मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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तभी स्वेच्छाधीन भला या बुरा काम करनेवाला मनुष्य निग्रह या अनुग्रहका भागी होता है। बिन्दुकी पृथ्वीपर गिरनेकी इच्छा तो काल्पनिक ही है, क्योंकि इच्छा चेतनका धर्म है, अचेतनका नहीं। फिर भी 'नद्याः कूलं पिपतिषति' (नदीका कगार गिरना चाहता है), इस प्रकारकी इच्छाएँ वस्तुतः काल्पनिक हैं। आसन्न- पतनता देखकर ऐसा व्यवहार किया जाता है। मातृस्तन पीनेकी इच्छा तो चेतनकी इच्छा है, वह क्षुधासे भी होती है। फिर भी इष्टसाधनता-ज्ञानसे ही इच्छा मुख्य है। रोगमुक्त होनेके लिये भी एक तो स्वेच्छासे ओषधि खायी जाती है, दूसरे अभिभावकोंद्वारा बाध्य किये जानेपर भी ओषधि खायी जाती है। इसी प्रकार जीवन-धारण करनेके लिये श्वास लेनेकी भी बात है। वस्तुतः प्रयोजनकी स्वीकृति ही स्वतन्त्रता है। इस परिभाषासे 'स्वतन्त्रः कर्त्ता' यह पाणिनीकी परिभाषा ही श्रेष्ठ है, जिसका आशय है 'क्रियामें स्वतन्त्ररूपसे विवक्षित अर्थ ही कर्त्ता होता है।' स्वेतर समस्त कारकोंका प्रयोजक होकर स्वयं किसीसे प्रयुक्त न होना ही स्वतन्त्रता है। व्यवहारमें भी जितने विधि-निषेध होते हैं, सभी स्वतन्त्रके ही होते हैं। जिसके हाथ-पैर हथकड़ी-बेड़ीसे जकड़े हो, ऐसे परतन्त्र व्यक्तिको जल लाने या दौड़नेको कौन आदेश दे सकता है? यों कोई भी बुरा काम करता है तो परिस्थितियोसे बाध्य होकर ही करना पड़ता है। काम, क्रोध, लोभ—सभी परिस्थितियोंके अनुसार ही होते हैं। चोरी कोई तभी करता है, जब वह परिस्थितियों- से उसके लिये बाध्य हो। तो भी क्या समाजसे चोरी करनेको अपराध मानना बंद हो जाना चाहिये? संसारमें सभी कार्य कामना या इच्छापूर्वक ही होते हैं। इच्छामें भी जब प्राणी सदा परतन्त्र ही है, तब तो फिर किसी बुरे कामसे हटनेका उपदेश या प्रयत्न व्यर्थ ही होगे। इसी तरह किसी अच्छे काममें प्रवृत्त होनेका उपदेश और प्रयत्न भी व्यर्थ है। अतः सुस्पष्ट है कि परिस्थितियोंसे सम्बन्ध होते हुए भी इच्छाके अनुसार होनेवाले कार्योंको स्वाधीनतापूर्वक कर्म कहा जाता है। तभी शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार प्राणीको निग्रह एव अनुग्रहका भागी होना पड़ता है। अन्यथा यह तो कोई भी अपराधी कह सकता है कि 'अमुक परिस्थितियोने ही हमसे यह काम कराया है, अतः दण्ड उन परिस्थितियोंको मिलना चाहिये या परिस्थिति उत्पन्न करनेवालेको मिलना चाहिये।' परिस्थिति उत्पन्न करनेवाले भी यही कह सकते हैं कि 'हमने भी परिस्थितिवश ही ऐसा किया है।' मार्क्सवादी कहते हैं कि 'श्रेणी विभाजन समाजमें जितना ही सुदृढ होता गया, शासक-श्रेणी उतनी ही उत्पादनशक्तियोंसे दूर हटती गयी। कृषिकार्यका भार, कारखाना चलानेका भार होता है गुलामोके ऊपर, मजदूरोंके ऊपर। पूँजीपति सोच-विचारकर समाजव्यवस्थाके नीतिविधानकी रचनामात्र करते हैं, वस्तुजगत्का उनसे कोई सम्पर्क नहीं। हाथ-पैरसे काम करनेके लिये हैं मजदूर, मिस्त्री या इंजीनियर; लाभकारी आविष्कारके लिये हैं वैज्ञानिक। यहाँतक कि पूँजीपतिको