भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 286, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 286

वर्ग-संघर्ष २७१ स्वार्थ ही नहीं, किंतु सहिष्णु मनकी एकता ही मूल कारण है। एक उद्देश्यकी सिद्धिके लिये एक सूत्रमें समन्वित व्यक्तियोंका ग्रथित होना ही सङ्घटन है। महान् प्रयोजन होनेपर भी असहिष्णु, स्वेच्छाचारी सङ्घटित नहीं हो सकते। कदाचित् किसी स्वार्थके लिये कुछ क्षणके लिये सङ्घटित हो भी जाते हैं तो भी पद प्राप्त हो जानेपर स्वार्थके टकराते ही संघटन छिन्न-भिन्न हो जाता है। यही बात जड़वादियोंके सङ्घटनोंमें देखी जाती है। अधिकार-प्राप्तिके लिये 'सफाया, या 'कण्टक-शोधन' के नामपर अधिकारारूढ लोग अपने पुराने साथियोंको ही मौतके घाट उतारने लगते हैं। अमृत-प्राप्तिके लिये देवताओं एवं दानवोंमें भी संघटन हुआ था, पर स्वार्थमें आघात आते ही भीषण देवासुर-संग्राम हुआ। जालमें फँसे हुए लोमश बिल्लने, दो शत्रुओंसे घिरे हुए पलित मूषकका सन्धि प्रस्ताव भी स्वीकार किया था। बिडालसे मित्रता करके मूषक अपने शत्रु सर्प एव श्येनसे मुक्त हुआ। आत्म