भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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स्वतन्त्रता, आत्मनिर्णयका अधिकार आदि मोहक नामोंसे स्त्रियोंको बरगला- कर अपना शिकार बनाना और उन्हें मजदूरी या वेश्यावृत्ति करनेके लिये निराश्रय एवं असहाय छोड़ देना उनके साथ घोर अन्याय करना है । पुरुष जब सहर्ष अपनी कमाई स्त्रियोंको खर्च करनेके लिये समर्पण करता है, तब उन्हें भी कमानेके काममें लगानेका अर्थ ही क्या है ? इसके अतिरिक्त गृहका कार्य भी कुछ कम नहीं है । यदि गृहिणी सुप्रबन्ध करनेवाली गृहलक्ष्मी न हो तो पुरुषके लाखो कमानेपर भी घरमें बरकत नहीं होती । मानव-जीवन और गृहको सरस एव माङ्गलिक बनानेवाली स्त्रीके सिरपर कमानेका भार न होना ही अच्छा है । स्त्री- द्वारा उत्पादित रामचन्द्र, हरिश्चन्द्र, प्रह्लाद, ध्रुव, शिवि, दिलीप, भगीरथ-जैसी एक भी सतान समष्टि व्यष्टि जगत्‌के लोक-परलोकका जीवन माङ्गलिक एव समुन्नत बना सकती है । उपयोगितावादी स्मिथ तो धर्म, संस्कृति, प्रेम, सौन्दर्य, कला, क्षमा, दया, त्याग आदि सभी उदात्त गुणोंमें उपयोगिता ही ढूँढता है । लोक- कल्याणार्थ अपने प्राणतकको बलिदान कर देनेमें स्मिथको कुछ भी उपयोगिता नहीं दिखायी दे सकती, परन्तु क्या इतनेसे ही यह त्याग व्यर्थ कहा जा सकता है ? ससारमें उपयोगिता ही सब कुछ नहीं है । माता, भगिनी, पुत्री, पत्नी- का महत्त्व उपयोगिताकी कसौटीपर नहीं परखा जा सकता । वर्गवाद मार्क्सके मतसे 'भारतमें औद्योगिक विकाससे होनेवाला परिवर्तन यूरोपके प्रभावसे देरमें आरम्भ हुआ बल्कि अभी शनैः-शनैः हो रहा है और पूरे रूपमें हो भी नही पाया, स्त्रियोंकी अवस्थामें भी परिवर्तन अभीतक यहाँ नहीं हो पाया है । जन- साधारण या जमींदार-श्रेणी और पूँजीपति-श्रेणीकी स्त्रियाँ इस देशमें अभीतक उसी अवस्थामें हैं, परन्तु मध्यम श्रेणीकी स्त्रियोंकी अवस्थामें - जिनपर आर्थिक परिवर्तनका प्रभाव गहरा पड़ा है, परिवर्तन तेजीसे आ रहा है । 'यूरोपमें जहाँ पूँजीवाद पूर्ण उन्नति कर चुकनेके बाद ठोकरें खाने लगा है, स्त्रियोंकी अवस्था पुरुषोंकी अपेक्षा जीवन-निर्वाहके सङ्घर्षमें कम योग्य होनेके कारण पुरुषोंसे भी गयी-बीती है । बेकारी और जीवन-निर्वाहकी तंगीके कारण लोग व्याह- कर परिवार पालनेके झगड़ेमें नहीं फँसना चाहते, इसलिये स्त्रियोंके लिये घर बैठकर बच्चे पालने और निर्वाहके लिये रोटी-कपड़ा पाते रहनेका भी मौका गया । अब उन्हे भी मिलो, कारखानों, खानो, खेतों और दफ्तरोंमें मजदूरी कर पेट पालना पड़ता है । यदि उनका विवाह हो जाता है तो माता बननेका उनका काम ज्यो- त्यों निभ जाता है और वे फिर मजदूरी करने चल देती हैं । यदि विवाह नहीं हुआ और शरीरकी स्वाभाविक प्रवृत्तिके कारण वे माता बन गयीं तो उनकी मुसीबत है । प्रसवकी अवस्थामें उनके निर्वाहका सवाल बहुत कठिन हो जाता है और प्रसवकालमें ही उन्हे सहायताकी अधिक आवश्यकता रहती है । प्रसवकालमें यदि