भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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देखभालकी आवश्यकता नहीं। ईरानमें तेलकी खानें चलती हैं और लाखों मील दूर बैठकर पूँजीपति मुनाफा कमाता है। धनिक वस्तुजगत्के जिस अंशका भोग करता है, वहाँ वह देखता है कि वही कर्त्ता है, वह स्वाधीन और सर्वसर्वा है और उसीकी आज्ञासे सब चलता है। इसलिये आधुनिक संस्कृति और दर्शनमें इच्छा-स्वाधीनताका दावा सहज ही मजूर हो जाता है। "वर्तमान आदर्शवादी दार्शनिक इच्छा स्वतन्त्रताके दावेके प्रमाणके लिये आधुनिक विज्ञानकी शरण लेते हैं। आइसनवर्गके—'प्रिंसिपुल आफ मिनेसी' में उनको एक सहारा मिलता है। संक्षेपमें इसका सिद्धान्त यह है कि 'कोई इलेक्ट्रन दूसरे मुहूर्त्तमें क्या करेगा, यह निश्चित नहीं है। इलेक्ट्रन एक कक्षसे दूसरे कक्षको कूद रहा है, लेकिन कौन इलेक्ट्रन कूदेगा, इसका निश्चय नहीं।' जेम्स, एलिंगटन, श्रोडिंगगेर इसीकी इच्छा स्वतन्त्रताके प्रमाणके रूपमें सादर अभ्यर्थना करते हैं। यहाँपर दो बातें जान लेनेकी हैं; एक यह कि किसी एक इलेक्ट्रनकी गतिविधिका लक्ष्य करनेके लिये उसके ऊपर जो आलोक पार किया जाता है, उसीसे उसका स्थान परिवर्तन हो जाता है। दूसरी बात यह है कि मोरके 'करमपाण्डेंस प्रिंसिपुल' के अनुसार परमाणुओंके संख्याधिक्यसे उनकी गतिकी निश्चयता बढ़ जाती है। इस प्रकार आधुनिक विज्ञान भी कारणविहीन स्वतन्त्रता- का अन्त कर देता है।" परंतु यह बात भी ठीक नहीं है । इच्छा-स्वतन्त्रताका प्रश्न केवल पूँजीपतियोंसे ही नहीं है, क्योंकि इच्छा और तदनुसार विविध चेष्टाओंका प्रश्न तो सभीके साथ रहता है, भेद होता है, इच्छापूर्तिमें। जिनके पास पर्याप्त साधन हैं, उनकी इच्छाओंकी पूर्ति होती है, जिनके पास साधन नहीं हैं, उनकी इच्छापूर्तिमें बड़ी कठिनाई पड़ती है। जबतक पूँजीपतियोंके पास साधन है, उनकी इच्छापूर्तिमें सरलता रहेगी। जब मजदूरोंके हाथमें साधन हो जायेंगे, तब फिर उनकी इच्छा- पूर्तिमें सरलता हो जायगी, यद्यपि साधनोंके मिलनेके साथ साथ इच्छाएँ भी बढ़ती जाती हैं। शास्त्रकारोंका तो कहना है कि संसारमें विवेक-वैराग्यके बिना भोगप्राप्तिसे कभी कामनाओ और इच्छाओकी पूर्ति नहीं हो सकती । जैसे घीकी आहुतिसे अग्निज्वाला बढ़ती है, वैसे ही भोगप्राप्तिसे इच्छाएँ बढ़ती हैं—'न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मव भूय एवाभिवर्द्धते ॥' (विष्णुपुराण १० । १० । २३) यहाँतक कि संसारभरकी सम्पूर्ण धन-धान्य, हिरण्य आदि सम्पत्तियाँ मिल जायें, तब भी एक पुरुषकी भी तृप्ति सम्भव नहीं— 'यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रिय । सर्वं नैकस्य पर्याप्त इति मत्वा शमं व्रजेत् ॥' (लिङ्गपुराण पूर्व० ६७ । १८ ) । संसारकी सभी स्वतन्त्रताएँ तो सीमित ही हैं। अविद्या-काम-कर्मके परतन्त्र प्राणीमें स्वतन्त्रताकी भी एक सीमा होती है, पूर्ण स्वतन्त्रता तो निरूपाधिक स्वप्रकाश आत्मामें ही है। जिनमें 'जायते,