भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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आर्थिक दशा ही है । इसी तरह आदर्शवाद, उपयोगितावाद, एकतन्त्र, प्रजा- तन्त्र, रक्षित व्यापार, मुक्त व्यापार, राज्यनियन्त्रित अर्थव्यवस्था, स्वतन्त्र आर्थिक व्यवस्था, समाजवाद, व्यक्तिवाद आदि जितने भी सिद्धान्त घोषित किये जाते हैं, उनके समर्थनमें चाहे जितने भी उच्च भावनायुक्त तर्क उपस्थित किये जायें और उच्च उद्देश्य बतलाये जायें, पर उन सबकी उत्पत्ति समाजके भौतिक आधार और उत्पादन-प्रणालीद्वारा ही होती है ।” कम्युनिष्ट मैनिफेस्टोमें ऐतिहासिक भौतिकवादका सारांश इस प्रकार कहा गया है—“इसे समझनेके लिये किसी गम्भीर अन्तर्ज्ञानकी आवश्यकता नहीं है कि मनुष्यकी भौतिक अवस्था और सामाजिक जीवनकी दशामें परिवर्तन होनेसे ही उसके मानसिक भावों, विचारों और धारणाओंमें भी परिवर्तन होता है । ससारके विचारोंका इतिहास यही बताता है । भौतिक उत्पत्ति, पैदावारमें परिवर्तन होनेसे बौद्धिक उत्पत्तिमें भी परिवर्तन होता है । जब जिस वर्गका शासन होता है तब उसके ही विचारोंकी प्रधानता होती है । जीवन-निर्वाहकी प्राचीन प्रणालीका नाश होते ही, प्राचीन विचारोंका ही लोप हो जाता है । यूरोपमे ईसाई धर्म तथा भारतमें बौद्धधर्मका आविर्भाव एव पुराने धर्मका लोप भी आर्थिक दशाके बदलनेसे ही हुआ था । उत्पत्तिकी प्रणाली, सामाजिक वर्गविभाग और सम्पत्ति-सम्बन्धी नियम जब उत्पादक शक्तियोंके लिये बन्धनरूप बन जाते हैं और विभिन्न वर्गोंका स्वार्थ, विरोध वर्गकलहका रूप धारण कर लेता है, तब सामाजिक क्रान्तिका युग आता है । इससे प्राचीन समाज नष्ट होकर विस्मृतिके गर्भमें चला जाता है । परतु वह नष्ट होनेसे पहले जीवनके नवीन मार्गका निर्माण कर देता है, जो उत्पादक-शक्तियोंके अनुरूप होता है । इस नवीन समाजकी वृद्धि चाहनेवाले लोग क्रान्तिकारी भावना- ओसे उत्पन्न होनेवाली समस्याओको हल करनेमें संलग्न हो जाते हैं । इस तरह उत्पादक शक्तियोकी उन्नति और पूर्णता ही मनुष्यजातिके विकासका सार है । “आदिकालीन, मध्यकालीन, वर्तमानकालीन उत्पादन-प्रणालियोको मनुष्य- समाजकी प्रगतिके विभिन्न युग कहते हैं । वर्तमान पूँजीवादी समाजकी उत्पादन- प्रणाली इस विरोधयुक्त शृङ्खलाकी अन्तिम कडी है । यह विरोध व्यक्तिगत नहीं, किंतु समाजकी परिस्थितिद्वारा उत्पन्न होता है । साथ ही पूँजीवादके भीतर जो उत्पादक शक्तियाँ उत्पन्न हो रही हैं, वे इस विरोधको मिटानेका मार्ग भी प्रशस्त कर रही हैं । इस प्रकार पूँजीवादी समाज मनुष्य-जातिके प्रागैतिहासिक युगका अन्तिम अध्याय है ।” उपर्युक्त बातोका खण्डन पूर्वोक्त युक्तियोसे ही हो जाता है । कम्युनिष्ट वर्ग- कलह, वर्गविद्वेष या वर्गसंघर्षको ही वर्गविकास एव ज्ञान भण्डार वृद्धिका कारण कहते हैं । साथ ही वर्गभेदको ही विकास या उन्नतिका लिङ्ग मानते हैं । अतएव

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