मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 361, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ें६०२ मार्क्सवाद और रामराज्य नहीं करते; किंतु वे सिद्धान्तको ही प्रधान मानते हैं । उनकी दृष्टिमें सिद्धान्त प्रयोगकी संतान नहीं है, वह एक स्वयम्भू तत्त्व है । ऐसे मतवालोंके लिये प्रयोगका आश्रित होना निम्नकोटिके लोगोंको ही शोभा देता है । सिद्ध महर्षि इसके ऊपर हैं । यह गौर करनेकी बात है कि प्राचीन भारतका प्रगतिशील युग प्रयोग- निर्भर ही था, जैसा कि अलबेरूनीद्वारा उद्धृत आर्य भट्ट ( ४७६ ई० ) के निम्न सूत्रसे स्पष्ट हो जाता है । 'सूर्यकी किरणें जो कुछ प्रकाशित करती हैं वही हमारे लिये पर्याप्त है । उनसे परे जो कुछ है और वह अनन्त दूरतक फैला हो सकता है, उसका हम प्रयोग नहीं कर सकते। जहाँ सूर्यकी किरणें नहीं पहुँचती, वहाँ इन्द्रियोंकी गति नहीं और जहाँ इन्द्रियोंकी गति नहीं, उसे हम जान नहीं सकते ।' "पूर्वोक्त दृष्टिकोण श्रेणी-विभाजित समाजका और उस समाजमें शारीरिक और मानसिक श्रमके विभाजनका परिणाम है। पूँजीवादमें शारीरिक और मानसिक श्रमका विच्छेद पूरे तौरपर हो जाता है। श्रमके इस विभाजनके कारण प्रयोगसे बिल्कुल स्वतन्त्र होकर सिद्धान्तका निर्माण होता है और ऐसे विद्व