मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७२ मार्क्सवाद और रामराज्य मनु, इक्ष्वाकु, दुष्यन्त, भरत, हरिश्चन्द्र, रामचन्द्र, शिबि, रन्तिदेव आदि ऐश्वर्यपूर्ण होनेपर भी प्रमत्त न होकर निरन्तर धर्मनिष्ठ ईश्वरपरायण रहकर विश्वहितमें लीन रहे, अतः उनकी उत्तरोत्तर उन्नति हुई है । यह बात— विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय । खलस्य साधोः विपरीतमेतद् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ॥ ( गुणरत्नम् ७ ) —से स्पष्ट कर दी गयी है । विद्या, बुद्धि, शिक्षा आदिके सम्बन्धमें अपनेसे अधिक वृद्ध, बुद्धिमान् एवं विद्वान्से लोग तत्तद् वस्तुओको प्राप्त करते हैं । यहाँ गुरु-शिष्यभाव रहता है— द्वेष नहीं । पूर्वजोमें पूज्य-बुद्धि होती है, विरोध-बुद्धि नहीं । इसी तरह जिन प्राचीन नियमोसे प्राणीकी उन्नति होती है, उनके प्रति भी विरोध-बुद्धि नही होती । पूर्व-पूर्व अवस्थासे उत्तरोत्तर उन्नति होती है तो पूर्व-पूर्व अवस्थासे उत्तरोत्तर अवस्थाके संघर्षका अवकाश नहीं रहता । पूर्व-पूर्वकी पुञ्जी एव साधनो- के सहयोगसे उत्तरोत्तर पुंजी एवं साधनोंकी वृद्धि अवश्य होती है । कोई व्यापारी सहस्त्रसे लक्ष, लक्षसे कोटि कमाता है अतः परस्पर साध्य-साधन भाव या उपकारी- उपकारक भाव होना ही अधिक न्यायसङ्गत है । इसीलिये पूर्वकालमें ईश्वर, धर्म, धार्मिक राजा, धनवान्, पूँजीपति एवं सुखी किसान, सेवक, शूरवीर सभी साथ रह सकते थे । बैलगाड़ी, पुष्पकयान, पादचारी भी साथ रह सकते थे । लाठीसे लेकर ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्रतक शस्त्रास्त्र थे । हाथके करघेसे लेकर महायन्त्र- तक थे । विश्वकर्मा, मयके आविष्कारके साथ हाथसे पर्णशाला बनाकर रहनेवाले भी थे । सब एक दूमरेके पोषक थे शोषक नहीं । साराश यह है कि शास्त्र, धर्म एव ईश्वरभावके नियन्त्रणके अभावमें ही वर्ग-सघर्ष, वर्ग विद्वेष, वर्ग-विध्वस एवं क्रान्ति आदिकी बात चलती है । जो दोष है, गुण नही हो सकता । इतिहास- में भली, बुरी सभी बाते होती हैं । सब न तो सिद्धान्त ही होती हैं, न ग्राह्य ही । भारतीय सभ्यतामें जो 'मात्स्य न्याय' कहा गया है, वही कम्युनिष्टोंका परम पुरुषार्थ एवं अभीष्ट वर्ग-सघर्ष है । यह पहले बतलाया जा चुका है कि कृतयुगमें जब कि सत्त्वगुणका पूर्णरूपसे विकास था, सभी धार्मिक, सात्त्विक थे । साथ ही विद्या, बल, शक्ति, वैभवका भी अभाव न था । ईश्वर, ब्रह्मा आदिमें सत्त्वकी प्रधानतासे ही विद्या, वैभव, विविध ऐश्वर्य होते हैं । इन्द्रादि देवताओंका ही नहीं, पर हिरण्यकशिपु, मय आदि दानवोका ऐश्वर्य भी जो वेदों-पुराणोंमें वर्णित है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि उसके मुकाबले आजका वैभव कुछ नहीं है । पूर्ण उत्कर्ष कालमे भी सत्त्व एवं धर्मकी जब प्रधानता हुई, तब धर्मनियन्त्रित