मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 334, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंइसलिये पुरुषने स्त्रीको स्वाधीन बनानेका प्रयत्न किया, मार्क्सवादियोंका यह कथन भी दुरभिसन्धिपूर्ण है । मार्क्सवादी अधिकार पाकर जैसे दूसरोंको सदाके लिये कुचल देना चाहते हैं, महर्षियों तथा ईश्वरके सम्बन्धमे भी उनकी वैसी ही धारणा होती है । उनके मस्तिष्कमे अब्भक्ष, वायुभक्ष, परम निष्काम लोककल्याण-परायण महर्षियोंमें भी पक्षपात ही प्रतीत होता है । परंतु मार्क्सवादियोंकी यह धारणा सङ्गत नहीं है। धर्मबुद्धिसे शिष्य जैसे स्वेच्छापूर्वक गुरुका अनुसरण ( दास्य ) करनेमें लज्जित नहीं होता, पुत्र जैसे माता-पिताका दास्य करनेमे नहीं हिचकता, वैसे ही स्त्री भी अपने पति एव सास-ससुरका दास्य या सेवन एव अनुसरण करनेमें लज्जित नहीं होती । जबतक धर्मबुद्धि रहेगी, वहाँ यह भाव भी पहलेके समान ही जारी रहेगा । इसपर सम्पत्ति- विपत्तिका असर नहीं पड़ता है, बल्कि आपत्तिकालमें तो धीरज, धर्म, मित्र एव नारीकी विशेषरूपसे परीक्षा होती है- 'धीरज धर्म मित्र अरु नारी । आपद् काल परखिये चारी।' रामराज्य-जैसी धन सम्पदा, ऐश्वर्य-वैभवमें भी स्त्री-पुरुष अपने पूज्यो, गुरुजनोंके प्रति दास्यभाव ही रखते थे- 'दासवत् संनतार्याङ्घ्रि.' ( भागवत ७। ४। ३२) । प्रह्लाद गुरुजनोंके चरणोंमें सदा दासतुल्य विनत रहते थे । धन एव सम्पत्तिकी वृद्धि खलोंको ही घमंडी एव उद्दण्ड बनाती है, सत्पुरुषोंको नही । इसीलिये औद्योगिक समृद्धिके युगमे भी सन्नारियोंके शील- स्वभावमें कोई अन्तर नहीं पडा । प्राचीन कालमें भी असत् स्त्री-पुरुष होते ही थे, वे उस कालमे भी उद्दण्ड ही थे, कोई किसीके नियन्त्रणमें नही रहता था । वैयक्तिक सम्पत्ति एव नर-नारीके धर्ममूलक सम्बन्ध शाश्वतिक हैं । जडवाद एव नास्तिकताके प्रचारसे कुछ थोड़ा-बहुत ह्रास होना सम्भव है, फिर भी इनका मिट सकना सम्भव नहीं । पुरुषकी अपेक्षा भी नारी-जाति श्रद्धालु है । वह अपने पतिसे भिन्न पुरुषको भ्राता, पिता, पुत्रकी ही दृष्टिसे देखना उचित समझती है, धर्महीन मनमाने यौन सम्बन्धको वह पाप ही समझती है । वेदोंकी नीतिमें तो मुख्य विशेषता ही यह थी कि देशमे कोई स्वैरी पुरुष भी नहीं होता था, फिर स्वैरिणी स्त्रीका तो होना सम्भव ही कैसे था - 'न स्वैरी स्वैरिणी कुतः' ( छान्दो० ५ । ११ । ५) । स्त्री सर्वदा ही लज्जाशील होती है, वह कभी भी अभि- योक्त्री नहीं होती । वेश्या भी अभियुक्ता होनेमें ही सुखका अनुभव करती है । पुरुष ही स्वैरी होकर स्त्रीको स्वैरिणी बनाता है । जहाँ पुरुष स्वैरी न होगा, वहाँ स्त्री भी स्वैरिणी नहीं हो सकती । स्त्री पुरुषकी हृदयेश्वरी है, प्राणेश्वरी है, आत्मा है, सब कुछ है । उसके हिस्से एव अधिकारकी बात जडवादी नास्तिकोंके द्वारा ही उठायी जाती है । स्त्रीको पुरुषके बराबर बनानेका प्रयत्न करना उसका अपमान करना है, उसको हजारगुना नीचे उतारना है । शास्त्रोने पितासे सहस्रगुना अधिक माताका सम्मान करना बतलाया है - 'सहस्रं तु पितॄन्माता गौरवेणातिरिच्यते ।' ( मनु० २ । १४५ ) धार्मिक