मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमार्क्स-दर्शन ५५७ किसीके पैदावारका साधन छीनना सदासे सभी पाप समझते रहे। परान्न- परद्रव्य मार्गमें पडा हो या अपने घरमें ही कोई डाल गया हो तब भी नही लेते थे— ‘परान्नं परद्रव्यं वा पथि वा यदि वा गृहे। अदत्तं नैव गृह्णीयादेतद्ब्राह्मणलक्षणम्।' दायभागमें प्राप्त अपनी बपौती सम्पत्तिको ही अपनी सम्पत्ति मानते थे। दान-पुरस्कार तथा परिश्रमाजित सम्पत्तिको ही अपनी वैध सम्पत्ति मानते थे। फिर छीनने, अपहरण करनेका उनसे सम्बन्ध ही क्या हो सकता था ? लोक, परलोक, ईश्वर, धर्म न माननेवाला जडवादी ही दूसरोकी सम्पत्ति लेनेकी सलाह दे सकना है। आस्तिक दूसरेकी गिरी हीरेकी माला या लाखोका नोटका बडल जिसके हैं, उन्हीं- को लौटा देनेकी सलाह देगा, परन्तु एक कम्युनिष्ट ऐसी सलाह दे ही कैसे सकता है ? आस्तिककी दृष्टिमें सब मनुष्य ही नही, किंतु सभी प्राणी परमेश्वरकी संतान हैं। फिर भी शिष्य गुरु को, पुत्र माता-पिताको, पत्नी पतिको, नौकर मालिकको पूज्य और अपनेको सेवक मानते हैं। पूज्यको सेव्य समझते हैं। व्यवहारमें वह सेव्य-सेवक-भाव मान्य होता है। अतएव आस्तिक किसी को गुलाम नहीं मानता। मनुष्य मनुष्यमें सेव्य-सेवकभाव चलता है। यह अब भी है और सदा रहेगा। नाम भले बदल जाय, पर वस्तु कभी नहीं बदल सकती। मिश्रकी पिरामिड, यूनान एव भारतकी विशाल इमारतोंके बनानेमें गरीबोको रोजी और नौकरी मिली है, उनका पोषण हुआ है। उनकी सम्पत्ति छीनकर ये सब चीजें नहीं बनायी गयीं। सब सम्पत्ति गरीबो, मजदूरोकी ही होती, तो वे गरीब और मजदूर ही क्यों होते ? मजदूरोने पैदावारमें हाथ बँटाया तो उसके बदलेमें वेतन पाया। कमाईका सारा फल मजदूर- का ही है, यह सिद्धान्त असिद्ध है। हाँ, उनका जीवन उन्नत और समृद्ध हो इसके लिये आस्तिकोका सदा प्रयत्न रहा। फलस्वरूप वे सुखी भी रहे। देशमें कोई दरिद्र, दुखी, अविद्वान् नहीं रहता था। 'न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपः।' 'नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना ॥' सभ्यता, संस्कृति, शिल्प, संगीतका विकास अमीर, गरीब सबके ही हितकी चीज है। रूसी विद्वान् साहित्य, संगीत ज्योतिषके अध्ययनमे संलग्न हो रहे हैं, एतावता क्या वे भी शोषक हो जायेंगे ? वैज्ञानिक लोग अनेक प्रकारके अविष्कारमें लगे हैं, वे भी तो किसान-मजदूरोंकी ही कमाई खाते हैं ? पर क्या वे शोषक कहे जायेंगे ? वस्तुतः जो भी अपने कर्त्तव्यका पालन करते हैं, वे शोषक नहीं कहे जाते। शासक, शिक्षक, अन्वेषक यदि शोषक नही तो शिल्प, संगीत, साहित्यके अभ्यासमें लगे लोग भी शोषक कैसे कहे जा सकते हैं ? श्रमके अतिरिक्त प्राकृतिक साधनोंका भी उत्पादनमें प्रमुख हाथ रहता है। अतः श्रमवालोको यदि लाभका अंश मिलता है, तो साधनवालोंका भी लाभमें हिस्सा होना अनिवार्य है। श्रमवाले- को उचित पारिश्रमिक मिलना चाहिये और साधनवालोको लाभ। शरीर, मस्तिष्क, श्रमशक्ति भी वस्तुतः प्राकृतिक ही वस्तु है। मनुष्योंने इतर यन्त्रोंके समान