मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७४ मार्क्सवाद और रामराज्य बुझाकर राजी किया गया। तदनुसार ही धर्म, नीति, रिवाज गढ़े गये। स्त्रीकी स्वतन्त्रतासे धर्म और भगवान्के नाराज होनेका डर दिखलाया गया।' ठीक ही है, जड़वादी मार्क्ससे इसके सिवा और अधिककी आशा भी क्या की जा सकती थी ? जिसकी दृष्टिमे विश्वका कारण सर्वज्ञ ईश्वर ही नहीं जँचता, जो भूत-प्रेतकी कल्पनाको ही परिष्कृतरूपमें ईश्वर-कल्पना समझता है, जिसके अनुसार धर्म-कल्पना भीरु मस्तिष्कका फितूरमात्र है, वह सीता, सावित्री आदिके परम गम्भीर पातिव्रत-धर्मको कैसे समझ सकता था ? अनसूयाद्वारा ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रको पातिव्रतवलसे तीन महीनेके बालक बनाया जाना, सावित्रीका यमराजसे अपने मृत पतिको पुनः प्राप्त कर लेना, शाण्डिलीका सूर्यनारायणके उदयपर प्रतिबन्ध लगा देना आदि मार्क्सवादकी दृष्टिसे कोरी कल्पनाएँ ही ठहरेगी । आश्चर्य है कि परम सत्य आर्ष इतिहास मार्क्सवादियोकी दृष्टिमें झूठे हैं, परंतु निराधार बंदरसे मनुष्य उत्पन्न होनेका विकासवादी इतिहास सत्य है ! भारतमे अभी-अभी हालहीमे ५० वर्षोंके भीतर सैकड़ो सतियाँ हुई हैं। वे हँसती-हँसती चितापर अपने पतिके साथ परलोक चली गयीं । उत्तर- प्रदेश तथा राजस्थानमें तो कई सतियाँ बिना अग्निके ही अपने शरीरसे दिव्याग्नि प्रकट करके सती हुई हैं । चित्तौड़गढ़की पद्मिनी आदिके ऐतिहासिक सतीत्वसे कोई समझदार व्यक्ति आँख नहीं मूँद सकता । मार्क्सवादी सिवा अनर्गल प्रलापके इन बातोका क्या उत्तर दे सकते हैं ? स्पष्ट है कि जिन्हे धर्म, सभ्यता, संस्कृति, पातिव्रत मान्य है, ऐसे स्त्री-पुरुषोके लिये मार्क्सवाद धर्म एवं मानवताका शत्रु ही है । मार्क्सवादकी दृष्टिसे व्यक्तिगत सम्पत्ति तथा उत्तराधिकारका सम्बन्ध तो अब समाप्त हो गया; क्योकि मार्क्सवादी दृष्टिकोणसे भूमि एवं सम्पत्तिका उत्तराधिकार-नियम समाप्त करके सबका राष्ट्रियकरण या समाजीकरण होना ही उचित है। जब व्यक्तिगत सम्पत्ति तथा उत्तराधिकारकी प्रथा समाप्त हुई, तब फिर तदर्थ स्त्रीका एक पुरुषसे सम्बन्धवाला नियम क्यो रहेगा ? सम्बन्धित पतिके मरनेके बाद ही नहीं, अपितु एक साथ ही स्त्री यदि सैकड़ो पुरुषोसे सम्बन्ध रखे तो भी कोई आपत्ति नही। जैसे एक पानीभरी बाल्टीसे अनेक व्यक्ति प्यास बुझा सकते हैं, वैसे ही एक स्त्रीसे भी यदि असंख्य पुरुष प्यास बुझा लें तो भी कोई हर्ज नहीं है । लेनिनके शब्दोमें 'गदी नालीके जलसे प्यास बुझाना ठीक नहीं; किंतु जैसे स्वास्थ्यकर, तृप्तिकर स्वच्छ जलसे ही प्यास बुझाना उचित है, वैसे ही तृप्तिकर, स्वास्थ्यवर्द्धक स्त्री-पुरुष-सम्बन्धमें कोई भी हानि नहीं है। और अब तो गर्भपात करानेकी स्वाधीनता भी रूसमें मिल गयी है । 'पुरुष-समाजके हाथमे ही धर्म, नीति, रिवाज सब कुछ था,