भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्ससीय समाज-व्यवस्था ६०१ सीमित नहीं है। केवल जो कुछ मानवबुद्धिग्राह्य है वही सब कुछ नहीं है। मनुष्यकी अल्पज्ञता तो स्पष्ट ही है। यदि हम वस्तुका सभी गुण जान लें तो वस्तु- स्वरूपके विषयमें कुछ आविष्कार बाकी नहीं रह जाता। ऐंजिल्सका यह विचार भी आकाशकुसुमकी कल्पना ही है। स्वाप्निक दृश्यवस्तु जैसे द्रष्टापर ही निर्भर होती है, उसी तरह जाग्रत्-प्रपञ्च भी द्रष्टापर ही निर्भर है। इसीलिये हीगेलको चेतनसे अचेतनकी उत्पत्ति माननेको बाध्य होना पड़ा। कांट और हीगेलके इस भेदमें कोई तथ्य नहीं है कि कर्ता और कर्मका क्रियाशील एकत्व क्रियाशील तथा फलोत्पादक है, या क्रियाशील सम्बन्ध फलोत्पादक है। क्योंकि ज्ञान स्वयं चेतन एवं प्रकाशात्मक होनेसे कर्ताकी जातिका है, अतः कर्ताकी ओर फलोत्पत्तिका व्यवहार होता है—यह काटका अभिप्राय है। निर्विकार, निर्दृश्य अखण्ड बोधमें विषयो- पराग स्वतः सम्भव नहीं है। अतः दृक्, दृश्य, चेतन, अचेतनके अन्योन्याध्याससे ही व्यावहारिक सप्रपञ्च ज्ञान होता है। यही हीगेलका अभिप्राय है। मार्क्सके अनुसार 'मनुष्य एवं वस्तुके बीचकी क्रिया-प्रतिक्रिया ही ज्ञानप्रक्रिया है और ज्ञानका मूल मनुष्यकी व्यावहारिक क्रिया है। इन्द्रियानुभूत और तर्क-बुद्धि ही प्रयोग एवं व्यव- हारके द्वारा युक्तियुक्त ज्ञानका निर्माण करती है।' जहाँतक व्यावहारिक वृत्तिरूप ज्ञानकी बात है, सांख्यवादी भी यही मानते हैं। इतना अवश्य है कि सांख्योंका मनुष्य रक्त मास-अस्थिपञ्जरमात्र नहीं; किंतु वह चेतन असङ्ग आत्मा है। और उसी दृष्टिसे द्रष्टा तथा दृश्य, कर्ता और कर्म, भोक्ता तथा भोग्यका भेद भी सिद्ध होता है। अथवा इससे निम्नस्तरपर उतरें तो कह सकते हैं कि सूक्ष्म सत्त्वात्मक बुद्धि- तत्त्व ही कर्ता या ज्ञाता है। तामस, राजस, स्थूल-प्रपञ्च वस्तु हैं। यही कर्ता, कर्म, ज्ञाता एव ज्ञेयका भेद है। परंतु मार्क्सके अनुसार 'भूत ही सब कुछ है। उसका ही परिणाम वस्तु है, और उसीका परिणाम मनुष्य है।' फिर उसकी क्रिया-प्रति- क्रियामे भी अति विलक्षण प्रकाशरूप ज्ञान किस तरह उत्पन्न हो सकेगा, यह विचारणीय विषय है। व्यवहार और तथ्य मार्क्सवादी कहते हैं कि "भूत पहले या मानस, यह प्रश्न एक दूसरे रूपमें भी जीवनके सामने उठ खड़ा होता है। प्रयोग पहले या सिद्धान्त ? व्यवहार पहले या तथ्य ? इसका उत्तर हमको जीवनपथमें एक विशिष्ट दिशाकी ओर ले जाता है। इस विषयमें मार्क्सवादी दृष्टिकोण भी अपनी विशेषता रखता है। कुछ लोग कहते हे कि प्रयोग और सिद्धान्तमें कोई समन्वय नहीं हो सकता। प्रयोग इम गंदी, स्थूल, असत्य, मायावी दुनियाँकी चीज है। सिद्धान्त चिरसत्य, शिव और सुन्दर है। दोनोंका क्या सम्बन्ध है ? 'सिद्धान्त दर्शन-ज्ञान ही सब कुछ है, इसके अति- रिक्त कुछ है ही नहीं', इस तरहके विचार रखनेवाले लोग मकड़ीकी भाँति अपने भीतरसे सिद्धान्तको निकालते हैं। दूसरे लोग हैं, जो प्रयोगसे एकदम इनकार तो