मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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बनाता है। भय और लोभके बिना आमतौरपर प्राणी निरुत्साह रहता है। सब वस्तुओके राष्ट्रियकरणसे मनुष्य भी यन्त्रवत् काम करता है, ममत्व न होनेसे तत्परता और सावधानीसे काम नहीं होता। जिस नौकरशाहीकी पहले निन्दा की जाता थी, वही नौकरशाही सिरपर आ जाती है। यही कारण है कि नौकरोकी देख-रेख रहते हुए भी गोदामोंमें लाखो टन अन्न सड़ जाते हैं। उपार्जन करने- वालोको जितनी ममता अपनी छोटी अन्नराशिमे होती है और जितनी तत्परतासे वह उसकी रक्षा करता है, सरकारी नौकरोंमें न उतनी ममता ही होती है और न तो रक्षणका ही ध्यान रहता है। यही स्थिति बड़े-बड़े कामोंकी है। कागजी घोड़े दौड़ानेमें करोड़ो खर्च हो जाते हैं, काम कुछ नहीं हो पाता। दामोदर- घाटी, हीराकुण्ड आदिके कामोंमे कितना व्यय और कितनी असफलता हुई, यह स्पष्ट ही है पजाबके बाँध और विद्युत्केन्द्र निर्माणमें भी यही हालत है। अस्तु ! अभिप्राय यह है कि जब विकेन्द्रीकरणके पक्षमें अनेक अच्छाइयाँ है तो आस्तिकोको उसे व्यवहारमें लानेका प्रयत्न करना चाहिये। सबसे पहले तो प्रत्येक नागरिक यह नियम बनाये कि उसके ग्राम, नगर, पड़ोसमें कोई व्यक्ति भूखा, नगा नहीं रहने पायेगा। बिना भूखेको खिलाये न खायेंगे। रोगीका इलाज-प्रबन्ध बिना किये विश्राम न करेंगे। विशेषतः शासक तो कुटुम्बपतिके तुल्य होता है। जैसे कुटुम्बके भोजन, वस्त्रका प्रबन्ध कर लेनेके बाद ही कुटुम्बपति भोजन, वस्त्र ग्रहण करता है, उसी तरह राष्ट्रके भोजन, वस्त्रादिका प्रबन्ध करा लेनेके बाद ही शासकोंको भोजन, वस्त्रादि ग्रहण करना चाहिये। इतना ही क्यों, भगवान् शिवके समान कुटुम्ब- पति अमृत कुटुम्बके अन्य सदस्योको बाँट देता है और स्वयं विषको ही ग्रहण कर लेता है। कौस्तुभ, लक्ष्मी, ऐरावत, उच्चैःश्रवा, अमृत आदि अन्य सभी रत्न देवताओके हिस्सेमे पडे, विष शङ्करके हिस्सेमें। विषको भी शिवजीने पेटमें रखकर न तो पेटको ही विषैला बनाया और न मुखमे रखकर मुखको ही जहरीला बनाया, बल्कि उसे कण्ठमें ही रख लिया। ठीक ऐसे ही कुटुम्ब या राष्ट्रके मालिक पुरुखाको कठिनाइयोको विषके घूँटके तुल्य स्वयं सहना पडता है। वह उसकी कटुतासे न पेटको, न मुखको ही कड़वा बनने देता है। पेटका विषैलापन या मुखका विषैलापन दोनों ही सघटनको छिन्न-भिन्न कर देते है। परन्तु जब कोई अच्छी वस्तु, अच्छे वस्त्र, भूषण, भोजनादि मिलें तो घरका कोई मालिक अपने बच्चोंकी और अपनी परवा न कर कुटुम्बके अन्य सदस्योको ही बाँट देता है। तभी उसके नियन्त्रणमें कुटुम्बका संचालन ठीक चलता है। उत्पादन और नियम उत्पत्तिके पुराने साधनो एवं पद्धतियोंमें रद्दोबदल होनेसे उत्पादनमें