मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८० मार्क्सवाद और रामराज्य वे कामपर नहीं जा सकतीं तो उनकी जीविका छूट जाती है और प्रसवकालके बाद जब उन्हें एकके बजाय दो जीवोकी जरूरतोको पूरा करना पड़ता है, तो वे बिना साधनके हो जाती हैं। इससे समाजमें उत्पन्न होनेवाली संतानके पोषण और अवस्था- पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह समझ लेना कठिन नहीं । 'स्त्रियोंकी इस अवस्थाके कारण देशकी जनताके स्वास्थ्यपर जो बुरा प्रभाव पड़ता है, उसके कारण अनेक पूँजीवादी सरकारने स्त्रियोंकी रक्षाके लिये मजदूरी- सम्बन्धी कुछ नियम बनाये हैं। जिनके अनुसार मिल-मालिकोको प्रसवके समय स्त्रियोंको बिना काम किये कुछ तनख्वाह देनी पड़ती है और बच्चा होनेपर मिलमें काम करते समय माँको बच्चेको दूध आदि पिलानेकी सुविधा भी देनी पड़ती है। इन कानूनी अड़चनोंसे बचनेके लिये मिलें प्रायः विवाहित स्त्रियोंको और खासकर बच्चेवाली स्त्रियोंको मिलमे नौकरी देना पसंद नहीं करतीं। यूरोपमें अस्सी या नब्बे प्रतिशत लड़कियाँ विवाहसे पहले किसी-न-किसी प्रकारकी मजदूरी या नौकरी कर अपना निर्वाह करती हैं या अपने परिवारको सहायता देती हैं, परंतु विवाह हो जानेपर उन्हें जीविका कमानेकी सुविधा नहीं रहती। इन कारणोंसे स्त्रियाँ विवाह न करने या विवाह करनेपर भी गर्भ हटा देनेके लिये मजबूर होती हैं। जीविकाका कोई उपाय न मिलनेपर उन्हे अपने शरीरको पुरुषोके क्षणिक आनन्दके लिये बेचकर अपना पेट भरनेके लिये मजबूर होना पडता है। 'वैयक्तिक सम्पत्तिके आधारपर कायम पूँजीवादी-समाजमें स्त्री व्यक्तिकी सम्पत्ति और मिल्कियतका केन्द्र होनेके कारण या तो पुरुषके आधिपत्यमें रहकर उसके वंशको चलाने, उसके उपयोग-भोगमें आनेकी वस्तु रहेगी या फिर आर्थिक संकट और बेकारीके शिकंजोंमें निचोड़े जाते हुए समाजके तंग होते हुए दायरेसे, अपनी शारीरिक निर्बलताके कारण—जिस गुणके कारण वह समाजको उत्पन्न कर सकती है, समाजमें जीविकाका स्थान न पाकर केवल पुरुषके शिकारकी वस्तु बनती जायगी। पर यह अवस्था है साधनहीन गरीब और मध्यम श्रेणीकी स्त्रियोंकी । साधन-सम्पन्न और अमीर श्रेणीकी स्त्रियाँ यद्यपि भूख और गरीबीसे तड़पती नहीं, परंतु उनके जीवनमे भी आत्मनिर्णय और विकासका द्वार बंद रहता है।' मार्क्सके अनुसार 'समाजमें स्त्रियोंका समान अधिकार होनेके लिये उन्हे भी समाजमें पैदावारके कार्यमें सहयोग देनेका अवसर मिलना चाहिये ।' मार्क्सवाद इस बातको स्वीकार करता है कि 'समाजमें संतान उत्पन्न करना न केवल स्त्रीके बल्कि सम्पूर्ण समाजके सभी कामोंमें महत्त्वपूर्ण काम है; क्योकि मनुष्य-समाजका अस्तित्व इसीपर निर्भर करता है। इस महत्त्वपूर्ण कार्यके ठीक रूपसे होनेके लिये अनुकूल परिस्थितियाँ होनी चाहिये। स्त्रीको संतानोत्पत्ति मजबूर होकर या दूसरेके भोगका साधन बनकर न करनी पड़े, बल्कि वह अपने आपको समाजका एक स्वतन्त्र अङ्ग-