भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्सवाद और रामराज्य ब्राह्मणादि माननेमें कोई आपत्ति न होती । बल्कि अपने मनु आदि स्मृति- कारोंने माना ही यह है कि बहुत से-क्षत्रिय दिग्विजयके लिये बाहर जाकर ब्राह्मणोंके साथ सम्बन्ध और वैदिक आचार-विचार छूट जानेसे म्लेच्छजातिके हो गये— शनकैस्तु क्रियालोपादिमाः क्षत्रियजातयः । वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥ पौण्ड्रकाश्चौण्ड्रद्रविडाः काम्बोजा यवनाः शकाः । पारदाः पह्लवाश्चीनाः किराता दरदाः खशाः ॥ मुखबाहूरुपज्जानां या लोके जातयो बहिः । म्लेच्छवाचश्चार्यवाचः सर्वे ते दस्यवः स्मृताः ॥ ( मनु० १० । ४३–४५ ) इस तरह वैदिकोंमें किसी तरह द्वेष या रागसे उत्कर्षापकर्षकी कल्पना नही है । तात्त्विक जाति-भेद होनेपर भी किसीका उत्थान ज्ञान उन्हे नहीं खलता । इसलिये धर्मव्याध आदि अन्त्यज, विदुरादि शूद्र, तुलाधार आदि वैश्यो-जैसे यहाँ कितने