भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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नामक लेखमें हेसेनने न्यूटनपर जो प्रकाश डाला है उससे इस भ्रमका निराकरण होता है कि न्यूटन किसी द्युलोकका स्वप्नद्रष्टा है जिसका पार्थिव व्यवहारसे कोई संस्पर्श नहीं है । उसने यह दिखलाया है कि न्यूटनने जिन समस्याओंका समाधान किया है, उनकी उत्पत्ति उस समयके मानव-समाजकी व्यावहारिक आवश्यकताओं- से ही हुई है ।” ‘भूत पहले या मानस’ यह प्रश्न इस अभिप्रायसे है कि दृक्-दृश्य, ज्ञान- ज्ञेय इनमेंसे कौन पहलेसे है ? यदि मानसका अर्थ उस मानससे है जो कि एक आन्तर इन्द्रिय या सूक्ष्म पञ्चमहाभूतोंके समष्टि सात्त्विक अंगोसे निर्मित अन्तः- करणरूपसे प्रसिद्ध है, तब अधिक मतभेद नहीं रह जाता । प्रयोग पहले या सिद्धान्त, व्यवहार पहले या तथ्य ? कोई भी समझ सकता है कि प्रमाणसे ही प्रमेयकी सिद्धि होती है । कभी भी बोधसे ही बोध्यकी सिद्धि होती है । फिर बोध तो वह वस्तु है कि प्रमाण भी उसीसे सिद्ध होता है । इस बोधका प्रागभाव एवं प्रध्वंस समझनेके लिये भी बोध आवश्यक ही है । जड अंगोसे उसका प्रागभाव समझना कठिन ही नहीं असम्भव है । बोधमें सविशेषता लानेके लिये इन्द्रिय- मन आदिका व्यापार आवश्यक होता है । प्रयोगोसे नियमो एव सिद्धान्तोकी जानकारी हेती है, निर्माण नहीं होता । किन-किन वस्तुओंमें क्या-क्या गुण हैं, यह हमारी जानकारीसे पहले भी कम-से-कम भौतिकवादीको तो मान्य होना ही चाहिये । इसलिये व्यापार, विजय-यात्राके कारण भौगोलिक स्थितिका ज्ञान होता है निर्माण नहीं । इसी प्रकार पैदावार, उद्योग, लड़ाई और औजारोंने खनिजके ज्ञानमें सहायता की है, परंतु इनके कारण खनिजका निर्माण नहीं हुआ । कृषिके कारण ऋतुओका ज्ञान भले ही हुआ हो, परंतु ऋतुओका अस्तित्व कृषिके कारण नहीं हुआ । प्रयोगके आधारपर विधमान वस्तुका ही ज्ञान और उपयोग कहा जा सकता है । अग्निकी उष्णता, जलकी शीतलता, वायुकी प्रवहण शीलता, हमारे प्रयोगके आधारपर नहीं बनी । इस तरह प्रयोग और आवश्यकताके अनुसार गुण-उपयोगिता एव सिद्धान्तोका ज्ञान होता है । परंतु गुण-उपयोगिता और सिद्धान्त पहलेसे ही होते हैं । इतना ही क्यो ? सभी प्रवृत्तियोंमें सकल्प या ज्ञान हेतु होते हैं । क्रियाओ, अनुभवोसे जानकारीमें विशेषताएँ होती हैं । ये ज्ञान भी सदा प्रयोगोके आधारपर नहीं होते । व्यवहारमें देखते हैं कि जो गाँवके किसान खेती करते हैं, उन्हे इतना कृषिविज्ञान नहीं रहता जितना पुस्तको और प्रयोगशालाओंके द्वारा विद्यार्थियोंको होता है । सदा संग्राम करनेवालोको भी इतना परिज्ञान नहीं होता जितना एक फील्डमार्शलको, और मजदूरोको शिल्पका इतना ज्ञान नही होना जितना इजीनियरोंको । बुद्धिका महत्त्व तो सभीको मान्य होना ही चाहिये । सहस्रों मनुष्य जो काम नहीं कर पाते, वह काम बुद्धिनिर्मित मशीनोंसे सरलतासे हो जाता है ।