मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअधिकार है—न वर्ग-विरोध है । गाँवके मुखिया, पण्डित, पञ्च, प्रचलित रीतियों, धार्मिक अनुष्ठानोंका पालन कराते हैं, परंतु व्यापारकी वृद्धि और युद्धोंके फल- स्वरूप जब प्राचीन व्यवस्थाका लोप हो जाता है, व्यक्तिगत सम्पत्ति बढने लगती है, तभी उन लोगोंमें वर्गभेद उत्पन्न होता है । कुछके पास सम्पत्ति होती है, कुछके पास नहीं होती । सम्पत्तिवाला वर्ग शासन चलाता है, कानून बनाता है, नवीन प्रथाओ और संस्थाओकी सृष्टि करता है । इन सब कामोका उद्देश्य होता है, उस अधिकारी वर्गके हितो और स्वार्थोकी रक्षा करना । उस वर्गके समाजकी विचारधारा उसके ही हितों एव स्वार्थोंके अनुकूल बहने लगती है । जबतक ये स्वार्थ कुछ अगोंमें सर्वसाधारणकी भलाईके अनुकूल होते हैं, जबतक उत्पादक शक्तियो एवं उत्पादन प्रणालीमें बहुत अधिक विरोध पैदा नहीं हो जाता, तबतक विभिन्न वर्गों एव समूहोमे समझौता या सुलह बनी रहती है । जब उत्पादक शक्तियो एव उत्पादन-प्रणालीमें भेद या विरोध बढ जाता है, उस प्रणालीसे अधीन वर्गकी आवश्यकताएँ पूरी नहीं हो सकतीं, तब वर्गकलह आरम्भ हो जाता है। फिर या तो उस समय कानूनी समझौता, शासनसुधार होता है अथवा उस समाजका विनाश होता है और नवीन सामाजिक प्रणालीका आविर्भाव होता है । यहूदी, यूनानी, रोमन आदि लोगोका इतिहास ही इसका उदाहरण है। इस तरह अमीरो, गरीबो, कुलीनों, अकुलीनो, छोटों,बड़ों,गुलामो, नागरिकोका सघर्ष जारी रहता है। अन्तमें इन समाजोका उच्छेद होता है । साथ ही इन वर्ग-कलहोंसे ज्ञान भण्डारकी वृद्धि होती है । मालिको, गुलामो, जमीनदारो, किसानोंके समान ही पूँजीपतियों, श्रमजीवियोंका भी वर्गकलह अनिवार्य होता है और इससे क्रान्तिका जन्म तथा नवीन सिद्धान्तोका प्रचार होता है । इस ऐतिहासिक विरोध और कलहके अनुसार ही बौद्धिक और राजनीतिक विरोधकी उत्पत्ति होती है । यह बौद्ध विरोध जननेताओं या पैगम्बरोद्वारा विभिन्न मत-मतान्तरोंके रूपमे प्रकट होता है । उदाहरणार्थ, वैदिक, बौद्ध, ईश्वरवादी या अनीश्वरवादी, कैथलिक, प्रोटेस्टेण्ट, भौतिकवादी, अध्यात्मवादीका नाम लिया जा सकता है । ये सभी मत-मतान्तर चाहे जितने भी सूक्ष्म और आध्यात्मिक प्रतीत होते हो, सासारिक जीवन और भौतिक प्रपञ्चसे कितने भी पृथक् क्यों न प्रतीत होते हों, परंतु उनके मूलका पता लगानेसे विदित होगा कि उनका भी आधार भौतिक ही है । समाजके आर्थिक आधार और उत्पत्तिकी प्रणालीमे विरोध उत्पन्न हो जाने और इसी कारण भिन्न-भिन्न वर्गों—दलोंमें कलह आरम्भ होनेसे ही सभी मत-मतान्तरोंकी उत्पत्ति हुई है । ''इसी तरह समस्त नैतिक, राजनीतिक, अर्थशास्त्र-सम्बन्धी प्रणालियो ( जो कि प्रधानता पानेके लिये परस्पर प्रतियोगिता कर रही हैं ) और समस्त प्रादेशिक या व्यापक युद्धोंके तात्कालिक कारण चाहे कुछ भी हों, पर मूलकारण सामाजिक