मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें"कांटकी ऐतिहासिक स्थिति यह है कि, दोनो दृष्टिकोणोंके समन्वयके द्वारा उसने इस विरोधका अन्त किया । और उसका यह दावा था कि इस नये दृष्टि- कोणमें उसने इन दोनोंका सम्मेलन एक ऊँचे स्तरपर कराया है। उसने यह मान लिया कि स्थान, काल, कारण इत्यादि अमूर्त कल्पनाओको केवल अनुभवमें रूपान्तरित नहीं किया जा सकता, दूसरी ओर यद्यपि ये स्वयं प्राप्त हैं। यह कल्पना नहीं की जा सकती कि ये बिल्कुल ही अनुभवपर निर्भर नहीं हैं। उसका दावा था कि वास्तविकता यह है कि सब अनुभवके मूलमें पूर्व परि- स्थितिके रूपमे ये विद्यमान हैं और इस तरह ये अनुभवके रूपोंका निर्णय करते हैं। "उसने यह दलील दी कि बाहरी वस्तु और दूसरी मानव बुद्धि—ये ज्ञान- के दो उद्गम नहीं हैं—ज्ञानका एक ही उद्गम है—वह है कर्ता और कर्म (बुद्धि- युक्त मनुष्य और वस्तु) का सम्मेलन । जैसे जलका कारण अम्लजन और उद्- जनका सम्मेलन है। यहाँ यह नहीं कहा जा सकता कि जलके दो कारण हैं, किंतु दोनोका सम्मेलनरूप एक ही कारण है । उसी तरह प्रकृतमें भी समझना चाहिये । कर्ता और कर्मका सम्मेलन ही जलका कारण है । सारा ससार हमारे लिये दृश्यमान घटनाओंकी एक परम्परा है । क्या ये दृश्य मानसकी उपज हैं, जिसके सामने ये दर्शित होते हैं या कि ये वस्तुओके विशुद्ध प्रतिनिधि हैं ? आदर्शवाद या वस्तुवाद—दोनोमेसे कोई नहीं और दोनो मानव और वस्तु सयुक्त होकर दृश्य या प्रत्यक्षीकरणको उत्पन्न करते हैं। अत्यक्षीकरण दोनोके सम्मेलनका ही फल है।" 'अनुभवसे ज्ञानका आरम्भ होता है', इत्यादि काटका कथन इन्द्रिय-व्यापार व्यादिके अभिप्रायसे सङ्गत होता है। इन्द्रिय, मन, अहंकार एवं बुद्धिके व्यापारो- को ही अनुभव, सकल्प आदि अनेक नाम दिये गये हैं। वस्तुतः ये सभी जड हैं। जडोमे जब अपने ही प्रकाशकी शक्ति नहीं है, तब उनसे विषय-प्रकाशकी कल्पना सर्वथा निरर्थक है। मन या अन्तःकरणकी वृत्ति भी ज्ञानपदसे कही जाती है, परंतु यह सब कथन औपचारिक ही है । इन्ही जड व्यापारोकी उत्पत्ति और नाश कहा जा सकता है । सर्वप्रकाशक बोधका न प्रागभाव सिद्ध होगा और न तो प्रध्वंसाभाव ही। वस्तुओके संयोगसे इन्द्रियोंपर प्रभाव पड़ता है और विषय- रूपी वस्तुओका प्रतिबिम्ब भी वृत्तिमें उत्पन्न हो बुद्धिके जागरणमें भी वस्तुओंका उपयोग होता है। फिर भी इनके द्वारा नित्य-बोधकी अभिव्यक्ति ही होती है, उत्पत्ति नहीं। जैसे काष्ठोंके संघर्षसे दाहकत्व-प्रकाशकत्वविशिष्ट अग्निका प्राकट्य होता है, ठडे-गरम तारोके योगसे विद्युत्प्रकाशका प्राकट्य होता है, किंवा सूर्य- कान्तमणिके योगसे व्यापक सौरालोकका अग्निके रूपमें प्राकट्य होता है, स्वच्छ काच आदिके योगसे सौरालोक चमत्कृत होता है, उसी तरह वृत्तियोंके योगसे व्यापक अखण्ड बोध चमत्कृत होता है। इस तरह अनुभव और ज्ञानका भिन्न-