मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसी तरह अपौरुषेय शास्त्र आर्ष-विज्ञानके आधारपर धर्मका स्वरूप निर्णय किया जाता है, उसमें रद्दोबदलकी बात सोची नहीं जा सकती है । सामान्यजनोंके बहुमतके आधारपर वैज्ञानिको या मजदूरोँकी सम्मतिसे धर्ममेँ रद्दोबदल करनेकी बात वैसी ही मूर्खताकी होगी, जैसे गँवारोँकी सम्मतिसे हवाई जहाजका पुर्जा सुधारना और वकीलोँसे हृदयका आपरेशन कराना । वैद्यों-डाक्टरोँसे वायुयानके कल-पुर्जे सुधारना शुद्ध मूर्खता है । जो वस्तु उपयोगार्ह नहीं रह जाती वह अवश्य छूट जाती है, परन्तु चन्द्र, सूर्य, पृथ्वी, जल आदिके समान शास्त्रोक्त धर्म नियम कभी अनुपयोगी नहीं होते । ईश्वर, उसकी उपासना एव तदुपयोगी धर्म और नीति भी कभी अनुपयोगी नहीं होते । प्राचीनता-नवीनताका सघर्ष, प्राचीनताका विनाश एव तदनुकूल तर्क, दर्शन, विवेक, वस्तुतः अविवेक ही है । पुराण पुरुष, आत्मा, परमात्मा, आकाश, वायु, चन्द्र, सूर्य, पृथ्वी आदिके समान, धार्मिक दार्शनिक राजनीतिक सत्य सिद्धान्त, न्याय, उपासना आदि प्राचीन होनेपर भी त्याज्य नहीं हैं । कालरा, प्लेग आदिके तुल्य वर्ग-कलह, वर्ग-द्वेष, अधर्मका प्रचार आदि नवीन होनेपर भी त्याज्य ही हैं । कभी चकमक पत्थर, कभी अरणीमन्थन, कभी दियासलाई तथा आधुनिक अन्य वैज्ञानिक साधनोँमे अग्नि प्रकट किया जाता है, परन्तु एतावता अग्निके दाहकत्व, प्रकाश- कत्व आदि धर्मोँमें परिवर्तन नहीं कहा जा सकता । इसीलिये बुद्धिमानोँने कहा है— पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि सर्वं नवमित्यवद्यम् । सन्तः परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ॥ ( मालविकाग्निमित्रम् १।२ ) अर्थात्—सब वस्तु पुरानी होनेसे ही अच्छी नहीं एव नयी होनेसे ही खराब नहीं । सत्पुरुष परीक्षा करके पुरानी या नयी वस्तुओँमें जो भी उचित या श्रेष्ठ हो उसे ग्रहण करते हैं । मूढ लोग ही परप्रत्ययनेय बुद्धि होते हैं । यही न्याय आज नवीनतावादियोँपर भी लागू है । वे भी नवीन होनेसे ही किसीको ठीक समझते हैं तथा प्राचीन होनेसे ही धर्म, दर्शन, नीति, सबका परित्याग करनेके लिये प्रस्तुत होते हैं । उन्हें भी निष्पक्ष दृष्टिसे प्राचीन, नवीनकी परीक्षा करनी चाहिये । उचित होनेसे प्राचीन या नवीन किसी भी पक्षका ग्रहण किया जा सकता है । उपर्युक्त युक्तियोँमे दिखलाया जा चुका कि ईश्वरीय शास्त्र, धार्मिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक नियमोँमें परिवर्तन नहीं हो सकता । वर्ण-विद्वेष कहा जाता है कि “जिन प्राचीन हब्शी-भिल्ल आदि जगली जातियोँमें प्राचीन कालके अनुसार जीवन व्यतीत होता है, उनमें व्यक्तिगत सम्पत्तिका अभाव है अथवा उन्नति नहीं हुई । उनमें न वर्ग-भेद है, न किसी वर्ग विशेषका