मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 300, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंवर्ग-संघर्ष २८५ जैसे गुणके बिना द्रव्य नहीं रहता, वैसे ही जातिके बिना भी द्रव्य नहीं रहता और द्रव्यके रहते जैसे गुणका नाश नहीं होता, वैसे ही जातिका भी नाश नहीं होता । इसीलिये मृतहरिणके शरीरको भी हरिण ही कहा जाता है । क्षत्रिय-गुणकर्मवाले परशुराम, द्रोण, कृप, अश्वत्थामा आदिको ब्राह्मण ही कहा गया है तथा ब्राह्मण-गुणकर्मवाले युधिष्ठिरादिको भी क्षत्रिय ही कहा गया है । शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार जैसे शूकर, कूकुर, देव, मनुष्यादि जातियाँ प्राप्त होती हैं, वैसे ही शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रियादि जातियाँ प्राप्त होती हैं— तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वा ॥ (छान्दो० उप० ५ । १० । ७) कर्मोंके अनुसार जैसे हरिणीसे हरिण उत्पन्न होते हैं, वैसे ही ब्राह्मण-ब्राह्मणी- से ब्राह्मण उत्पन्न होता है। जन्ममूलक वर्ण-व्यवस्था और तन्मूलक कर्म धर्म-व्यवस्था होती है । जन्मना वर्ण और कर्मणा उत्कर्ष यही व्यावहारिक स्थिति है । योनि-विद्या और तप ब्राह्मण्यका कारण होता है । विद्या-तपके बिना भी जाति ब्राह्मण्य होता है । योनि बिना विद्या और तपसे 'सिंहो माणवकः' के समान गौण ब्राह्मण्य आता है। सिंह- सिंहीसे जन्म होने और शौर्य न होनेसे जाति सिंहत्वका व्यवहार होता है। पर सिंह- सिंहीसे जन्म न होने तथा शौर्य आदि गुणयोग होनेपर गौण सिंहत्वका व्यवहार होता है। 'जन्मना प्राप्यते सा जातिः ।' जाति मुख्यरूपसे जन्मना ही होती है, फिर भी कहीं-कहीं देशके नामसे भी जातिका व्यवहार होता है । इसका कारण यह है कि देशके सम्बन्धमे जाति-व्यञ्जक स्थितिमें विशेषता आती है । विभिन्न देशके जलवायु आदिके प्रभावसे रंग-रूप- बनावटमें भेद पड़ता है । व्रीहि आदि अन्नों, आम्रादि फलोंपर भी देशका प्रभाव पड़ता है । इन सब बातोंका प्रभाव मनुष्योंपर भी पड़ता है । इसलिये चीनी, जापानी, बर्मी, इंगलिश, अफ्रीकी मनुष्योंके भी रूप रंग-बनावटका भेद उपलब्ध होता है । तत्तत्स्थान भेदसे व्यंग्य होनेके कारण उनमें जाति भेदकी कल्पना होती है । अधिक क्या, भारतमें भी नेपाली, मैथिल, पजाबी, द्रविण, बंगाली, उत्कल, मद्रासी मनुष्योंमें बनावटका भेद उपलब्ध होता है । यावद्द्रव्यभावी होनेके कारण देशादि-जन्य विशेषताओंके कारण जातिभेदकी कल्पना चल सकती है । परंतु ब्राह्मणत्वादि जाति-संस्थान व्यंग्य नहीं है, वह साक्षात् उपदेशगम्य होती है। यही कारण है कि मिथिला, उत्कल, महाराष्ट्र, तैलंगादि भारतके विभिन्न भागोंके मनुष्योंमें बनावटका भेद होनेपर भी ब्राह्मणत्व-क्षत्रियत्वादि सर्वत्र समान माना जाता है । यदि दैवात् परम्परासे ब्राह्मणत्वादि जातियाँ और वेदशास्त्रानुकूल आचरण अंग्रेजों, जर्मनों और यहूदियोंके भी बने होते तो उनके रूप-रंगके भेद रहनेपर भी