भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 354, कुल 866 में से

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पृष्ठ 354

मस्तक होकर यही कहता है कि 'आजका सबसे बडा ज्ञान यही है कि अभी हमलोग कुछ भी नहीं जानते ।' फिर विज्ञान या वैज्ञानिकको यह अधिकार कहाँसे प्राप्त हुआ कि वह अन्तिम सत्य ज्ञानकी खोजको मना करे ? अल्पज्ञान ( अधूराज्ञान ) और सम्यक् ज्ञानका भेद स्पष्ट प्रतीत हो तो किसी भी सम्बन्धमें तत्त्वज्ञानकी रुचि स्वाभाविक है । सिवा अल्पज्ञके आज भी कौन दावा कर सकता है कि हम सभी भूत-जगत्को जानते हैं ? ० वैज्ञानिक हो चाहे और कोई, वह सत्यको बनाता नहीं; किंतु सत्यकी जान- कारी प्राप्त करता है । यथाभूत वस्तु ही सत्य कहलाती है, उसको अयथाभूत जानना भ्रान्ति है । एक अल्पायु अज्ञ प्राणी अपने परिमित साधनोंसे, निःसीम संसारमेंसे बहुत-सी वस्तुओंको बहुत अंशमें जानता है, उन्हींको नयी नयी वस्तु, नये-नये तथ्यके रूपमें जानता-समझता है । परंतु एतावता दीर्घायु, दीर्घतपा, दीर्घ- दर्शियोंकी ऋतम्भरा प्रज्ञाद्वारा होनेवाले परमार्थ सत्यज्ञानका अपलाप नहीं किया जा सकता । भौगोलिक उथल-पुथलका परिज्ञान भी उन महातपस्वियोंको था ही । [L1

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