भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 353

५९४ मार्क्सवाद और रामराज्य से वह देखेगा कि सूर्यके ऊपर पृथिवीकी छाया पड़ी है। जिस घटनाका यह अवलोकन किया जा रहा है, वह न भूल है और न मायादृष्टिकेन्द्र (फ्रेम-आफ- रिफरेन्स) की विभिन्नताके कारण एक ही घटना दो प्रकारसे दीख रही है। यहाँ भी वैज्ञानिक ज्ञानकी आपेक्षिकता प्रमाणित हो रही है। सत्य आपेक्षिक है सही, लेकिन इस आपेक्षिकताको अति तक पहुँचाया जा सकता है और तब यह हास्यास्पद बन जाता है। इसी प्रकारकी आपेक्षिकताकी आड़ लेकर वर्तमान पूँजीवादी भविष्यके एक वैज्ञानिक चित्रको देखनेसे मुँह मोड़ता है। सत्यकी परिभाषा करते हुए लेनिनने लिखा है कि यह दृश्यगत घटनाके सब पहलुओंका जोड है, उनकी वास्तविकता है, पारस्परिक निर्भरता है।'" अध्यात्मवादी इसे अनुक्तोपालम्भ कहते हैं। यह रामराज्यवादीका कभी भी मत नहीं है। विज्ञानके लिये शिक्षा अपेक्षित नहीं है। अवश्य ही शिक्षा, विचार, कर्म और पारिपार्श्विक यन्त्र आदि ज्ञान-विज्ञानमें सहायक होते हैं। इन सामग्रियोंसे एक ज्ञानशक्तिसम्पन्न चेतनको ही ज्ञान-विज्ञान उत्पन्न होते हैं। इन सब सामग्रियोंके रहनेपर भी किसी काष्ठ, पाषाणको ज्ञान-विज्ञान नहीं सम्पन्न होता । काष्ठमें अग्नि है, तिलमें तैल है—वह प्रयत्नसे प्रकट होता है। इसी तरह चेतन प्राणीमें ज्ञानशक्ति है, वही प्रयत्नसे व्यक्त होती है। इसमे पूर्वके संस्कार भी हेतु होते हैं। आद्य शंकराचार्य आठ ही वर्षकी अवस्थामें सर्वशास्त्रोके विद्वान् हो गये थे, परंतु सबमें यह क्षमता नहीं। ध्रुवको ईश्वरके विशेष अनुग्रहसे सम्पूर्ण ज्ञान हो गया था। गीताके कृष्ण तो स्वीकार करते हैं कि भगवान् आराधनाओंसे संतुष्ट होकर प्राणीको वह ज्ञानयोग प्रदान करते हैं, जिससे वह भगवान्‌को प्राप्त कर लेता है— ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते । (गीता १०।१०) बहुत प्रकारके ज्ञान पशु-पक्षियोको भी होता ही है, हसका क्षीरनीर- विवेक, मधुमक्खियोद्वारा मधुका निर्माण, भेड़ियों, बाजो तथा बिल्ली आदिद्वारा शिकारकी दक्षता आदि गुण बिना शिक्षाके भी हो जाते हैं। पक्षियोंमें उड़नेकी कला, मछलियोंमें तैरनेकी कला जन्मजात ही होती है; फिर वैज्ञानिकोंका घमण्ड क्या अर्थ रखता है ? भूतजगत्का परिवर्तन तो परिणामवादी, आरम्भवादी सभी मानते हैं; परंतु उनके भी कुछ नियम हैं ही। वैज्ञानिकोको भी कुछ नियम निश्चित करने पडते हैं। मार्क्सवादियोको भी आखिर निर्वाण एवं निर्माणका नियम तथा परिवर्तनशील होनेका नियम, क्रम-परिवर्तन और क्रान्तिकारी परिवर्तन आदिके कुछ-न-कुछ नियम मानने ही पडते हैं। द्वन्द्वात्मक रीतिसे बनने-बिगड़नेका भी आखिर नियम हुआ ही। जैसे कूपमण्डूक या उदुम्बरफलके बीचमें रहनेवाला नगण्य जन्तु अपनी जानकारीको ही बहुत मानता है, उसी तरह मार्क्सवादी अपनेको सर्वज्ञ होनेका घमण्ड करते है। पर वस्तुस्थिति यह है कि हर बातमें वैज्ञानिककी भी खोपड़ीपर अज्ञान ही सवार रहता है। समझदार वैज्ञानिक नत-