भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 313, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 313

५५४ मार्क्सवाद और रामराज्य बुद्धिमान्, ईमानदार मिटानेका प्रयत्न करता है और सफल होता है; कोई खास वर्ग या व्यक्ति ही ऐसा करता है, यह नहीं कहा जा सकता । फिर धर्म- नियन्त्रित शासन सुतरा ईश्वरीय एवं आर्ष सम्मतियोके अनुसार आगत दोषोंको तो दूर कर ही सकता है। श्रेणी और वृत्ति मार्क्सवादी कहते है कि 'जीविका पैदा करनेके क्रममें जो मनुष्य जिस स्थान- पर है वही उसकी श्रेणी है। मनुष्य जीविका उपार्जन करनेके ढंगके अनुसार अपने रहन-सहनका ढग बना लेता है, अतएव जीविकोपार्जनका ढग बदलनेसे समाजका रूप भी बदल जाता है। समाजमें पैदावारकी दृष्टिसे श्रेणियाँ अपना-अपना स्थान रखती हैं। पैदावारके फल या पैदावारके साधनोपर अधिकार करनेके लिये जो संघर्ष चलता है, वही मनुष्यसमाजका इतिहास है, वही मनुष्यसमाजके विकासका मार्ग है। विकासके मार्गमें विरोध आना आवश्यक है, विरोधसे नया विधान तैयार होता है। नया विधान समाजके विकासको आगे बढाता है।' शरीर- मात्रको आत्मा माननेवाले शरीरभिन्न आत्मा एवं उसका जन्मान्तर होने, ईश्वर एवं धर्माधर्मका रहस्य न समझनेवाले चार्वाकप्राय जडवादियोकी दृष्टिमें उपर्युक्त बाते ठीक ही हैं । परंतु तद्विपरीत रामराज्यवादीको 'पशुओ, वृक्षों-जैसी ही मनुष्योकी भी जन्मना ही ब्राह्मणादि श्रेणी मान्य है। जीविका चलानी हर मनुष्यकी मुख्य समस्या नहीं, किंतु लौकिक-पारलौकिक विविध अभ्युदय एव परम निःश्रेयस ही उसका मुख्य उद्देश्य है । तदर्थ धर्म, संस्कृति, ज्ञान, विज्ञान, शिल्प, संगीत, कला-कौशलका आविर्भाव परमावश्यक होता है। केवल मनुष्योके लिये ही जीविका कोई असाधारण समस्या नहीं है। वह पशु-पक्षियोके लिये भी अपेक्षित ही होती है। आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥ (हितो०) अतएव आस्तिकोके यहाँ वर्णानुसारिणी जीविका होती है। जीविकानुसारी वर्ण नहीं। वर्णोंके भेदसे ही शास्त्रोक्त कर्मोंका भी भेद है। राजसूय, वाजपेयादि क्षत्रिय-ब्राह्मणादिके भेदसे विहित हैं । इस तरह धर्मकी दृष्टिसे ब्राह्मणादि श्रेणियाँ ही मुख्य एव उपादेय हैं । धनी, गरीब, पूँजीपति, मजदूर आदि वास्तविक श्रेणी ही नहीं हैं। ऐसी कृत्रिम श्रेणियाँ सदा ही हानिकारक होती हैं। ब्राह्मणों, क्षत्रियो, वैश्यों, शूद्रों—सभीमे ये अमीर-गरीब होते हैं। बुद्धिमान्, निर्बुद्धि, दुर्बल, सबल कं ई जाति नहीं होती । उनके विवाह, खानदान आदि भी इन्हीं अकृत्रिम श्रेणियोंमे होते हैं। इन श्रेणियोंमे साधनोके हथियानेके लिये कभी भी सघर्ष नहीं हुआ । मार्क्स-जैसे कुछ लोगोद्वारा यह कृत्रिम भेद उत्पन्न किया