भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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हबशी या भिल्ल आदि जंगली अविकसित जातियोंमें वर्गभेदका अभाव बतलाते हैं। परंतु यह सुविचारित सिद्धान्त है कि सुमति, दक्षता, सदाचार, सद्धर्म, नियन्त्रण, सहिष्णुतासे वैमत्य मतभेद मिटता है और सघटन, समन्वय, सामञ्जस्य एव सौमनस्य होता है। इसका महत्त्व ऋग्वेद तथा अथर्ववेदमे भी सौमस्य सूत्रोंके द्वारा कहा है— 'संगच्छध्वं संवदध्वं स वो मनांसि जायताम्' आदि मन्त्रोंके द्वारा सगमन, सवदन तथा सौमनस्य-सघटन आदिको अभ्युदय- का कारण कहा गया है। 'मा विद्विषावहै' आदि मन्त्रोद्वारा ईश्वरसे भी परस्पर द्वेष मिटानेकी प्रार्थना की गयी है। जहाँ दुर्बुद्धि, दुर्भावना, असहिष्णुता, उच्छृङ्खलता बढ़ती है, वही विद्वेष, वैमनस्य, विवाद तथा विनाश आदि होता है। यदि कलह, संघर्ष, विद्वेष, विनाश आदि ही सभ्यता या प्रगतिशीलता है और सघर्ष, विनाश, वर्गविद्वेष आदि न होना पिछड़ना या असभ्यता है तो कोई भी बुद्धिमान् कहेगा कि ऐसी सभ्यतासे असभ्यता ही ठीक है, ऐसी प्रगतिसे अप्रगति ही ठीक है। तभी तो आजके बर्बरतापूर्ण नरसहार, अशिष्टता, असभ्यता, दुर्दान्तताका नग्न अकाण्ड ताण्डव एव मानवताको त्रस्त करनेवाली, पशुताको मात करनेवाली स्वेच्छाचारिता, विलासिताको प्रगति एवं सभ्यता माना जा रहा है। वस्तुतः यह विपरीत बुद्धि है। वैभव, सम्पत्ति, उन्नति, प्रगति, विघटन, वैमनस्य कभी भी वर्गविनाशका कारण नहीं होता। गरीबी भी विघटनकी कारण नहीं होती। प्रमाद, मूर्खता, विलासिता, स्वेच्छाचारिता, स्वार्थपरायणता ही विघटन, वैमनस्यका कारण होती है। इन दोषोसे युक्त होनेसे गरीबो-अमीरो सबमें विघटन होता है। चाहे अमीर हो या गरीब, जंगली हो या नागरिक, प्रगतिशील हों या अप्रगतिशील, मनुष्य हो या देवता अथवा पशु ही क्यो न हों, जहाँ दुर्बुद्धि, अविवेक और स्वार्थपरायणता बढ़ती है, वहीं विद्वेष, वैमनस्य, विघटन और विनाश बढ़ता है। जहाँ सद्बुद्धि, सदाचार, नियन्त्रण, सहिष्णुता है, वहाँ प्रेम सघटन उन्नति ही होती है। इसीलिये जगली पशुओ, मनुष्यो, देवताओमें भी इन गुणोके आधारपर सघटन रहता है। गुणोके अभाव एव दोषोंके बढ़ जानेपर विघटन आदि बढ़ता है। मधुमक्खियोका संघटन प्रसिद्ध है। कपोतों एवं अन्यान्य पशु-पक्षियोमें भी संघटन होता है। कहते हैं, कुछ कपोत जालमें फँस गये, एकमत होकर एककी रायसे वे सब जाल लेकर उड़ गये एवं अपने मित्र हिरण्यक-मूषककी सहा- यतासे मुक्त हो गये। जंगली गाये एकत्र होकर सिंहका भी मुकाबला करती हैं। वे निर्बल, बाल-वृद्ध पशुओको मध्यमें रखकर प्रबल साँड़ोको आगे करके सिंह-व्याघ्रका मुकाबला करती हैं और अपने आपको बचा लेती हैं। कम्युनिष्टोको भी मजदूर- सघटनसे अथ च दृढ प्रयत्नसे ही सफलता मिल सकती है। संघटनमें केवल एक