मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 335, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंदृष्टिसे चतुर्थाश्रमी यति सर्ववन्द्य है। गृहस्थ पिता भी पुत्र सन्यासीका वन्दन करता है, परंतु उस सन्यासीको धर्मानुसार मातृवन्दन विहित है—'सर्ववन्द्येन यतिना प्रसूर्वन्द्या प्रयत्नतः।' (स्कं० पु० काशी० ११।५०) इस तरह माताको कुछ अधिकार प्रदान करना, क्या उसके सर्वाधिकारको सीमित करना नहीं है ? किसी भी उपासना एवं साधनामें शिष्यको जैसे अपनी आत्मा गुरुकी आत्मामे मिलानी पड़ती है, गुरुकी इच्छामें शिष्यको अपनी इच्छा विलीन कर देनी पड़ती है, वैसे ही पत्नीको अपनी आत्मा, अपनी इच्छा पतिकी आत्मा तथा इच्छामे मिलानी पड़ती है । पतिद्वारा किये हुए सत्कर्मों तथा आराधनाओमें पत्नीका भाग रहता है। पाश्चात्त्य राजतन्त्रने जडवादकी धुनमें ईश्वर एव धर्मसे नाता तोड़ लिया, फिर पूँजीपतियोने राजतन्त्रको भी समाप्त कर दिया। जहाँ ईश्वर एव धर्मका राजतन्त्रपर नियन्त्रण नहीं, वहाँ सामाजिक बन्धनोका ढीला पड़ना स्वाभाविक है । पाश्चात्त्य शिक्षाका प्रभाव भारतपर अवश्य ही पड़ रहा है। इतना ही क्यो, भारतकी परिस्थिति तो अन्य देशोकी अपेक्षा भी बदतर होती जा रही है। सर्वप्रथम औद्योगिक विकास जिस इंग्लैंडमे हुआ था, वहाँके सर्वप्रथम एव सर्वोत्कृष्ट नागरिक राज्य-सिंहासनाधीश तथा उसके परिवारके सिंहासन-सम्बन्धित व्यक्तियोके लिये अभी भी पर्याप्त धार्मिक नियन्त्रण अधिक है। उन्हे तलाक देने- वाले स्त्री-पुरुषके साथ शादी करनेकी मनाही है। तलाक दी हुई स्त्रीके साथ शादी करनेके लिये अष्टम एडवर्डको राजगद्दी छोड़नी पड़ी। वर्तमान रानीकी बहन कुमारी मार्गरेटको धार्मिक नियन्त्रणके कारण अपने प्रेमीसे शादीका निश्चय छोड़ना पडा । वहाँ 'बाइबिल'के अनुसार पति-पत्नीका सम्बन्ध-विच्छेद ईश्वरीय नियमके विरुद्ध एवं पाप कहा गया है । परंतु जडवादसे प्रभावित, समाजवाद- का अन्धानुकरण करनेवाली भारतसरकार तलाकका नियम बनाकर स्त्रियोको स्वाधीन करनेके नामपर उनका सर्वनाश कर रही है। घटना अवश्य समाजवादियो- के अनुसार घट रही है, परंतु यह घटना कॉलरा और प्लेगके समान अनिष्ट ही है, इष्ट नहीं । मार्क्सवादी-वर्णित स्त्रीसमाजकी दुर्दशाका मूल कारण धर्माविमुखता ही है, इसीसे बरक्कतमें भी कमी हुई। पहले घरमें एक व्यक्ति कमाता था, उससे घरभरका काम चलता था । आज पुरुष कमाता है, स्त्री कमाती है और बच्चे भी कमाते है, तब भी परिवारका पेट नहीं भरता। प्राचीन कालमें यथोचित वयमें कन्याओंका विवाह हो जाता था, स्त्रीको अनाथकी तरह भटकनेकी नौबत नहीं आती थी । अविवाहित दशामें प्रसवकालका, अनाथ-अवस्थाका उसेकोई अनुभव नहीं करना पड़ता था। मार्क्सवादी उत्तरोत्तर प्रगतिकी कल्पनाका स्वप्न देख रहे हैं, परंतु स्थिति यह दिखायी देती है, कि समाजका उत्तरोत्तर अधिक पतन होता जा रहा है। स्त्रीसमाजकी दीनदशा उत्तरोत्तर बढ रही है। स्वतन्त्रताके नामपर तलाक-प्रथाके विस्तार होनेका परिणाम भीषण होगा। अल्पवयस्क लडकी भले ही तलाक देकर