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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 356, कुल 866 में से

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पृष्ठ 356

तथ्यो, न्यायोँको स्थिर नहीं मानते । कारण, उन कसौटियोँपर वे एक क्षण भी नहीं टिक सकते । अतः उनके पास यह कहनेके सिवा कि 'परमात्मा, ईश्वर, धर्मके अतिरिक्त मार्क्सवादी स्थिर आत्माका भी अस्तित्व नहीं मानता', कोई दूसरा चारा नहीं । भला इसे दर्शन भी कैसे कहा जा सकता है ? मार्क्सवादी स्वयं ही कहते हैं—'जो दार्शनिक जिस परिस्थितिमें रहता है, उसी ढगका उसका दर्शन होता है', एतावता सिद्ध है कि उस दर्शनपर उस दार्शनिकके दिमागी फितूरके अतिरिक्त सत्यका अश कुछ भी नही रहता । कांटका ज्ञान-सिद्धान्त “काट इससे सहमत है कि हमारा ज्ञान अनुभवसे आरम्भ होता है और इस अनुभवकी प्रारम्भिक बात है—बाहरी वस्तुओका अस्तित्व । वह केवल इस बातसे इनकार करता है कि यहीं इसका अन्त होता है; क्योंकि हमें ऐसी चीजोँका ज्ञान है जो अनुभवसे परे हैं । वह इसको मान लेता है कि शेषोक्त प्रकारका ज्ञान पूर्वोक्त प्रकारके ज्ञानका अनुमान कर लेता है । क्योंकि यह कैसे सम्भव है कि पहचान ( ज्ञान ) की शक्तिका उद्वोध न हो सिवा उन वस्तुओँके सयोगसे, जिनका प्रभाव हमारी इन्द्रियोँपर पड़ता है और जो स्वयं अपने प्रतिबिम्ब उत्पन्न करती हैं और अशतः हमारी बुद्धिको जाग्रत् करती हैं, ताकि वह इन प्रतिबिम्बोँकी तुलना कर सके, इनको जोड़ सके तथा अलग-अलग कर सके और इस प्रकार हमारे इन्द्रिय लब्ध चित्रोंके सच्चे मालको वस्तुओके ज्ञानके रूपमें परिणत करता है और जिसको हम अनुभवका नाम देते हैं । इसलिये समयके ख्यालसे हमारा कोई ज्ञान अनुभवसे पहले नहीं है बल्कि इसके साथ ही आरम्भ होता है । “वह आगे चलकर कहता है कि 'ज्ञानका एक और अङ्ग है । यद्यपि हमारा ज्ञान अनुभवसे आरम्भ होता है, इसका यह अर्थ नहीं कि अनुभवसे ही सब ज्ञ नकी उत्पत्ति होती है । क्योकि इसके विपरीत यह बहुत सम्भव है कि जो कुछ हमको इन्द्रिय-सयोगसे प्राप्त होता है और जो कुछ हमारी पहचानकी शक्ति स्वयं, अपना अंश मिलाती है, इन दोनोके मिश्रणसे ही हमारा व्यावहारिक ज्ञान बनता है । लेकिन मुद्दतकी आदतसे ही हमारे अन्दर वह कौशल और एकाग्रता आती है, जिससे हम इन दोनोंको पृथक् करनेमें समर्थ होते हैं । काटके पहलेके दार्शनिक दो मुख्य दलोमें बँटे हुए थे, एक भौतिकवादी जो इन्द्रियानुभव तथा उसके ऊपर सोच विचारके दूसरे रास्तेद्वारा बाहरी दुनियाँसे एक ज्ञानकी उत्पत्ति बताते थे और दूसरे आदर्शवादी, जो कहते थे कि मानसमें ऐसे विचार हैं, जिनका कारण नहीं बताया जा सकता । ऐसे विचार जिनकी सार्व- भौमिकता और अमूर्तरूप यह निर्देश करता है कि ये स्वयं प्राप्त हैं और सब अनुभवके मूलमें हैं ।

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