भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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५५६ मार्क्सवाद और रामराज्य धर्म और अर्थ मार्क्सवादी कहते हैं कि धर्म, प्रेम या परोपकारके नामपर सर्वस्व लुटा देने या प्राण न्योछावर कर देनेका भी आधार आर्थिक ही है, क्योकि सब कुछ संतोष- तृप्तिके लिये ही किया जाता है । अन्यायके विरोधमे आत्मबलिदान करता हुआ भी प्राणी सब कुछ स्वार्थके उद्देश्यसे करता है । परंतु यहाँ स्वार्थका अर्थ व्यक्ति न समझकर श्रेणी समझना उचित है । समाजमें व्यवस्था एवं शान्ति न रहनेसे समाजके नुकसानके साथ व्यक्तिका भी नुकसान होता है । समाजकी रक्षामें ही व्यक्तिकी भी रक्षा होती है; परंतु जडवादमें उपर्युक्त बाते सङ्गत नहीं होतीं । जो देहमात्रको आत्मा मानता है, देहके नष्ट हो जानेपर आत्माका नाश मानता है वह आत्मनाशके काममे कभी भी प्रवृत्त नहीं हो सकता । आत्माके नष्ट हो जानेपर समाजकी रक्षासे फिर किसकी रक्षा होगी ? जिसकी रक्षाके लिये समाजकी रक्षा करनी है, जब उसका नाश सामने ही है तो उसकी रक्षाके लिये समाज-रक्षाकी बात ही कहाँ उठती है ? शान्ति या संतोषके लिये त्याग भी वहीतक किया जा सकता है जहाँतक जिसे शान्ति-संतोष चाहिये, वह बना रहे । जब शान्ति- संतोषका भोक्ता ही नष्ट हो जायगा तो शान्ति-संतोषका सुख कौन भोगेगा ? अध्यात्मवादी देहादिके नष्ट हो जानेपर भी सुख-शान्ति-संतोष भोगनेवाली आत्मा- को अमर मानते हैं । अतः उनका त्याग, बलिदान बन सकता है । आत्म- कल्याणके लिये धर्मार्थ, परोपकारार्थ प्राणत्यागतक करना उनकी दृष्टिसे उचित हो सकता है । अध्यात्मवादमें भी दो प्रकारका स्वार्थ होता है—एक संकुचित और दूसरा वास्तविक । जहाँ 'स्व' शब्दका अर्थ देहादि ही माना जाय वह संकुचित स्वार्थ है । वहाँ रोटी-कपड़े आदि लौकिक अभीष्ट वस्तुओंकी प्राप्ति ही स्वार्थ गिना जाता है । परंतु जहाँ 'स्व' शब्दका अर्थ देहादिभिन्न नित्य आत्मा माना जाता है, वहाँ स्वार्थका अभिप्राय वस्तुभूतस्वरूप परमेश्वरका साक्षात्कार, परमेश्वरप्राप्ति, अनर्थ- निवृत्ति तथा परमानन्दस्वरूप मोक्षप्राप्ति ही है । यह सच्चा स्वार्थ कहा जाता है— 'स्वारथ साँच जीव कहँ एहू । मन क्रम बचन राम पद नेहू ॥' इसी वास्तविक स्वार्थके अभिप्रायसे कहा गया है कि 'सब कुछ आत्माके लिये ही होता है । सर्वभूत, सर्वलोक, सर्वदेव आदिकोंमें प्रेम सर्वभूत, सर्वलोक, सर्व- देवके लिये नहीं, किंतु आत्माके लिये ही होता है । 'न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवति आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति ।' ( बृहदा० उ० ) परंतु यहाँ प्रबोध होनेपर व्यष्टि समष्टि दो नहीं रह जाते । अविद्या-दशामें ही सर्वस्वरूप आत्मा- में असर्वता अध्यारोपित है । बोध होनेपर अध्यारोपित असर्वताके बाधित होनेपर स्वाभाविक सर्वता ही व्यक्त हो जाती है । अतः वास्तविक स्वार्थ समष्टि-व्यष्टिका एक ही होता है; परंतु जडवादमे यह सब सम्भव नहीं ।