मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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चाहिये । दूसरा श्रेय वैज्ञानिकोंको सहायता, प्रोत्साहन एव सामग्री देनेवाले धनवानोंको होना चाहिये । जबतक वे पुराने स्वत्वके नियमोमे रद्दोबदल नहीं चाहते, केवल मजदूरोकी इच्छामात्रसे रद्दोबदल कैसे हो सकता है ? बड़े-बड़े वैज्ञानिक, आविष्कारक, अन्वेषक एव धनवान् आदि तो कम्युनिष्टोके मतानुसार शोषित वर्गमें नहीं आ सकते, वे तो शोषक वर्गमें ही चले जायेंगे । फिर वे पुरानी व्यवस्थामें रद्दोबदल क्यों चाहेंगे ? केवल आविष्कारकोंके आविष्कारो, यन्त्रो एव मजदूरोके प्रयत्नसे ही नहीं उत्पादन होता, किंतु उसमें पूँजी भी अपेक्षित होती है । यदि पूँजी न हो तो यन्त्र ही कहाँसे खरीदे जायें ? मजदूरोके लिये मजदूरी कहाँसे आये ? वैज्ञानिकों, अन्वेषकोको सुविधा भी कहाँसे मिले ? अतः उत्पादन-साधनमे रद्दोबदलका मुख्य श्रेय पूँजीपतिको ही क्यो न दिया जाय ? इसके अतिरिक्त कोयला, पेट्रोल, लोहा, ताँबा, गन्धक आदिकी खाने तथा अन्य कच्चे माल न हों तो वैज्ञानिक, पूँजीपति, मजदूर कोई भी उसका उत्पादन नहीं कर सकेगा, न यन्त्र बना सकते हैं, न उत्पादन-साधनोमे ही रद्दोबदल कर सकते हैं । वस्तुतः ईश्वर ही वह वस्तु है जिसके अखण्ड भण्डार प्रकृतिमें ही विभिन्न खाने हैं । जिसकी पृथ्वीसे ही लोहा, सोना, हीरा, गन्धक, पारा, कपास, अन्न, फल आदि कच्चे माल पैदा होते हैं । इनके बिना पूँजीपति, वैज्ञानिक, मजदूर सब बेकार हैं । इतना ही क्यो, वैज्ञानिकोंके बल, दिमाग, बुद्धि भी ( जिसके द्वारा वे भिन्न-भिन्न आविष्कार करते हैं ) किसी लौकिक अन्वेषकका आविष्कार नहीं है; किंतु ईश्वरका ही आविष्कार है । मजदूरोके देह-मन-बुद्धिमें कार्यक्षमता भी ईश्वरदत्त ही है । अतः ईश्वरीय शक्तियो एव वस्तुओके सहारे कुछ अन्वेषण या उत्पादन बढाने मात्रके कारण कुछ व्यक्तियो या व्यक्तिसमूहोको ईश्वरीय धार्मिक सामाजिक नियमोमें रद्दोबदल करनेका अधिकार हर्रिगज नहीं है । रहा यह कि 'बहुमतके आधारपर उनका रद्दोबदल किया जाय ।' तो यह भी ठीक नहीं । कारण, मार्क्सवादी बहुमतका कोई महत्त्व नही मानते । जिसमें शोषक पूँजी- पतिके मतका भी उपयोग किया जा सके, ऐसा बहुमत कम्युनिष्टको सर्वथा अमान्य है । शोषको एव शोषितोके वोटोका समानरूपसे महत्त्व देनेका कम्युनिष्ट मखौल उड़ाते हैं । दूसरोके यहाँ भी बहुमत उसी हदतक आदरणीय हो सकता है, जहाँतक बहुमत विशेषज्ञोके मतसे न टकराये । जैसे रोगीकी चिकित्साके सम्बन्धमें चिकित्साविशेषज्ञ वैद्य-डाक्टरके मुकाबले सामान्य जनोके बहुमतका कोई मूल्य नहीं है । घडी आदि यन्त्रोंके सुधार या निर्माण आदिके सम्बन्धमे यन्त्रविशेषज्ञ एवं शिल्पीके मुकाबले सामान्य जन-बहुमतकी कोई कीमत नहीं है । एक नेत्रवान्के कथनानुसार शङ्खकी शुक्लताका निर्णय होगा । दम या दस लाख अथवा दस करोड़ अन्धोंकी सम्मतिसे शङ्खकी कृष्णता अमान्य होती है । ठीक