मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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इसी तरह लाखो वर्षोंकी वृत्तियोंसे भी जो ज्ञान सम्पन्न नहीं होता, वह ज्ञान शान्त-समाहित, योग-शक्तिसम्पन्न मनसे हो जाता है । जैसे बुद्धिनिर्मित दूर- वीक्षण या सूक्ष्मवीक्षणसे दूर-सूक्ष्म वस्तुओंका ज्ञान हो सकता है, वैसे ही योग- जन्यशक्तिविशिष्ट मनसे बाह्य प्रयोगके बिना भी अनेक वस्तुओ, उनके गुणो एव सिद्धान्तोंका ज्ञान हो जाता है । 'जहाँ सूर्यकी किरणे नहीं पहुँचतीं वहाँ इन्द्रियोकी गति नही और जहाँ इन्द्रियोकी गति नही, उसे हम जान नहीं सकते'— यह कथन योगज-ज्ञानविहीन व्यक्तियोके लिये ही ठीक है । यह भी रूपवान् वस्तुके ही सम्बन्धमें कहा गया है । शब्द और स्पर्शके सम्बन्धमें सूर्यकिरणे प्रकाश नहीं फैला सकतीं; फिर भी श्रोत्रत्वके द्वारा उनका ज्ञान होता ही है । प्रकृति-परमाणु आदिका ज्ञान अनुमानसे होता है। इन्द्रियो, मन एव बुद्धिमें सूर्यकी किरणे नहीं पहुँचतीं; फिर भी उनका ज्ञान साक्षीसे होता ही है। रेडियो, टेलीविजनद्वारा इस समय अतिदूरस्थ शब्द एवं रूपका अनुभव किया ही जा रहा है। यह सामान्य इन्द्रियगतिसे भिन्न ही यान्त्रिक शक्तिका चमत्कार है । इसी तरह यौगिक चमत्कार भी है । रसायनशास्त्रके कारण भी जिन-जिन सम्बन्धोंसे जिन-जिन धातुओंमें सुवर्ण बननेकी शक्ति है, उन्हीं धातुओसे उन्हीं सम्बन्धोंके द्वारा सुवर्णनिष्पत्ति होती है। इसी तरह क्या गणित क्या अन्य विषय—सबमें सिद्धान्त स्थायी ही होते हैं। उनकी जानकारीके लिये ही शिक्षा-प्रयोग आदि अपेक्षित होते हैं। मार्क्सवादी कहते हैं कि "अनुभव सामाजिक प्रयोगोका परिणाम तथा जोड़ है। लेनिनके शब्दोंमें अनुभवमे हमारी बुद्धिपर अनिर्भर होकर बुद्धिके विषयोंका आविर्भाव होता है। मौसमी हवा और सामुद्रिक धाराएँ जीवरूपके आविर्भावके बहुत पहलेसे थीं। मानव-ज्ञान और सामाजिक प्रयोगके आविर्भावके करोड़ों वर्ष पहले ये वर्तमान थीं, लेकिन बहुत दिनोंके समुद्रयात्राके अनुभवसे ही इन हवाओ और धाराओका ज्ञान सम्भव हो सका । फिर लेनिनके ही शब्दोंमें वह इसी रूपमें अनन्तकालसे चली आ रही है। युक्तियुक्त बुद्धिका आधार है, मानव- व्यवहार, जो लाखो बार दोहरानेपर सज्ञाके अंदर तर्कज्ञानके रूपमें प्रतिष्ठित हो जाता है । यद्यपि व्यावहारिक आवश्यकताओकी पूर्ति के लिये ही सिद्धान्तका जन्म होता है । जन्म ग्रहण करनेके बाद एक सीमातक इसका स्वतन्त्र विकास होता है । और जिस व्यावहारिक आधारपर यह उठ खड़ा होता है, उसको प्रभावित, संशोधित और परिवर्धित किये बिना नहीं रहता । इस प्रकार प्रयोग और सिद्धान्त 'विरोधियोंका एकत्व' है जिनके परस्पर प्रभावका कोई अन्त नहीं है—जबतक मनुष्य-जातिका अस्तित्व है, मानव- व्यवहार प्राथमिक है । गोटेके शब्दोंमें—'आरम्भमें था कर्म' लेकिन चूँकि व्यवहार पूर्णता लाता है, इसलिये प्रयोगका विकास सिद्धान्तको आगे बढाता है और यह पुनः प्रयोगको प्रभावित करता है ।