मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोनों सम्पूर्णोंको एक विकासमान सम्पूर्णके धनात्मक और ऋणात्मकरूपमें माना और इस प्रकार पूर्ण आदर्शवादको पहुँचे । 'काटने कर्ता और कर्म ( वस्तु ) के विरोधात्मक एकत्वको अपनी दर्शन-व्यवस्थाका केन्द्र बनाया । लेकिन उसकी इस कल्पनामे यह असङ्गति थी कि एक ही ओर यानी कर्ताकी ओर ही यह एकत्व क्रियाशील तथा फलोत्पादक है । हीगेलने इस असङ्गतिको दूर किया और इस बुनियादपर अपनी सारी प्रथाका निर्माण किया कि सत्यका अवस्थान न केवल शुद्ध कर्तामें और न केवल शुद्ध वस्तुमें है, बल्कि इनके बीचके क्रियाशील सम्बन्धमें है—जिस सम्बन्धके द्वारा कर्ता और वस्तु, दोनोंमें क्रमवर्धनशील रूपान्तर होता रहता है । आदर्शवादके स्तरपर यह कल्पना हमको ले जाती है, मार्क्सीय विश्वकल्पनाकी ओर । आदर्शवादने क्रियाशील पक्षको विकसित किया, लेकिन केवल अमूर्त- रूपमें द्वन्द्वमान, तर्क और विचारके व्यापक नियमोंके विकासमें तथा मनुष्यकी मस्तिष्क-क्रियाकी सीमाओंको रेखाङ्कित करनेमें । वस्तुओंके द्वारा रक्तमांससम्पन्न मनुष्य-व्यवहारके क्रियाशील पक्षका विकास भौतिकवादियोंने किया नहीं और आदर्शवादी अपने आदर्शवादके कारण कर न सके । “प्रारम्भमें दिये गये ज्ञानकी परिभाषाका द्वन्द्वात्मकरूप अब समझा जा सकता है । मनुष्यके बाहर स्थित प्रकृति ही ज्ञानका उद्गम है । ज्ञानप्रक्रिया मनुष्य और वस्तुके बीच एक क्रिया प्रतिक्रिया है जो मनुष्य और वस्तुको भिन्न बना देती है ज्ञात होनेके कारण । ज्ञात वस्तु अपने पहले रूपसे विभिन्न बन जाती है और ज्ञानी मनुष्य भी अपने पहले रूपसे भिन्न है । ज्ञानका मूल है मनुष्यकी व्यावहारिक क्रिया—वस्तुओंके द्वारा, अनुभवके द्वारा । ज्ञान- प्राप्तिकी पहली सीढ़ी है इन्द्रियानुभूति । इन्द्रियानुभूति कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो मनुष्य-अवयवके साथ सदा एक-सी बनी रहती हो । यह इन्द्रियानुभूति एक विशेष उपज है और यह पैदा होती है पशुओकी इन्द्रियानुभूतिसे भिन्नरूपमें; ऐतिहासिक, सामाजिक प्रयोगकी बुनियादपर । सामाजिक ज्ञानका विकास इन्द्रियानुभूति तथा युक्तियुक्त ज्ञान दोनोंको समृद्ध करता है । किसी भी असभ्य मनुष्यके विचार और इन्द्रियानुभूतिका स्तर इतना निम्न होता है कि किसी सभ्य मनुष्यसे उसकी तुलना नहीं हो सकती । उसके निम्नस्तर और अत्यन्त सीमित पार्थिव आचार-व्यवहारपर ही उसके विचार और इन्द्रियानुभूति दोनों ही निर्भर हैं । ज्ञानकी दूमरी सीढ़ी है तर्कबुद्धि । यह बुद्धि भी प्रयोग और व्यवहारके द्वारा आती है ।" वृत्तिरूप ज्ञानका ही क्षेत्र किन्हीं रूपोंमें सीमित हो सकता है । निर्विषय, निर्द्वन्द्य शुद्धबोधके सम्बन्धमें यह नहीं कहा जा सकता । साथ ही बाह्यरूप भी