भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 280

Here is the accurate transcription of the text from the image, line by line:

वर्ग-संघर्ष २६५ विस्तार अवश्य हो जाता है, उत्पन्न वस्तुओंमें सस्तापन भी आता है तथा आमदनीमें भी वृद्धि हो जाती है । पर माल खपतके लिये बाजारोंकी आवश्यकता, माल भेजने तथा कारखानोंके लिये कोयले, पेट्रोलके खानोंकी आवश्यकता, बाजारों एवं कोयले- पेट्रोल आदिके लिये सङ्घर्ष एवं बेकारीकी समस्या अवश्य खड़ी होती है । इसीलिये रामराज्यमें उद्योगोंका विकेन्द्रीकरण अभीष्ट है । छोटे व्यवसायों- द्वारा स्वावलम्बी ढङ्गसे बेकारी दूर कर व्यापकरूपसे रोजगारोंकी व्यवस्था की जाती है । कम्यूनिष्ट यद्यपि बड़ी-बड़ी पुस्तकोंमें कलकारखानोंके द्वारा गरीबोंके रोजगार छिन जानेकी चीख-पुकार मचाते हैं, परंतु उन्हीं कलकारखानोंका ही वे समर्थन भी करते हैं । इतना ही क्यों, वे कलकारखानोंके विस्तारसे ही मजदूरोंका लाखोंकी संख्यामें एकत्रित एवं सङ्गठित हो सकना तथा मजदूर-आन्दोलनोंके द्वारा कम्यूनिष्ट राज्य-स्थापनाका भी स्वप्न देखते हैं । अस्तु, ईश्वर एवं धर्मकी भावना दृढ होनेसे वैभव एवं सम्पत्तिवाले सम्पत्तिका सदुपयोग राष्ट्रके पोषणमें तथा जीवन-स्तर उन्नत करनेमें करेंगे । बेकारी दूर करनेके काममें सम्पत्ति उपयुक्त होगी । इसीलिये प्राचीनकालमें आजकी अपेक्षा कहीं अधिक सम्पत्ति, शक्तिबल, विद्या, दक्षताके रहनेपर भी असंतुलित विषमता, बेकारी, कलह आदि नहीं था । ईश्वर-धर्मकी भावना घटनेसे ही मात्स्यन्याय परस्पर भक्ष्य-भक्षकभाव, शोषक-शोषित भाव बढ़ता है । पर उसे ही मार्क्सवादी गुण मानते हैं । वर्ग- कलह, वर्ग-विद्वेष, वर्ग-विध्वंस ही जिसके सिद्धान्त एवं सत्ताका आधार हो, वही जिसके जीवन एवं उन्नतिका एकमात्र साधन हो, उससे विश्वशान्ति एवं विश्वमें समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृत्वकी आशा करना व्यर्थ है । अस्तु । उत्पादन-विस्तारसे कुछ भौतिक परिवर्तन होनेपर भी धर्मदर्शन एवं राजनीतिक नियमोंमें स्वत्वोंके रद्दोबदलका कोई प्रसङ्ग नहीं होता । अमेरिका आदिकोंमें बिना मौलिक रद्दोबदलके भी काम चलता ही है। आर्थिक दशा, सामाजिक, धार्मिक नियमोंकी नींव ही नहीं, जिससे आर्थिक-दशामें परिवर्तन होने- से धार्मिक नियमरूप भवन ढह पड़ें और उनमें रद्दोबदल आवश्यक हो । जो कहते हैं कि 'जिन लोगोंने उत्पादन साधनोंमें रद्दोबदल कर लिया उन्हें उत्पन्न हुई वस्तुओंके वितरणसम्बन्धी नियमोंमें भी रद्दोबदल कर लेनेका अधिकार मानना न्यायसङ्गत है । अतः पुत्र-पौत्रादिका पिता-पितामहादिकी सम्पत्तिमें दायपसे बपोती सम्पत्तिके रूपमें अधिकार माननेके नियम भी रद्दोबदल करके तथा सभी स्वत्व-सम्बन्धी पुराने नियमोंमें भी रद्दोबदल करके समाजीकरण या राष्ट्रीयकरणका सिद्धान्त मानना ठीक ही है। पर यह पक्ष विचारणीय है कि उत्पादन साधनोंमें रद्दोबदल करनेका मुख्य श्रेय किसे है । क्या साधारण मजदूर- समुदायको ? कहना पड़ेगा कि बड़े-बड़े वैज्ञानिको, अन्वेषकोंको ही इसका श्रेय होना