल- का साम्राज्य, पुष्पकविमान-जैसे वायुयान, हाईड्रोजनबमसे करोडो गुना अधिक शक्तिशाली ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र ईश्वरवादियोने ही प्रकट किये हैं । मनुष्योके अति रिक्त दिव्य शक्तियोके साथ प्रत्यक्ष व्यवहार भी उन्होने ही किया है । एक देहात्म- वादी उसी बड़े काममे हाथ लगा सकता है, जिसका फल वह जीवनमें देख सके । उसके जीवनमें जिसका फल सम्भव नही, उस काममें वह किस उद्देश्यसे प्रवृत्त होगा ? परंतु आत्मवादी आत्माको अमर मानता है, वह जानता है कि 'इस जन्ममें नहीं तो जन्मान्तरमे मेरे प्रयत्नका फल होगा ही ।' वह कोटि-कोटि जन्मतक भी किसी बडे कामको पूरा करनेका दृढ संकल्प कर सकता है—'जन्म कोटि लगि रगर हमारी । बरौं संभु न त रहौ कुमारी ॥' कई पीढीके प्रयत्न करनेसे गङ्गाके लानेका प्रयत्न भी इसी कोटिका था । जैसे अङ्कुरोत्पत्तिमें पर्जन्य साधारण कारण है, अङ्कुरके रूप, रस, फल आदि विचित्रताका असाधारण कारण पर्जन्य नहीं, किंतु बीजकी निजी विशेषता है, वैसे ही ईश्वर सर्व प्रवृत्तियोंमे साधारण कारण है । तत्तद्विशिष्ट फलोंकी प्राप्तिमें प्राणियोंके पुरुषार्थ ही मुख्य कारण हैं । प्राणियोंके अपने पुरुषार्थ- प्रमादके अनुसार ही सफलता-असफलता चलती है । योगवाशिष्ठ आदिमें पुरुषार्थका जितना जबर्दस्त समर्थन है, जडवादी कभी भी उतने पुरुषार्थकी कल्पना नहीं कर सकते ।

कई लोग आजकल कहते हैं कि 'आस्तिकलोग जीने-मरने, स्वर्ग-नरककी ही चिन्तामें परेशान रहते हैं । इसीलिये उन्होंने लौकिक-भौतिक उन्नतिमें सफलता नहीं पायी । भौतिक लोग स्वर्ग-नरककी चिन्तासे मुक्त थे, अतः वैज्ञानिक उन्नतिमें बढ़ गये । परन्तु यह उनका भ्रम है, हम भौतिक वैज्ञानिक उन्नतिकी चर्चा कर आये हैं । अलबत्ता आत्मा-परमात्मा माननेवाला, स्वर्ग-नरकविश्वासी प्राणियोंको परमेश्वरका अंश मानकर उन्हें सतानेमें सकुचायेगा । कोई प्राणी एक कारी- गरके बनाये हुए खिलौनेको बिगाड़नेमें सकुचाता है, फिर कोई समझदार ईश्वरके बनाये प्राणियोंको सताने या मौतके घाट उतारनेसे अवश्य सकुचायेगा । भौतिक- वादी पाप पुण्य, स्वर्ग-नरकसे डरते नहीं, अतः भीषण-से-भीषण नरसंहारमें, प्राणि- संहारमें उन्हें कुछ भी संकोच नहीं। उसका स्वार्थ भीषण-से-भीषण घृणित-से- घृणित कार्यसे भी सम्पन्न हो तो भी वे स्वार्थ-साधनके लिये तैयार हो जाते हैं। मार्क्सके दर्शन, जीव-विकास एवं मृत्यु आदिकी समालोचना पिछले प्रकरणमें की जा चुकी है। डार्विन हैक्ल आदिके सिद्धान्त भारतीय दर्शनोंकी कसौटीपर मिनट- भर भी नहीं ठहरते । बहुत से समाजवादी मार्क्सवादी भी मार्क्सके अर्थसम्बन्धी दर्शनसे सहमत होते हुए भी उसके अध्यात्मविचारसे सहमत नहीं होते । अनेकों लोग समाज- वादी होते हुए भी ईश्वर एवं धर्ममें विश्वास रखते हैं । विशेषतः भारतमे हजारमे नौ सौ निन्यानवे समाजवादी धार्मिक एवं ईश्वरवादी होते हैं, परंतु मार्क्सवादी दृष्टिकोणसे वे गलत रास्तेपर ही समझे जाते हैं । यह दुरंगा ढंग उनकी दृष्टिमें सर्वथा अवैज्ञानिक है । उनका कहना है कि जब आत्मा-परमात्माका अस्तित्व विज्ञान एवं तर्कद्वारा सिद्ध नहीं होता तो वह क्यों माना जाय ? ईश्वर इन्द्रियोंका विषय नहीं, किंतु अनुभवका विषय है। ऐसे विश्वासोको अन्ध विश्वास ही कहते हैं । उनके मतानुसार भूत-प्रेतकी कल्पनाके समान ही ईश्वरकी कल्पना है। वे कहते हैं कि विज्ञानकी उन्नतिके लिये मनुष्यने ईश्वरकी कल्पनामें भी उन्नति कर ली है । आरम्भकालकी भूत-प्रेतकी कल्पना ही मध्यकालमे परिष्कृत होकर देवी-देवताके रूपमें प्रकट होती है। अधिक प्रगतिशील युगमें देवी देवताकी कल्पना भी परिष्कृत होकर एक ईश्वरका रूप ले लेती है और परिष्कृत होकर वही कल्पना अद्वैत निर्गुण-निराकार ब्रह्मका रूप धारण कर लेती है । मार्क्सका कहना है कि जो वस्तु है ही नहीं उसपर विश्वास करनेसे क्या लाभ ? और झूठी कल्पनासे मनुष्यको क्या आश्रय मिलेगा ? और क्या उत्थान होगा ? सबसे बडी अडचन यह है कि अध्यात्म- वादियोके मतानुसार आत्मा परमात्मामें परिवर्तन नहीं होता । सुतरा ईश्वरनिर्दिष्ट धार्मिक-सामाजिक नियमोंमें भी रद्दोबदल नहीं हो सकता । परंतु मार्क्सके मता- नुसार कोई धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक नियम शाश्वत नहीं है। उनमें रद्दोबदल होता ही रहता है । तभी उसका राष्ट्रीयकरण समाजीकरण चल सकता है । ईश्वर

मानना एवं उसके निर्दिष्ट नियमोंको न मानना यह अर्धजरतीयन्याय कैसे चलेगा ? अपरिवर्तनीय ईश्वर एवं धर्मको मानते हुए व्यक्तिगत सम्पत्ति-भूमिका समाजी- करणके नामपर छीनना कथमपि नहीं हो सकता । मार्क्सवादी कहते हैं कि धार्मिक, आध्यात्मिक विचारवाले समाजकी प्रगतिका सदा ही विरोध करते हैं । फ्रांसके वाल्टेयरने कहा था कि यदि परमेश्वर नहीं है तो हमें स्वयं परमेश्वर गढ़ लेना चाहिये, क्योकि उसका भय मनुष्योंको उचित मार्गपर चलानेमें सहायक होता है । परंतु मार्क्स ऐसे काल्पनिक भयसे लाभकी अपेक्षा हानि ही देखता है । उसे भय है कि ईश्वर माननेवाला व्यक्ति ईश्वरीय शास्त्र एवं ईश्वरीय नियमोंको भी माननेके लिये बाध्य होता है । फिर उसे श्रेणी-संघर्ष एवं किसी व्यक्तिगत सम्पत्ति एवं भूमिके छीन लेनेके सिद्धान्तमें विश्वास जमना असम्भव हो जायगा । वस्तुतः ईमानदारीकी बात यही है कि मार्क्सवादी, ईश्वरवादी दोनोंका समन्वय हो नहीं सकता । अन्ततः जो ईश्वरवादी हैं उन्हे मार्क्सवाद छोड़ना ही पड़ेगा । मार्क्सकी अर्थनीति ईश्वर एवं धर्मके रहते-रहते चल ही नहीं सकती । ईश्वरवादी मार्क्सवादी बनकर या तो मार्क्सवादियोंको धोखा देते हैं या अपनेको धोखा देते हैं । जब भौतिक सूक्ष्म वस्तुओंके ज्ञानमें अणुवीक्षण आदि अनेक साधन अपेक्षित होते हैं तब परमाणु एवं आकाशसे भी परम सूक्ष्म अह महान् अव्यक्त एवं इन सब- से परम सूक्ष्म स्वप्रकाश सत्स्वरूप परमेश्वर बिना साधनोंके कैसे बुद्ध्यारूढ़ हो सकता है। स्वधर्मानुष्ठानद्वारा शुद्धान्तःकरण प्राणी विवेक, वैराग्य, शान्ति, दान्ति, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा-समाधान एवं मुमुक्षुत्व आदिसे युक्त होकर उपनिषद्, गीता, ब्रह्मसूत्रका विचार करनेसे परमेश्वरको समझ सकता है । शङ्कराचार्य उदयनाचार्यके तर्कोंको सुनकर कोई समझदार पुरुष नहीं कह सकता कि ईश्वर भीरु मस्तिष्ककी कल्पना है या अन्धविश्वासकी चीज है । अभय सत्त्वशुद्धि ज्ञानयोगव्यवस्थिति- पूर्ण तर्क एव योगाभ्यासजनित एकाग्रता आदि जिसके समझनेके साधन हैं उसे अन्ध- विश्वासकी बात समझना बड़ी भयंकर मूर्खता है । भूत-प्रेतकी कल्पनाने ही परिष्कृत होकर निर्गुण ब्रह्मकल्पनाका रूप ले लिया, यह कथन भी अनभिज्ञतामूलक है, लाखों वरस पहलेसे ही सबकी मान्यता साथ-साथ चली आ रही है । तामस प्राणियोंके लिये भूत-प्रेत, सात्त्विकोंके लिये देवी-देवता एवं सर्वोच्च अधिकारीके लिये सगुण परमेश्वर एव साक्षात्कारसम्पन्न अत्यन्त अन्तर्मुखके लिये निर्गुणब्रह्मका उपदेश है। तत्त्वविद् भी व्यावहारिक दृष्टिसे सबका सम्मान करता है। कर्मकाण्ड, देवता आदिकी व्यावहारिक सत्ता तत्त्ववित्को ही नहीं अपितु सर्वज्ञशिरोमणि ईश्वरको भी मान्य है। उत्पत्तिके साधन और न्याय मार्क्सवादी कहते हैं कि 'न्याय भी सदा एक-सा नहीं रहता; किंतु उसमें रद्दोबदल होता रहता है। जैसे प्राचीन भारतमें शूद्रोंका विद्या पढ़ना अन्याय और

एक पुरुषको दो पत्नियाँ रखना न्याय था । विधवाका सती होना महापुण्य था, परंतु आज वह अपराध है। न्याय क्या है, इसका निर्णय रहता है उन लोगोंके फैसलेपर, जिनके हाथमें शक्ति रहती है। जिस श्रेणीके हाथमें पैदावारके साधन होते हैं, वही न्याय अन्यायका निर्णय करती है । जिससे उनके हितोंकी रक्षा हो, उनके हाथमें शक्ति बनी रहे, उसी ढगके तरीकोको वे न्याय कहा करते हैं। पूँजी- वादी समाजमें जिस तरह पूँजीपतिके कब्जेमें पूँजी बनी रहे, वही न्याय है। वे व्यक्तिकी पूँजी छीननेको महापाप बतलाते हे । समाजमे मुनाफा कमाकर पूँजी बढानेके अधिकारको न्याय कहते हैं । कम मूल्यमें सौदा खरीदकर अधिक दाममें वेचने, सौ रुपयेका काम कराकर नौकरको पचास रुपया देनेको भी न्याय कहते हैं। रूस इन सब बातोको अन्याय समझता है। पूँजीवादी देशोंमें पूँजीपतिके हितकी बात न्याय है। और रूसमें मजदूरोके हितकी बात न्याय है।' वस्तुतः ऐसी ही भ्रान्त धारणाओंके कारण भौतिकवादी अपने विरोधियोंको कुचलनेके लिये अमानवताका व्यवहार करते हैं और उसे भी न्याय समझते हैं। समाजके नामपर व्यक्तियोंकी भूमि-सम्पत्ति छीनकर विचार-स्वातन्त्र्यपर प्रतिबन्ध लगाकर व्यक्तियोके शरीर, वाणी एव मस्तिष्कपर ताला लगा देने-जैसे बुरे-से-बुरे पापको अपनी हित-रक्षाका साधन समझकर उसे न्याय कहते हैं। भारतमे विद्या, ज्ञान, जानकारीपर कभी भी प्रतिबन्ध नहीं था । विदुर, धर्मव्याध, मूक आदि शूद्र एव अन्त्यज भी परम ज्ञानवान् थे और समाजमे आदरणीय थे । बड़े-बड़े ब्राह्मण, ऋषि-महर्षि भी धर्मव्याधके पास धार्मिक परामर्शके लिये जाते थे । जिन वेदादि ग्रन्थोका विधिपूर्वक अध्ययन पुण्यविशेषकी दृष्टिसे जिन वर्णोंके लिये विहित है, उनका अध्ययन उन्हींके लिये आज भी है, तब भी था। जो वेदादि शास्त्रके अनुसार अदृष्ट अर्थमे विश्वास रखते हैं वे तदनुसारी नियम प्रसन्नतासे ही मानते हैं। यहाँ किसी श्रेणीके स्वार्थका प्रश्न ही नहीं उठता। जो वेदोंको किसी दूसरी श्रेणीके स्वार्थकी चीज समझते हैं, वे पुण्यकी दृष्टिसे उनका अध्ययन करना ही क्यो चाहेगे ? फिर उनके लिये निषेधका प्रश्न ही क्यो उठेगा ? जो विधिपूर्वक वेदाध्ययनसे जिस आधारपर किसीके लिये पुण्य मानेगा, उसी आधारपर किसीके लिये उसे पाप भी मानना ही पड़ेगा । आजकल मूर्तिपूजाके सम्बन्धमे भी यही बात है। पाषाणादि मूर्तिमें देवताका अस्तित्व माननेपर ही मूर्तिपूजाका प्रश्न उठता है। जो मूर्तिमे देवताकी सत्ता नहीं मानता, उसके लिये मूर्तिपूजाका प्रसङ्ग ही नही आता । प्रत्यक्षानुमानादिके आधारपर मूर्तिमे देवता सिद्ध हो, तब तो कम्युनिष्ट भी अवश्य ही मूर्तिपूजक बन जायेंगे । अतः कहना होगा कि प्रत्यक्षानुमानसे मूर्तिमे देवताका अस्तित्व एव उसकी पूजासे लाभ सिद्ध नहीं होता। केवल शास्त्रप्रमाण माननेसे ही मूर्तिमें प्रतिष्ठाविधिके मा० रा० ३६-

५६२ मार्क्सवाद और रामराज्य द्वारा देवताका आवाहन-प्रतिष्ठापन होता है, तभी उसकी पूजासे पुण्यकी बात उठती है । फलतः मूर्तिप्रतिष्ठा पूजादिविधायक शास्त्रोंमें विश्वास रखनेवाला जब मूर्तिपूजामें प्रवृत्त होगा तो उसे उस शास्त्रकी अन्य बातें भी माननी पड़ेगी । यदि शास्त्रोंके अनुसार ही मन्दिरस्थ प्रतिष्ठित मूर्तिमें और म्यूजियममें रहनेवाली मूर्तियों तथा आपणस्थ (बाजारमें बिकनेवाली) मूर्तियोंमें विशेषता सिद्ध होती है, तो उन्हीं शास्त्रोंके अनुसार यह भी मानना होगा कि अमुक-अमुक हेतुओंसे मूर्तिसे देवत्व नष्ट हो जाता है और अमुकको मूर्तिपूजासे कुछ लाभ न होगा किन्तु उलटा नुकसान होगा । यह सब बातें भी उन्हीं शास्त्रोंसे माननी पड़ेगी । शास्त्रोंकी दृष्टिसे न्याय-अन्यायका निर्णय किसी श्रेणीके हित या अहितकी दृष्टिसे नहीं होता । ब्राह्मणको राजसूय करना अधर्म कहा गया है, क्षत्रियके लिये वही धर्म है । वैश्यके लिये वाजपेय करना अधर्म कहा गया है वही ब्राह्मणके लिये धर्म है । इसी तरह वैश्यस्तोम, निषादस्थपति इष्टि, वैश्य एवं शूद्रविशेषके लिये धर्म है, अन्यके लिये अधर्म । यहाँ उन अनुष्ठाताओंके हिताहितकी दृष्टिसे धर्माधर्मका निर्णय किया गया है, शासक या धनवान् श्रेणीकी दृष्टिसे नहीं । औषध-विशेषके सेवनका विधि-निषेध रोगियोंके हिताहितसे सम्बन्ध रखता है, शासक-शासित-श्रेणियोंसे नहीं । किसी अवस्थामें किसी रोगीको किसी औषधसे लाभ हो सकता है और किसी औषधसे हानि । उसी दृष्टिसे विधि-निषेध होता है । हर जगह श्रेणी-स्वार्थकी बात जोड़ना कलुषित मनोवृत्तिका ही परिचायक है । इसी तरह अवस्था- विशेषमें दो पत्नीका होना तब भी धर्म था और अब भी धर्म है । अवस्था-विशेषमें वही तब भी अधर्म था और अब भी अधर्म है । यदि संतानके लिये, पिण्ड-श्राद्धके लिये अपने पूर्वजोंका नाम चलानेके लिये, पूर्व पत्नीकी सम्मतिसे ही दूसरा विवाह किया जाय तो इसमें अन्याय-जैसी कोई बात नहीं । कोई विधवा सती न होकर वैधव्य धर्म पालन करे तब भी उसकी सद्गति शास्त्रसम्मत है । वह धर्म उसपर लादा नहीं जाता, उसकी इच्छापर निर्भर है । यहाँ उसीके हिता- हितका सम्बन्ध है, अन्यका स्वार्थ नहीं । अथ च विधवाका सती होना तब भी धर्म था और अब भी धर्म है । कानून बन जानेमात्रसे धर्म-अधर्ममें भेद नहीं पड़ता । ईश्वरीय धर्माधर्ममें सरकारें रद्दोबदल, हस्तक्षेप करनेमें सर्वथा असमर्थ हैं, क्योंकि धर्माधर्मका वास्तविक फल देना सरकारोंके हाथकी बात ही नहीं है । इसी तरह रूसी कानूनसे व्यक्तिगत सम्पत्ति छीनना भी धर्म नहीं हो सकता । वस्तुतः जो कानून स्वार्थकी दृष्टिसे बनाये जाते हैं, कोई भी तटस्थ विवेचक उन कानूनोंको न्याय नहीं कह सकता । न्याय स्व-पर-पक्षपातविहीन होता है, जिसके आधारपर रामचन्द्रने एक विद्वान् बलवान् धनवान् ब्राह्मण एवं नगण्य श्वानके विवादमें अपराधी ब्राह्मणको ही दण्ड दिया था । धोबीके मुकाबिले

सीतातकको वनवास दिया था । शाहजहाँने हकीकतरायके मृत्युदण्डके बदलेमें काजीको भीषण दण्ड दिया, जो उसकी ही श्रेणीका था । सगरने अपने पुत्र असमञ्जस- को देशबहिष्कृत कर दिया था । अपराधी पुत्रको भी दण्ड देना, निरपराध शत्रुको भी दण्ड न देना ही न्याय कहलाता है । विश्वासघात, मित्रद्रोह, चोरी, व्यभिचार, परपीडन आदि अधर्म-अन्याय हैं । इसी प्रकार औचित्य-अनौचित्य, सत्य एव सिद्धान्तोके सम्बन्धमें भी मार्क्स- वादी कहते हैं कि 'ये कोई भी स्थिर नहीं होते ।' पर यदि सर्वसम्मत प्रमाण-न्याय, औचित्य, सत्यको आधार न माना जाय तो फिर कोई सिद्धान्त स्थिर करनेके लिये पुस्तकादि लिखनेका प्रयास भी मार्क्सने क्यो किया ? फिर तो उचित-अनुचित, प्रमाण-अप्रमाण, सत्तर्क-असत्तर्कसे कोई भी कुछ भी सिद्ध कर सकता है । फिर जब सभी सिद्धान्तों, सत्योंकी यही हालत है, तब मार्क्सद्वारा प्रचारित सिद्धान्तोंकी भी यही हालत होगी ।

मार्क्स और धर्म

भौतिकवादियोका कहना है कि "सभ्य मनुष्यका विश्वास है कि आध्यात्मिक शक्ति सदा मङ्गलमय है, लेकिन असभ्य मनुष्यके लिये यह शक्ति निष्ठुर है, इसलिये सदा ही उसको विपत्तिमें डालती रहती है । पत्थर जब गिरकर आदमीको घायल करता है, अचानक पेड़की डाल टूट जाती है, तब यह सब प्रकारके भूतों या पेड़के भूतकी शैतानीको छोड़कर और क्या है ? जबतक औजार—हथियारोंके ज्ञानकी वृद्धि नहीं हुई, तबतक असभ्य मनुष्य भूतोको वशीभूत करनेके लिये मन्त्र-तन्त्रके ही फेरमें पड़ा रहा । हथियार-औजारोंके ज्ञान बढ़नेके साथ-साथ प्राकृतिक शक्तिपर मनुष्यकी प्रभुता बढ़ने लगी । 'भौतिक शक्ति निष्ठुर ही नहीं है, बल्कि यह भलाई भी कर सकती है', जब इस धारणाका जन्म हुआ तब असभ्य मनुष्यके प्रेततत्त्व- पर सभ्यताकी मुहर पड़ी । प्रेत-तत्त्व असभ्य मनुष्यका है, देवता-तत्त्व इसके ऊपरकी सीढ़ी है—जो सभ्य मनुष्यका है । आदिम असभ्य मनुष्यके लिये प्रकृति निष्ठुर भयावह है । प्रकृतिके रहस्यका भेद जानकर सभ्य मनुष्य कहने लगा— 'मङ्गलमयी विश्वजननी' । यह परिवर्तन अकस्मात् एक दिनमे नहीं हो गया । आदिम भूत-प्रेतोंने सभ्य होकर यह रूप ग्रहण किया है । आदिम मनुष्यका प्रेत- तत्त्व सभ्यताकी सीढ़ीपर चढ़कर सूक्ष्म बन गया है । प्रकृति-जगत्को चलानेवाली है असख्य निष्ठुर प्रेतोंकी शक्ति; और इसी प्राथमिक कल्पनाका संशोधितरूप है देवताओकी कल्पना । ये सब देवता प्रकृति-जगत्के एक-एक हिस्सेके मालिक हैं । ये भलाई भी करते हैं और बुराई भी कर सकते हैं । जल, अग्नि, वायु—सभी प्राकृतिक शक्तियाँ किसी-न-किसी देवताके अधीन हैं । देव-समाज भी मनुष्य- समाजके साँचेपर ढला हुआहै । ये असंख्य देवता घटते-घटते एकईश्वरतक पहुँचे ।

५६४ मार्क्सवाद और रामराज्य सभ्यताकी सीढ़ीपर चढ़कर वस्तु-जगत्‌के विषयमें मनुष्यका ज्ञान ज्यो-ज्यो बढ़ने लगा, त्यो त्यो देवताओकी संख्या घटने लगी । मनुष्य ज्यो अगणित पदार्थोंमें एक मेल देखने लगा, त्यो देवताओका बहुत्व भी एकत्वमें परिणत हो गया ।’ “पहले भूत या चैतन्य ? इस प्रश्नका आदिम असभ्य जातियोके प्रेत-तत्त्वसे बहुत निकट सम्बन्ध है । इस बातको स्मरण रखना चाहिये कि आदिम असभ्य मनुष्यको जीवनकी प्राथमिक बाते सोचनी पडी थी । अनुमानके ऊपर प्रतिष्ठित मन्त्र-तन्त्रोके द्वारा उसको जीवन-धारणका कौशल सीखना पड़ा था । उसकी यह कोशिश चाहे जितने बचपनकी हो, उसका मूल है जीवन-धारणकी अभिलाषा । इसलिये जीवन-मरणके रहस्यने आदिम मनुष्यको काफी चिन्तित कर डाला था । मनुष्यका शरीर जीवित-अवस्थामें एक प्रकारका और मरनेपर दूसरे प्रकारका क्यो होता है, जागरण, निद्रा, स्वप्न, रोग और व्याधि—ये सब क्यो होती हैं, स्वप्नमें जो मनुष्य-मूर्तियाँ दिखायी देती हैं, वे सब क्या हैं, स्वप्नमे मनुष्योकी जो छाया-मूर्तियाँ दिखायी देती हैं, वही शायद जीवनकी कुजी है, शायद इस छायामूर्तिका शरीर छोड़ना ही मृत्यु है—असभ्य मनुष्यकी प्रेतात्माकी धारणा इसी प्रकार बनी है । यहाँ इस धारणाकी ऐतिहासिक आलोचना करनेकी आवश्यकता नही, लेकिन इसमें सदेह नहीं कि यही प्रेतात्मा सभ्यताके साबुनमे धुलकर चैतन्य परमात्मा आदि बन गयी है । मानव आत्माके विषयमे असभ्य जातियोकी धारणा है कि यह सूक्ष्म भापकी तरह है । इसके शरीर त्याग देनेसे मृत्यु हो जाती है । “मनुष्य तथा अन्य उन्नत प्राणियोके शरीर-धारणके लिये श्वासक्रिया बहुत ही आवश्यक है । मरते समय श्वासक्रिया क्षीण होते होते बंद हो जाती है । आदिम असभ्य जातियोने भी इसको देखा था । इसीलिये श्वासक्रियाको ही उन्होने आत्मा मान लिया था । आस्ट्रेलियाके आदिम निवासियोको भाषामे ‘श्वास’ और ‘आत्मा’ इन सबके लिये एक ही शब्द है । हिन्दू तथा सभी आर्य भाषाओके भाषा-विज्ञानमें श्वास और आत्मबोधक शब्दोका निकट सम्बन्ध है । यूनानी ‘साइके’ और ‘न्यूमा’, लैटिन ‘एनिमस’, ‘एनिमा’, ‘स्पिरीट्स’, इनका रूप-परिवर्तन इसी प्रकारसे हुआ है ।” इसपर कहना यह है कि यद्यपि मस्तिष्क अतिभौतिक प्रतीत न हो, तथापि यह तो नहीं कहा जा सकता कि जिससे जो निश्चित हो, वह उसका स्वरूप ही होता है । यदि ऐसी ही बात हो तब तो ज्ञानसे ही सब ज्ञेय निश्चित किया जाता है, यहाँतक कि मस्तिष्क भी ज्ञानसे ही निश्चित किया जाता है, फिर क्या भौतिकवादी सबको ही ज्ञानस्वरूप माननेको तैयार हैं ? यदि नहीं, तब तो भले ही भौतिक मस्तिष्कसे ही ईश्वर विदित हो, परंतु वह भौतिक नही कहा जा सकता । स्वयं इन्द्रियाँ नीरूप एवं सूक्ष्म हैं, परंतु उनसे रूपादिमान् स्थूल प्रपञ्च विदित होता

ही है। इसी तरह मस्तिष्क आदिद्वारा अभौतिक आत्मा, ब्रह्म आदिका बोध होता ही है। परिवर्तनशील भौतिकवादियोंका भूत ही नयी-नयी पोशाकोंमें भले उपस्थित हो, उपनिषदोंका ब्रह्म तो सदासे ही औपाधिकरूपमें अनेक रस और निरुपाधिक- रूपसे एकरस ही रहा है और वैसे ही रहेगा। जिसको भौतिकवादी वस्तु कहते हैं, वही अवस्तु है। जिसे वे अवस्तु समझते हैं, विचारकी दृष्टिसे वही वस्तु है। स्थूलदर्शी कार्यको ही वस्तु समझता है। एक स्थूलदर्शी पटको सत्य मानता है, परंतु एक सूक्ष्मदर्शी तन्तुभिन्न पटको ही असत् कहता है। इसी तरह कारण- परम्पराका विचार करते हुए तन्तु भी अंशुसे भिन्न असत् है। अंशु भी बिनौला- मात्र है, बिनौला भी पृथ्वीमात्र है, पृथ्वी भी जलमात्र ही है, जल तेजसे भिन्न होकर कुछ नहीं ठहरता। तेज वायुमात्र है, वायु आकाशमात्र ठहरता है; किंतु स्थूलदर्शियोंको यह सब ढोंग ही जँचता है। अन्तिम सत्यका विचार सर्वदा ही उपयुक्त है, चाहे श्रेणीविभाजित जीवन हो चाहे समष्टिवादी जीवन। सभीके लिये विक्षेपशून्य, निष्प्रपञ्च, सत्य, स्वप्रकाश ब्रह्म अपेक्षित है। इन्द्र भी अनन्त आनन्दसामग्री भुलाकर निष्प्रपञ्च सौषुप्त सुखकी ओर प्रवृत्त होता है। कोई कितना भी निर्द्वन्द्व, शान्त एव सुखी क्यो न हो, सुषुप्तिकी निष्प्रपञ्चताके बिना उसे विश्राम नहीं मिलता। 'ईश्वरको न युक्तिसे जाना जा सकता है, न उसे प्रकाशित किया जा सकता है' यह कान्ट का कथन; तथा 'ईश्वर वाङ्मनसगोचर नहीं है' यह हिंदूदर्शनोंका कथन, यह सिद्ध नहीं करते कि ईश्वर अवास्तव एव असत् है। किंतु उनका अभिप्राय यही है कि श्रद्धा, समाधान तथा एकाग्रताके बिना ईश्वरका साक्षात्कार नही हो सकता। ईश्वरके अस्तित्वमें अनुमान, आगमादि अनेको प्रमाण हैं। श्रुति ब्रह्म या आत्माको साक्षात् अपरोक्ष ही बतलाती है—'यदेव साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म ।' (बृहदा० उप० ३। ५। १) विज्ञाता प्रमाता प्रमाणानपेक्षरूपसे ही स्वतःसिद्ध होता है। सशय, विपर्यय एवं अज्ञान मिटानेके लिये ही प्रमाण अपेक्षित होते हैं। आत्मा अन्यत्र सदिहान होता हुआ भी स्वयं असंदिग्ध है, अन्यत्र विपर्ययज्ञानवान् होता हुआ भी स्वयं अविपर्यस्त रहता है। अन्यत्र अनुमिमान होता हुआ भी (अनुमान करता हुआ भी) स्वयं अपरोक्ष रहता है। फिर प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय आदि सभी जिस अखण्ड बोधके अनुग्रहसे भासित होते हैं, उसे किससे सिद्ध किया जाय ? यही बात 'विज्ञातारमरे केन विजानीयात्' इत्यादि श्रुतियोद्वारा कही गयी है। अतएव प्रमाणसिद्ध एव स्वतःसिद्ध ईश्वर या ब्रह्म परमकल्याणकारी होनेसे ग्राह्य, उपास्य एव ज्ञेय है। अनादि स्वतःसिद्ध वस्तुको बुद्ध्यारूढ करनेके लिये युक्ति, श्रुति आदि अपेक्षित होती है। इतिहास घटनाओं- का ही होता है, फिर भी औपचारिकरूपसे 'तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्', 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' इत्यादि श्रौत इतिहासके आधारपर सर्वकारण-स्वप्रकाश ब्रह्म- का अस्तित्व सिद्ध होता ही है। तदनुगुण युक्ति भी श्रुतिने ही दी है। जैसे अन्न

५६६ मार्क्सवाद और रामराज्य

(पृथ्वी) रूप अङ्कुरसे जलरूपी बीजका पता लगता है, जलरूपी अङ्कुरसे तेजरूपी मूलका पता लगता है, वैसे ही तेजरूपी अङ्कुरसे सदरूपी मूलका पता लगता है—'तेजसा सौम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ ।' दार्शनिक पण्डितोंके इन तत्त्वविचारोंको गलत कहना बुद्धिकी अजीर्णताका ही द्योतक है । वास्तविक अभिज्ञता और व्यावहारिक ज्ञानसे तो भौतिकवादियोंने ही शत्रुता कर रक्खी है । विश्वके उपादानकारणरूपसे, विश्वके निमित्तकारणरूपसे, विश्वके आधार या अधिष्ठानरूपसे, विश्वके प्रकाशक तथा व्यवस्थापकरूपसे, कर्मफलदातारूपसे, सर्वशासकरूपसे ईश्वरकी सिद्धि होती ही है । जैसे दर्पणके अंदर प्रतिबिम्ब भासित होता है, वैसे ही अनन्त चिद्रूप दर्पणमें मनुष्य, पश्वादि, जङ्गम-स्थावरादि सभी प्रपञ्च भासित होते हैं । काष्ठपर व्यक्त अग्निको काष्ठसे भिन्न समझना ही पड़ेगा, ज्ञान या चेतनाको मनुष्यादि देहोंसे भिन्न समझना ही पड़ेगा । आदिम जंगली मनुष्योंके वस्तु और चेतनासम्बन्धी विचारोंको इतिहासके बलसे सिद्ध करनेकी दुश्चेष्टा निराधार है । यह इतिहास कपोलकल्पित, मिथ्या एव पूरा मनगढन्त है । जड़वादियोंका इतिहास-सम्बन्धी मनोराज्य केवल विनोदका विषय है । कोई प्रमाणचक्षु पुरुष इसे केवल भौतिकवादियोंका दिमागी फितूर ही कहेगा । प्रामाणिक आस्तिकोंके इतिहासोंके अनुसार तो विश्वकारण ईश्वरकी संताने ईश्वरीय ज्ञानरूप वेदादि शास्त्रोंद्वारा पूर्णरूपसे शिक्षित ही होती हैं । उत्तरोत्तर जहाँ-कहीं सच्छिक्षा एवं सत्सङ्गमे विच्छेद हुआ, वहीं असभ्यता, अज्ञता एवं मिथ्या धारणाएँ बनती हैं । भौतिकवादियोंकी यह धारणा नितान्त असत्य है कि 'अध्यात्मवादियोंकी अतिभौतिक देवता, ईश्वर या ब्रह्म इत्यादि कल्पनाएँ हैं और इनका मूल असभ्यो, जंगलियोंकी तन्त्र-मन्त्र, भूत प्रेतकी कल्पनाएँ है ।' जिन्होंने सच्चे इतिहासोंका अध्ययन किया है, रामायण, महाभारत, पुराणों, उप- पुराणों, तन्त्रों, आगमों एवं मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेदो एवं उनके आरण्यक, उपनिषदों- का मनन किया है और जिन्होने व्यास, वसिष्ठ एवं श्रीकृष्ण भगवान्‌के दिव्य दर्शनोंका अध्ययन किया है, उनको यह समझनेमें कठिनाई न होगी । भौतिक- वादी जिन बाह्य भौतिक वस्तुओंको सत्य मानते हैं, देवता, ईश्वर, ब्रह्मकी बात तो पृथक् रहे भूत-प्रेतकी कल्पना भी उनसे अधिक सत्य है । इसीलिये उपनिषद् या गीताके जिस निर्गुण ब्रह्मको भौतिकवादी अन्तिम कल्पना मानते हैं, उस कल्पनाके साथ भी भूत-प्रेत एवं देवताओंकी कल्पनाएँ हैं । यह समझना नितान्त भ्रम है कि विकासक्रमसे भिन्न-भिन्न कालोकी ही यह कल्पनाएँ हैं । एक उच्च- कोटिका ब्रह्मदर्शन परमार्थ-दृष्टिमें सजातीय-विजातीय-स्वगतभेदशून्य ब्रह्मतत्त्व बतलाता है । परंतु वही अन्य अधिकारियोंके लिये ईश्वरकी उपासना बतलाता है । कुछ और ढंगके अधिकारियोंके लिये सगुण ईश्वरकी आराधना, अन्य लोगोंके लिये विभिन्न देवताओंकी आराधना बतलाता है । अन्य ढंग-

के लोगोंके लिये प्रेत-पिशाचकी आराधना भी उचित मानता है। 'बृहदारण्यक' आदि उपनिषदोंमें भी निर्गुण ब्रह्म, ईश्वर और साथ-ही-साथ अनेक देवताओंका भी वर्णन है। भारत, रामायण, गीता आदिमें तो सबका वर्णन है ही। यदि पिछली-पिछली कल्पनाएँ उत्तरोत्तर कल्पनाओंकी दृष्टिसे असत्य हैं, तब तो उनको मिथ्या ही कहना चाहिये। किसीके लिये भी उनकी ग्राह्यता एव उपासनाका उपदेश कैसे हो सकता है? इसलिये व्यावहारिक दृष्टिसे प्रेत, पिशाच आदि सभी तत्त्वोंका अस्तित्व है। प्रेतादि केवल कल्पना नहीं, उनकी देवयोनिमें गणना है। परलोकविद्या- वालोंकी दृष्टिसे प्रेत-तत्त्वकी सिद्धि होती है। भूतावेश, प्रेतावेश आज भी वैसी ही सत्य वस्तु है, जैसी पुराने कालमें। इसके अतिरिक्त भौतिकवादियोंकी प्रेतकल्पनाका युग कितना पुराना है? जब मानवका इतिहास ही लाखों नहीं हजारों ही वर्षोंका है, तब उनके प्रेतकल्पनाका युग भी उनकी दृष्टिमें हजारों वर्ष- का ही पुराना है। परंतु आर्ष इतिहासके अनुसार निर्गुण ब्रह्मकी कल्पना तो लाखों वर्ष पुरानी है। द्वापरके कृष्ण, त्रेताके राम और सृष्टिके मूल कारण ब्रह्मा, विष्णु एव महेशकी अतिप्राचीन दृष्टिमें भी निर्गुण ब्रह्मकी सत्ता स्वतःसिद्ध है। भौतिकवादियोंके तथाकथित मनगढंत मिथ्या इतिहासोंकी अपेक्षा आर्ष इतिहासोंकी तथ्यता कहीं अधिक श्रेष्ठ है। अतएव जागरण, निद्रा तथा स्वप्न- के आधारपर देह-भिन्न आत्माका निर्णय करना, प्राणधारणसे जीवन, प्राणराहित्यसे मरण आदिकी धारणा जंगली असभ्योंकी नहीं, किंतु सभ्यशिरोमणि महा- दार्शनिकोंकी भी यही धारणा थी और आज भी है। श्रीशंकराचार्यका कहना है कि जो स्वप्न, जागर एव सुषुप्तिको जानता है, वही आत्मा है, भूतसत्र नहीं— 'यत्स्वप्नजागरसुषुप्तिमवैति नित्यं तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसंघः।' भागवतमें कहा गया है कि स्वप्न, सुषुप्ति बुद्धिकी वृत्तियाँ हैं, जिस द्रष्टासे इनका बोध या प्रकाश होता है, वही अध्यक्ष पर पुरुष है—'बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति वृत्तयः । ता येनैवानुभूयन्ते सोऽध्यक्षः पुरुषः परः ॥' (श्रीमद्भा० ७।७।२५)। इस शरीरकी विभिन्न अवस्थाओंमें उसके भीतर अन्तरसे भी अन्तरतम- रूपसे आत्माको देखनेकी पद्धति लाखों वर्ष पुरानी है। जैसे मुञ्जमेंसे बुद्धिमानीसे इषीका (सींक) निकाली जाती है, वैसे ही शरीरसे, इन्द्रियो, मन, बुद्धि, अहंकार या आनन्दमयसे, जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्तिसे अन्वयव्यतिरेकादि युक्तियों- द्वारा समझकर पृथक्रूपसे आत्मा समझा जाता है। शरीरके भीतर ही अ-तत्त्वको त्याग करते हुए भगवत्तत्त्वको समझा जा सकता है—'अन्तर्भवेऽनन्त भवन्तमेव ह्यतत्त्यजन्तो मृगयन्ति सन्तः।' (श्रीमद्भा० १०।१४।२८) 'गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्', 'यो वेद निहितं गुहायाम्।' शरीरके भीतर बुद्धिरूपा गुहामें अभिव्यक्त अनन्त चित्-स्वरूप आत्माका उपलब्ध होता है। प्राणधारणके आधारपर जीवशब्दकी

५६८ मार्क्सवाद और रामराज्य

प्रवृत्ति भी अति प्राचीन ही है। यह हजार दो हजार वर्षके जंगली मनुष्योंकी कल्पना नहीं, बल्कि यह कहना चाहिये कि अतिप्राचीन वास्तविक आर्षज्ञानका विकृत- रूप अवशेष है। उपनिषदोंने मरनेके सम्बन्धमें बड़ी गम्भीरतासे विचार किया है। नचिकेताका प्रश्न ही मुख्य यही था—'येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके।' (कठोप० १।१।२०) अर्थात् मरनेके बाद जो यह सदेह होता है, कुछ लोग कहते हैं कि देह-भिन्न आत्मा बचा रहता है, कुछ कहते है कि कुछ भी बाकी नहीं बचता इसमें तथ्य क्या है? इसीपर यमराजने वरप्रदानके रूपमें अनन्त, सर्वाधिष्ठान, सर्वद्रष्टा आत्माका निरूपण किया है।

देवताओंके सम्बन्धमे तो भगवान् व्यासकी उत्तरमीमांसामें (१।३।९) शाङ्करभाष्यद्वारा स्पष्ट ही बतलाया गया है कि 'इन्द्रो ह वै देवानामभि प्रवव्राज' इत्यादि आख्यायिकाओद्वारा ऐश्वर्यशील देवतातत्त्वका स्पष्ट बोध होता है। महादार्शनिक विद्यारण्य स्वामीने सर्वाधिष्ठान ब्रह्मको अनिर्वचनीय तथा प्रकृतिविशिष्ट रूपको ईश्वर बतलाया है। प्रकृतिके सूक्ष्म कार्य समष्टि सप्तदशतत्त्वात्मक लिङ्गशरीरसे विशिष्ट उसी ईश्वरको हिरण्यगर्भ बतलाया है और समष्टि स्थूलशरीर एवं स्थूलप्रपञ्चविशिष्ट उसी हिरण्यगर्भको विराट् कहा है। ईश्वर, हिरण्यगर्भ, विराट्— तीनो ही ईश्वरके ही रूप हैं। स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीरोसे विशिष्ट ब्रह्म ही तीनो रूपमें व्यक्त होता है। स्थूल, सूक्ष्म, कारण तीनों प्रपञ्च और उसका प्रत्येक अंश ईश्वर ही है। ईश्वररूपसे आराधना करनेपर इसीलिये निम्ब, पिप्पल, पाषाणादि भी फलप्रद होते हैं। अस्ति, भाति, प्रिय, नाम, रूप यह पाँच रूप सर्वत्र उप- लब्ध होते हैं। नाम, रूप मायाके अंश हैं और शेष—अस्ति, भाति, प्रिय— तीनों ब्रह्मके ही रूप हैं।

जंगली लोगोंकी विचारधाराओका यह निष्कर्ष नही कि 'प्रेततत्त्व, जादूविद्या, अनेकेश्वरवाद, एकेश्वरवाद मनुष्यकी चिन्ताधाराके विभागकी सीढ़ियाँ हैं और अध्यात्मवादका मूल भीरुतामय प्रेतकल्पना ही है।' उसका निष्कर्ष तो यह है कि ईश्वरसे निहित ऋषियो, महर्षियोके उच्च स्तरका ब्रह्मविज्ञान, आत्मविज्ञानका ही विकृत अवशेष जंगलियोंमें मिलता है। उच्चकोटिका ब्रह्मविज्ञान, आत्म- विज्ञान कालक्रमसे लुप्त हो गया। सदिच्छा, सत्सङ्ग लुप्त हो जानेसे उदात्त विचार नष्ट हो गये। निम्नश्रेणीकी प्रेतविद्या, जादूगरी आदिके भाव रह गये। अतः उस आधारपर चलनेसे भ्रम ही बढ़ेगा।

नवम परिच्छेद मार्क्सीय समाज-व्यवस्था मार्क्सके अनुसार 'समाज' व्यक्तियो और परिवारोका समूह है। समाजकी व्यवस्थामे आनेवाला कोई भी परिवर्तन व्यक्तियो और परिवारोपर प्रभाव डाले बिना नहीं रह सकता। परिवार-स्त्री-पुरुषका सम्बन्ध समाजका केन्द्र है। समाजकी आर्थिक अवस्था मनुष्योंको जिस अवस्थामे रहनेके लिये मजबूर करती है, उसी ढंगपर मनुष्य परिवारको बना लेता है। कुछ देशोंमें बहुत बड़े-बड़े सम्मिलित परिवार होते हैं और कुछ देशोंमें छोटे छोटे। कहीं परिवार पिताके वंशसे होते हैं और कहीं माताके वंशसे। स्त्री समाजकी उत्पत्तिका स्रोत है। इसके साथ ही वह कई तरहसे पुरुषसे शारीरिकरूपसे कमजोर भी है। इन सब बातोका प्रभाव समाजमें स्त्रीकी स्थितिपर पडता है। 'समाज जब बिल्कुल आदि अवस्थामें था और मनुष्य जंगलोंमे घूम-फिरकर जंगली फलो और शिकारसे पेट भर लिया करते थे, या जब वे खेती और पशु- पालनद्वारा अपना निर्वाह करते थे, उस समय कबीलोमें भूमिके भाग या इस प्रकारकी दूसरी चीजोके लिये लड़ाइयाँ होती रहती थीं। इन लडाइयोमें शारीरिक- रूपसे स्त्रीके कमजोर होनेके कारण उसका अधिक महत्त्व नहीं था। इसके अलावा स्त्रीको लड़ाई लडनेके लिये आगे भेजना खतरेसे खाली न था। क्योकि स्त्रियोके लड़ाईमें मारे जाने या उनके कैदी होकर शत्रुके हाथमें पड़नेसे कबीलोंमें पैदा होनेवाले पुरुषोकी संख्यामें घाटा पड़ जाता था और कबीला कमजोर हो जाता था। इसलिये स्त्रियोंको लड़ाईमें पीछे रखा जाने लगा; बल्कि सम्पत्तिकी दूमरी वस्तुओकी तरह उनकी भी रक्षा की जाने लगी। सम्पत्तिकी ही तरह उनका उपयोग भी किया जाता था। उस समय साधनोंका विकास न हो सकनेके कारण पैदावारके कामोंमें विशेष परिश्रम करना पडता था; क्योकि स्त्रीकी अपेक्षा पुरुष पैदावारके कठिन कामको अधिक अच्छी तरह कर सकता था, इसलिये स्त्रीको पुरुषकी प्रधानता मानकर उसकी सम्पत्ति बन जाना पड़ा। उस समय वैयक्तिक सम्पत्तिका चलन था, इसलिये स्त्री सम्पूर्ण कबीले या परिवारकी साझी सम्पत्ति थी। "जब विकाससे वैयक्तिक सम्पत्तिका काल आया तो स्त्री भी पुरुषकी वैयक्तिक सम्पत्ति बन गयी, जिसका काम पुरुषके घरेलू कामोंको करना और उसके लिये संतानके रूपमें उत्तराधिकारी पैदा करना था। परंतु स्त्री दूसरे घरेलू पशुओके ही समान उपयोगकी वस्तु न बन सकी। पुरुषके समान ही उसका भी विकास होनेके कारण या कहिये उसके भी पुरुषके समान ही मनुष्य होनेके कारण, पुरुषकी सम्पत्तिमें ठीक पुरुषके बाद उसका दर्जा मुकर्रर हुआ। आलंकारिक भाषामें इसे यों कहा गया कि वैयक्तिक सम्पत्ति या परिवारके राजमें पुरुष राजा है तो स्त्री मन्त्री। मनुष्य-जीवके विकासके नाते स्त्री और पुरुषमें कुछ भी अन्तर नहीं। मनुष्य समाजकी रक्षाके लिये वे दोनों एक समान आवश्यक ह। पुरुष यदि

शारीरिक बलमें या मस्तिष्कके कामोंमें अधिक सफलता प्राप्त कर सकता है, तो स्त्रीका महत्त्व पुरुषको उत्पन्न करनेमे कम नही है। पुरुष-समाजका जीवन स्त्री के बिना सम्भव नहीं, इसलिये पुरुषकी सम्पत्ति होकर भी स्त्री पुरुषके बराबर ही आसनपर बैठती रही है। "मार्क्सवादमें स्त्री-पुरुष-सदाचारका चाहे कितनी भी लीपा-पोतीके साथ महत्त्व गाया जाय, परन्तु यह प्रश्न प्रमुखरूपसे बना ही रहेगा कि 'क्या एक गिलास पानीके लिये गलेमें बाल्टी बाँधकर घूमते रहें ? कहीं भी गिलासभर पानी मिल सकता है।' व्यक्ति एव परिवारका समूह ही समाज है और स्त्री-पुरुषका सम्बन्ध परिवार और समाजका केन्द्र है। समाजमें सम्पत्ति-विपत्तिका कारण बहुत प्रकारके रद्दोबदल होते रहते हैं, फिर भी बहुत-से धार्मिक-सामाजिक नियम प्राकृतिक नियमो- के समान सुस्थिर होते हैं।" मार्क्सवादियोंकी ऐतिहासिक कल्पनाएँ सर्वथा निराधार है। जगत्-प्रपञ्च निरीश्वर नहीं है। सर्वज्ञ ईश्वरकी सृष्टि लावारिस एवं निर्विवेक भी नही थी। आदिम कालके ब्रह्मा, वशिष्ठ, अत्रि, अङ्गिरा, भृगु, बृहस्पति, शुक्र आदि आधु- निक लोगोंकी अपेक्षा कही अधिक बुद्धिमान् और बलवान् थे। स्वार्थ मूलक सघर्ष जैसे आज चलता है, वैसे ही कभी पहले भी चलता था। कठिन अवसरोंपर स्त्रियाँ भी लडाईमें शामिल होती थीं। इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है दुर्गाके अनेक अवतारों—महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती आदि द्वारा मधुकैटभ, महिषासुर, शुम्भ, निशुम्भ, चण्ड, मुण्ड, धूम्रलोचनादि दानवोंका सहार। पत्नी- रूपमें नारी पुरुषकी भोग्या है, परन्तु माताके रूपमें वही पुत्रकी पूज्या है। शृङ्गार- रसके लिये नारी कोमलाङ्गी है, परंतु प्रचण्ड दैत्य-दर्प-दलनमें वही भीषण कराल कालिका है। भगवतीकी यह गर्जना मार्क्सवादियोने कभी नहीं सुनी कि जो मुझे सग्राममे जीत ले, जो मेरा दर्प दूर कर सके और जो मेरे समान बलवान् हो, वही मेरा भर्त्ता हो सकता है—'यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति । यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति ॥' (दुर्गासप्त० ५। १२०) नारी सदासे ही शक्तिकी प्रतीक रही है और पुरुष शिवका प्रतीक रहा है। उसका ही रामके साथ सीतारूपमें, विष्णुके साथ लक्ष्मीरूपमें, ब्रह्माके साथ सरस्वतीरूपमें और कृष्णके साथ राधा, रुक्मिणीके रूपमे आदर होता रहा है। वह रणाङ्गणमे प्रचण्डरूप धारिणी होने- पर भी शिवके विश्राम एवं विनोदके लिये 'सत्यं शिवं सुन्दरम्' की प्रतिमा बन- कर परम कोमलाङ्गी एवं रक्षिणीरूपमें व्यक्त होती थी। वह साझेकी सम्पत्ति कभी नहीं रही। वह सदा ही गृहस्वामिनी एवं गृहलक्ष्मी रही है। द्रौपदी, मारिषाका उदाहरण विशेष वर-शापमूलक अपवादस्वरूप घटनाएँ हैं। वे आचारमें प्रमाण नहीं हैं। आचारमे उदाहरणका आदर न होकर विधि (कॉस्टि-

ट्यूशन ) का ही आदर होता है। उसके उदाहरण सती, सीता, सावित्री, दमयन्ती, अरुन्धती, अनसूया, लोपामुद्रा, शाण्डिली आदि पतिव्रताएँ हैं। क्वचित् स्त्रियोंके अनावृत होनेकी कहानियाँ अनादि, अपौरुषेय, समस्त पुदोष-शङ्का-कलङ्कशून्य शास्त्रोंके विरुद्ध होनेसे सर्वथा तात्पर्यशून्य है । अपवादभूत विपत्कालिक नियोग-प्रवर्त्तनकी पशु-तुल्य प्रवृत्तियोंका समर्थन ही उन मिथ्यार्थ-बोधक अर्थवादों- का उद्देश्य था। मन्वादिकोंने पतिके मरनेपर भी पत्यन्तरवरणका वर्जन किया है और नियोग आदिको वेन-राज्यका विगर्हित पशुधर्म बतलाया है।

पूँजीवादी युग और स्त्री

मार्क्सवादी कहते हैं—'औद्योगिक युग आनेपर जब सम्मिलित परिवार आर्थिक कारणोंसे बिखर गये, जब पुरुषोंको प्रत्येक नगरमें जीवन-निर्वाहके लिये भटकना पड़ा, उस समय सम्पूर्ण परिवारको साथ लिये फिरना सम्भव न था। इसके साथ ही पैदावारके साधन, मशीनोंका विकास हो जानेसे ऐसे हो गये कि उनमें कठोर शारीरिक परिश्रमकी जरूरत कम पड़ने लगी और स्त्रियाँ भी उन कामोको करने लगीं। बहुधा ऐसा भी हुआ कि जीवनके लिये उपयोगी पदार्थोंकी संख्या बढ़ जानेसे, जिसे दूसरे शब्दोंमें यों भी कहा जा सकता है कि जीवनका दर्जा (Standard of living) ऊँचा हो जानेसे अकेले पुरुषकी कमाई उसके परिवारके लिये काफी न थी, तब स्त्री और पुरुष दोनों मिलकर मजदूरी करने लगे और घरका खर्च चलाने लगे। इन अवस्थाओंमें पुरुषका स्त्रीपर वह कब्जा न रहा जो कृषि और घरेलू-उद्योग- धंधोंकी प्रधानताके जमानेमें था। ऊपर जिस ऐतिहासिक विकासका जिक्र हम करते आ रहे हैं, वह औद्योगिक विकासके साथ हुआ और चूँकि यह विकास यूरोपमें अधिक तेजीसे हुआ, इसलिये वही लोगोंने इसे अधिक उग्ररूपमें अनुभव भी किया। इस विकासका प्रभाव समाजके रहन-सहनके ढंगपर पड़नेसे स्त्रियोंकी अवस्थापर भी पड़ा। स्त्रियोंकी स्थिति पुरुषोंके बराबर होने लगी। उन्हें भी पुरुषोंके समान ही सामाजिक और राजनैतिक अधिकार मिलने लगे, परंतु वैयक्तिक सम्पत्तिकी प्रथा जारी रही, क्योंकि वह पूँजीवादके लिये आवश्यक थी। परिणाम स्वरूप स्त्रीके एक पुरुषसे बँधे रहनेका नियम भी जारी रहा। अब स्त्रीको पुरुषका दास न कहकर उसका साथी कहा गया, जिसे यह उपदेश दिया गया कि परिवारकी रक्षाके लिये उसे एक पुरुषके सिवा और किसी तरफ न देखना चाहिये। मौजूदा पूँजीवादी-प्रणालीमें स्त्रीकी स्थिति इसी नियमपर है। "फिर भी आर्थिक दृष्टिकोणसे जीवनके उपायोंको प्राप्त करनेके लिये स्त्री पुरुषके आधीन रही; क्योंकि परिवारके हितके ख्यालसे पुरुषने स्त्रीको अपने वशमे रखना आवश्यक समझा। जबतक समाज भूमिकी उपजसे या घरेलू

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धंधोंसे अपने जीवन-निर्वाहके साधन प्राप्त करता रहा, स्त्रीकी अवस्था परिवार और समाजमें ऐसी ही रही । क्योकि स्त्रीकी खोपड़ीमें भी पुरुषकी तरह सोचने- विचारने और उपाय ढूँढ निकालनेकी सामर्थ्य है, अतः पुरुष उसे गलेमें रस्सी बाँधकर नहीं रख सका । समाजने अपने कल्याण और हितके विचारसे स्त्रीको भी पुरुषकी तरह ही जिम्मेदार ठहराया; लेकिन स्त्रीके व्यवहारपर ऐसे प्रतिबन्ध लगाये गये जो कि सम्पत्तिके आधारपर बने परिवारकी रक्षाके लिये आवश्यक थे । उदाहरणतः स्त्रीका एक समय एक ही पुरुषसे सम्बन्ध रखना ताकि उसके दो व्यक्तियोकी सम्पत्ति बननेसे झगड़ा न उठे । पुरुषकी संतानके बारेमें झगड़ा न उठे कि संतान किसकी है, कौन पुरुष उस संतानको अपनी सम्पत्ति देगा ? यह सब ऐसे झगड़े थे जिनके कारण परिवारोंका नाश हो जाता । इसलिये स्त्रियोंके आचरणके बारेमें ऐसे नियम बनाये गये कि झगड़े उत्पन्न न हो । पतिव्रताधर्म- अर्थात् एक पुरुषसे सम्बन्ध रखनेको स्त्रीके लिये सबसे बड़ा धर्म बताया गया ताकि व्यक्तिगत सम्पत्तिके आधारपर बना हुआ समाज तहस-नहस न हो जाय । जैसा कि ऊपर बताया गया है, स्त्री बुद्धिकी दृष्टिसे मनुष्यके समान ही सामर्थ्यवान् है, इसलिये पशुओकी तरह उसके गलेमे रस्सी बाँध देनेसे काम नहीं चल सकता था । उसे समझाकर और विश्वास दिलाकर समाजमें मुख्य 'पुरुष' के हितके अनुसार चलानेकी जरूरत थी । इस कारण पुरुष और समाजके हाथमें जितने भी ऐसे साधन धर्म, नीति, रिवाज आदिके रूपमें थे, उन सबसे स्त्रीको पुरुषके आधीन होकर चलनेकी शिक्षा दी गयी । उसे समझाया गया, यहाँ चाहे वह पुरुषका मुकाबला भले ही कर ले, परंतु बादमें उसे पछताना पड़ेगा, क्योकि उसकी स्वतन्त्रतासे भगवान् और धर्म नाराज होते हैं ।" वैयक्तिक सम्पत्तिके सम्बन्धकी भी मार्क्सीय प्रथा अप्रामाणिक है । ईश्वरकी सृष्टि उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति ही थी, उसीसे उत्तराधिकार रूपमें वह उसकी संतानभूत विभिन्न प्राणियोको मिली । जिस तरह आज अखण्ड भूमण्डलमे कोई भी पर्वत, वृक्ष, नदी, क्षेत्र, ग्राम, नगर बिना मालिकके नहीं हैं, उसी तरह संसारका कोई भी अंश कभी भी बिना मालिकके नहीं था । हॉब्स या लॉकके मतानुसार निरीश्वर राज्य कभी भी नहीं था और केवल किसी व्यक्तिके द्वारा सीमाकी एक रेखामात्र बना देनेसे ही कोई भूमि उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं बन गयी और न तो रिकार्डोके अनुसार कुछ श्रममिश्रित हो जाने मात्रसे वस्तुओपर व्यक्तिगत स्वत्वका जन्म ही हुआ । किंतु मुख्यरूपसे दायसे और फिर जय, क्रय, दान, पुरस्कारादि रूपमें ही भूमि-सम्पत्ति आदिपर व्यक्तिगत अधिकार हुए हैं। अपने-अपने कर्मोंसे सुख- दुःख एवं तत्तत्साधनोंका व्यक्तिगत सम्बन्ध हुआ है । कर्मोंके ही तारतम्यसे साधनोंकी भी तारतम्यरूपसे प्राप्ति होती है । कन्यापर उसके माता-पिताका स्वत्व रहता है । पिता जिसे देता है, वही कन्याका पति होता है । माता-पिताके न