मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रातिभासिक सत्य होते हैं। आकाशादि व्यवहारकालमें अबाधित होनेसे व्यावहारिक सत्य हैं। सर्वाधिष्ठान; अखण्डबोधस्वरूप सर्वसाक्षी अत्यन्ताबाध्य होनेसे वही परमार्थ सत्य है। "प्रेग्मेटिज्मके जन्मदाता विलियम जेम्सका कहना है कि जिसकी व्यावहारिक उपयोगिता है, वही सत्य है। सत्य हमारे विचारोंमें प्रतिबिम्बित वास्तविकताका रूप नहीं है, बल्कि जो व्यक्तिविशेषकी भावनाओ और आवश्यकताओके साथ खप जाता है। शीलरका मत भी इसी प्रकार है। सामाजिक मनुष्य वास्तवभूतकी विचार-क्रियासे सत्यपर उपनीत नहीं होता, बल्कि मनुष्य ही सत्यकी सृष्टि करता है। पिलैंडेलोके नाटक 'तुम सही हो, यदि तुम अपनेको ठीक समझते हो' में इस दर्शनवादका सुन्दर चित्र मिलता है। तुमको हाँ या ना करनेके लिये दस्तावेज- का प्रमाण चाहिये। मेरे लिये इनकी कोई आवश्यकता नहीं; क्योंकि मेरी रायमें इन दस्तावेजोंमें सत्यका निवास नहीं, बल्कि उन व्यक्तियोके मनमें है, जिनके अन्दर सिवा उन्होंके दिये हुए प्रमाणसे हम प्रवेश नहीं कर सकते। डीवीके शब्दोमे 'हमारे लिये सत्य वही है, जिससे हमको सहायता मिलती है और जिसका हमारे ऊपर प्रभाव है।' प्रयोजनवादका सारतत्त्व यही है कि व्यावहारिकता ही हमारे लिये सब कुछ है। इससे अधिक हम कुछ नहीं जान सकते। यह दर्शन साम्राज्यवादकी अवनतिका द्योतक है।" मार्क्सवादियोका यह कहना कि 'अन्य दर्शन मायाविमूढकी तरह हमें पथ- भ्रष्ट करते हैं, मार्क्सयदर्शन जीवनपथ निर्देश करता है' अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना है। जैसे किसी आंशिक दृष्टिकोणसे मार्क्सयदर्शन दर्शन कहला सकता है, वैसे ही अन्य पाश्चात्त्य-दर्शन भी भारतीयदर्शनोंकी दृष्टिसे तो यह-सब 'दर्शन' कहलानेके योग्य ही नहीं हैं। समुचित प्रमाण, प्रमेय, फल तथा साधनोका निरूपण पूर्णरूपसे किसी पाश्चात्त्य दर्शनमे नहीं है। छायावादी ढंगके वाक्योंसे केवल आपेक्षिक एकाङ्गी दृष्टिकोणसे ही सिद्धान्तोका निरूपण किया जाता है। इस दृष्टिसे उपर्युक्त दृष्टिकोण ठीक नहीं है। हजार अन्य सत्य भले ही हो, परंतु प्रयोजनवादी- के लिये अगर वे उपयोगी नहीं तो प्रयोजनवादी दृष्टिकोणसे व्यर्थ ही हैं। शीलरका सत्य भी इसी दृष्टिका है। अपनी सच्चाई-झुठाई प्राणी जितना अपने आप जान सकता है उतना दूसरा नहीं समझ सकता। इस दृष्टिसे 'तुम सही हो यदि तुम अपने आपको ठीक समझते हो,' कितनी सुन्दर बात है। दर्शन साम्राज्यकी अवनतिका जीता-जागता नमूना तो है, मार्क्सका जडवादी दर्शन, जिसमें 'धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा' के बदले 'अर्थो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा' के सिद्धान्तको भी सिद्धान्तनामसे पुकारा जाता है। आमतौरपर वादि-प्रतिवादि-सम्भव प्रमाणो, तर्कों, सिद्धान्तोंके आधारपर ही विप्रतिपन्न विषयोंकी सिद्धि की जाती है। परंतु मार्क्सवादी किन्हीं भी सिद्धान्तो-