मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
दोनों सम्पूर्णोंको एक विकासमान सम्पूर्णके धनात्मक और ऋणात्मकरूपमें माना और इस प्रकार पूर्ण आदर्शवादको पहुँचे । 'काटने कर्ता और कर्म ( वस्तु ) के विरोधात्मक एकत्वको अपनी दर्शन-व्यवस्थाका केन्द्र बनाया । लेकिन उसकी इस कल्पनामे यह असङ्गति थी कि एक ही ओर यानी कर्ताकी ओर ही यह एकत्व क्रियाशील तथा फलोत्पादक है । हीगेलने इस असङ्गतिको दूर किया और इस बुनियादपर अपनी सारी प्रथाका निर्माण किया कि सत्यका अवस्थान न केवल शुद्ध कर्तामें और न केवल शुद्ध वस्तुमें है, बल्कि इनके बीचके क्रियाशील सम्बन्धमें है—जिस सम्बन्धके द्वारा कर्ता और वस्तु, दोनोंमें क्रमवर्धनशील रूपान्तर होता रहता है । आदर्शवादके स्तरपर यह कल्पना हमको ले जाती है, मार्क्सीय विश्वकल्पनाकी ओर । आदर्शवादने क्रियाशील पक्षको विकसित किया, लेकिन केवल अमूर्त- रूपमें द्वन्द्वमान, तर्क और विचारके व्यापक नियमोंके विकासमें तथा मनुष्यकी मस्तिष्क-क्रियाकी सीमाओंको रेखाङ्कित करनेमें । वस्तुओंके द्वारा रक्तमांससम्पन्न मनुष्य-व्यवहारके क्रियाशील पक्षका विकास भौतिकवादियोंने किया नहीं और आदर्शवादी अपने आदर्शवादके कारण कर न सके । “प्रारम्भमें दिये गये ज्ञानकी परिभाषाका द्वन्द्वात्मकरूप अब समझा जा सकता है । मनुष्यके बाहर स्थित प्रकृति ही ज्ञानका उद्गम है । ज्ञानप्रक्रिया मनुष्य और वस्तुके बीच एक क्रिया प्रतिक्रिया है जो मनुष्य और वस्तुको भिन्न बना देती है ज्ञात होनेके कारण । ज्ञात वस्तु अपने पहले रूपसे विभिन्न बन जाती है और ज्ञानी मनुष्य भी अपने पहले रूपसे भिन्न है । ज्ञानका मूल है मनुष्यकी व्यावहारिक क्रिया—वस्तुओंके द्वारा, अनुभवके द्वारा । ज्ञान- प्राप्तिकी पहली सीढ़ी है इन्द्रियानुभूति । इन्द्रियानुभूति कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो मनुष्य-अवयवके साथ सदा एक-सी बनी रहती हो । यह इन्द्रियानुभूति एक विशेष उपज है और यह पैदा होती है पशुओकी इन्द्रियानुभूतिसे भिन्नरूपमें; ऐतिहासिक, सामाजिक प्रयोगकी बुनियादपर । सामाजिक ज्ञानका विकास इन्द्रियानुभूति तथा युक्तियुक्त ज्ञान दोनोंको समृद्ध करता है । किसी भी असभ्य मनुष्यके विचार और इन्द्रियानुभूतिका स्तर इतना निम्न होता है कि किसी सभ्य मनुष्यसे उसकी तुलना नहीं हो सकती । उसके निम्नस्तर और अत्यन्त सीमित पार्थिव आचार-व्यवहारपर ही उसके विचार और इन्द्रियानुभूति दोनों ही निर्भर हैं । ज्ञानकी दूमरी सीढ़ी है तर्कबुद्धि । यह बुद्धि भी प्रयोग और व्यवहारके द्वारा आती है ।" वृत्तिरूप ज्ञानका ही क्षेत्र किन्हीं रूपोंमें सीमित हो सकता है । निर्विषय, निर्द्वन्द्य शुद्धबोधके सम्बन्धमें यह नहीं कहा जा सकता । साथ ही बाह्यरूप भी
मार्क्ससीय समाज-व्यवस्था ६०१ सीमित नहीं है। केवल जो कुछ मानवबुद्धिग्राह्य है वही सब कुछ नहीं है। मनुष्यकी अल्पज्ञता तो स्पष्ट ही है। यदि हम वस्तुका सभी गुण जान लें तो वस्तु- स्वरूपके विषयमें कुछ आविष्कार बाकी नहीं रह जाता। ऐंजिल्सका यह विचार भी आकाशकुसुमकी कल्पना ही है। स्वाप्निक दृश्यवस्तु जैसे द्रष्टापर ही निर्भर होती है, उसी तरह जाग्रत्-प्रपञ्च भी द्रष्टापर ही निर्भर है। इसीलिये हीगेलको चेतनसे अचेतनकी उत्पत्ति माननेको बाध्य होना पड़ा। कांट और हीगेलके इस भेदमें कोई तथ्य नहीं है कि कर्ता और कर्मका क्रियाशील एकत्व क्रियाशील तथा फलोत्पादक है, या क्रियाशील सम्बन्ध फलोत्पादक है। क्योंकि ज्ञान स्वयं चेतन एवं प्रकाशात्मक होनेसे कर्ताकी जातिका है, अतः कर्ताकी ओर फलोत्पत्तिका व्यवहार होता है—यह काटका अभिप्राय है। निर्विकार, निर्दृश्य अखण्ड बोधमें विषयो- पराग स्वतः सम्भव नहीं है। अतः दृक्, दृश्य, चेतन, अचेतनके अन्योन्याध्याससे ही व्यावहारिक सप्रपञ्च ज्ञान होता है। यही हीगेलका अभिप्राय है। मार्क्सके अनुसार 'मनुष्य एवं वस्तुके बीचकी क्रिया-प्रतिक्रिया ही ज्ञानप्रक्रिया है और ज्ञानका मूल मनुष्यकी व्यावहारिक क्रिया है। इन्द्रियानुभूत और तर्क-बुद्धि ही प्रयोग एवं व्यव- हारके द्वारा युक्तियुक्त ज्ञानका निर्माण करती है।' जहाँतक व्यावहारिक वृत्तिरूप ज्ञानकी बात है, सांख्यवादी भी यही मानते हैं। इतना अवश्य है कि सांख्योंका मनुष्य रक्त मास-अस्थिपञ्जरमात्र नहीं; किंतु वह चेतन असङ्ग आत्मा है। और उसी दृष्टिसे द्रष्टा तथा दृश्य, कर्ता और कर्म, भोक्ता तथा भोग्यका भेद भी सिद्ध होता है। अथवा इससे निम्नस्तरपर उतरें तो कह सकते हैं कि सूक्ष्म सत्त्वात्मक बुद्धि- तत्त्व ही कर्ता या ज्ञाता है। तामस, राजस, स्थूल-प्रपञ्च वस्तु हैं। यही कर्ता, कर्म, ज्ञाता एव ज्ञेयका भेद है। परंतु मार्क्सके अनुसार 'भूत ही सब कुछ है। उसका ही परिणाम वस्तु है, और उसीका परिणाम मनुष्य है।' फिर उसकी क्रिया-प्रति- क्रियामे भी अति विलक्षण प्रकाशरूप ज्ञान किस तरह उत्पन्न हो सकेगा, यह विचारणीय विषय है। व्यवहार और तथ्य मार्क्सवादी कहते हैं कि "भूत पहले या मानस, यह प्रश्न एक दूसरे रूपमें भी जीवनके सामने उठ खड़ा होता है। प्रयोग पहले या सिद्धान्त ? व्यवहार पहले या तथ्य ? इसका उत्तर हमको जीवनपथमें एक विशिष्ट दिशाकी ओर ले जाता है। इस विषयमें मार्क्सवादी दृष्टिकोण भी अपनी विशेषता रखता है। कुछ लोग कहते हे कि प्रयोग और सिद्धान्तमें कोई समन्वय नहीं हो सकता। प्रयोग इम गंदी, स्थूल, असत्य, मायावी दुनियाँकी चीज है। सिद्धान्त चिरसत्य, शिव और सुन्दर है। दोनोंका क्या सम्बन्ध है ? 'सिद्धान्त दर्शन-ज्ञान ही सब कुछ है, इसके अति- रिक्त कुछ है ही नहीं', इस तरहके विचार रखनेवाले लोग मकड़ीकी भाँति अपने भीतरसे सिद्धान्तको निकालते हैं। दूसरे लोग हैं, जो प्रयोगसे एकदम इनकार तो
६०२ मार्क्सवाद और रामराज्य नहीं करते; किंतु वे सिद्धान्तको ही प्रधान मानते हैं । उनकी दृष्टिमें सिद्धान्त प्रयोगकी संतान नहीं है, वह एक स्वयम्भू तत्त्व है । ऐसे मतवालोंके लिये प्रयोगका आश्रित होना निम्नकोटिके लोगोंको ही शोभा देता है । सिद्ध महर्षि इसके ऊपर हैं । यह गौर करनेकी बात है कि प्राचीन भारतका प्रगतिशील युग प्रयोग- निर्भर ही था, जैसा कि अलबेरूनीद्वारा उद्धृत आर्य भट्ट ( ४७६ ई० ) के निम्न सूत्रसे स्पष्ट हो जाता है । 'सूर्यकी किरणें जो कुछ प्रकाशित करती हैं वही हमारे लिये पर्याप्त है । उनसे परे जो कुछ है और वह अनन्त दूरतक फैला हो सकता है, उसका हम प्रयोग नहीं कर सकते। जहाँ सूर्यकी किरणें नहीं पहुँचती, वहाँ इन्द्रियोंकी गति नहीं और जहाँ इन्द्रियोंकी गति नहीं, उसे हम जान नहीं सकते ।' "पूर्वोक्त दृष्टिकोण श्रेणी-विभाजित समाजका और उस समाजमें शारीरिक और मानसिक श्रमके विभाजनका परिणाम है। पूँजीवादमें शारीरिक और मानसिक श्रमका विच्छेद पूरे तौरपर हो जाता है। श्रमके इस विभाजनके कारण प्रयोगसे बिल्कुल स्वतन्त्र होकर सिद्धान्तका निर्माण होता है और ऐसे विद्व
नामक लेखमें हेसेनने न्यूटनपर जो प्रकाश डाला है उससे इस भ्रमका निराकरण होता है कि न्यूटन किसी द्युलोकका स्वप्नद्रष्टा है जिसका पार्थिव व्यवहारसे कोई संस्पर्श नहीं है । उसने यह दिखलाया है कि न्यूटनने जिन समस्याओंका समाधान किया है, उनकी उत्पत्ति उस समयके मानव-समाजकी व्यावहारिक आवश्यकताओं- से ही हुई है ।” ‘भूत पहले या मानस’ यह प्रश्न इस अभिप्रायसे है कि दृक्-दृश्य, ज्ञान- ज्ञेय इनमेंसे कौन पहलेसे है ? यदि मानसका अर्थ उस मानससे है जो कि एक आन्तर इन्द्रिय या सूक्ष्म पञ्चमहाभूतोंके समष्टि सात्त्विक अंगोसे निर्मित अन्तः- करणरूपसे प्रसिद्ध है, तब अधिक मतभेद नहीं रह जाता । प्रयोग पहले या सिद्धान्त, व्यवहार पहले या तथ्य ? कोई भी समझ सकता है कि प्रमाणसे ही प्रमेयकी सिद्धि होती है । कभी भी बोधसे ही बोध्यकी सिद्धि होती है । फिर बोध तो वह वस्तु है कि प्रमाण भी उसीसे सिद्ध होता है । इस बोधका प्रागभाव एवं प्रध्वंस समझनेके लिये भी बोध आवश्यक ही है । जड अंगोसे उसका प्रागभाव समझना कठिन ही नहीं असम्भव है । बोधमें सविशेषता लानेके लिये इन्द्रिय- मन आदिका व्यापार आवश्यक होता है । प्रयोगोसे नियमो एव सिद्धान्तोकी जानकारी हेती है, निर्माण नहीं होता । किन-किन वस्तुओंमें क्या-क्या गुण हैं, यह हमारी जानकारीसे पहले भी कम-से-कम भौतिकवादीको तो मान्य होना ही चाहिये । इसलिये व्यापार, विजय-यात्राके कारण भौगोलिक स्थितिका ज्ञान होता है निर्माण नहीं । इसी प्रकार पैदावार, उद्योग, लड़ाई और औजारोंने खनिजके ज्ञानमें सहायता की है, परंतु इनके कारण खनिजका निर्माण नहीं हुआ । कृषिके कारण ऋतुओका ज्ञान भले ही हुआ हो, परंतु ऋतुओका अस्तित्व कृषिके कारण नहीं हुआ । प्रयोगके आधारपर विधमान वस्तुका ही ज्ञान और उपयोग कहा जा सकता है । अग्निकी उष्णता, जलकी शीतलता, वायुकी प्रवहण शीलता, हमारे प्रयोगके आधारपर नहीं बनी । इस तरह प्रयोग और आवश्यकताके अनुसार गुण-उपयोगिता एव सिद्धान्तोका ज्ञान होता है । परंतु गुण-उपयोगिता और सिद्धान्त पहलेसे ही होते हैं । इतना ही क्यो ? सभी प्रवृत्तियोंमें सकल्प या ज्ञान हेतु होते हैं । क्रियाओ, अनुभवोसे जानकारीमें विशेषताएँ होती हैं । ये ज्ञान भी सदा प्रयोगोके आधारपर नहीं होते । व्यवहारमें देखते हैं कि जो गाँवके किसान खेती करते हैं, उन्हे इतना कृषिविज्ञान नहीं रहता जितना पुस्तको और प्रयोगशालाओंके द्वारा विद्यार्थियोंको होता है । सदा संग्राम करनेवालोको भी इतना परिज्ञान नहीं होता जितना एक फील्डमार्शलको, और मजदूरोको शिल्पका इतना ज्ञान नही होना जितना इजीनियरोंको । बुद्धिका महत्त्व तो सभीको मान्य होना ही चाहिये । सहस्रों मनुष्य जो काम नहीं कर पाते, वह काम बुद्धिनिर्मित मशीनोंसे सरलतासे हो जाता है ।
६०४ मार्क्सवाद और रामराज्य
इसी तरह लाखो वर्षोंकी वृत्तियोंसे भी जो ज्ञान सम्पन्न नहीं होता, वह ज्ञान शान्त-समाहित, योग-शक्तिसम्पन्न मनसे हो जाता है । जैसे बुद्धिनिर्मित दूर- वीक्षण या सूक्ष्मवीक्षणसे दूर-सूक्ष्म वस्तुओंका ज्ञान हो सकता है, वैसे ही योग- जन्यशक्तिविशिष्ट मनसे बाह्य प्रयोगके बिना भी अनेक वस्तुओ, उनके गुणो एव सिद्धान्तोंका ज्ञान हो जाता है । 'जहाँ सूर्यकी किरणे नहीं पहुँचतीं वहाँ इन्द्रियोकी गति नही और जहाँ इन्द्रियोकी गति नही, उसे हम जान नहीं सकते'— यह कथन योगज-ज्ञानविहीन व्यक्तियोके लिये ही ठीक है । यह भी रूपवान् वस्तुके ही सम्बन्धमें कहा गया है । शब्द और स्पर्शके सम्बन्धमें सूर्यकिरणे प्रकाश नहीं फैला सकतीं; फिर भी श्रोत्रत्वके द्वारा उनका ज्ञान होता ही है । प्रकृति-परमाणु आदिका ज्ञान अनुमानसे होता है। इन्द्रियो, मन एव बुद्धिमें सूर्यकी किरणे नहीं पहुँचतीं; फिर भी उनका ज्ञान साक्षीसे होता ही है। रेडियो, टेलीविजनद्वारा इस समय अतिदूरस्थ शब्द एवं रूपका अनुभव किया ही जा रहा है। यह सामान्य इन्द्रियगतिसे भिन्न ही यान्त्रिक शक्तिका चमत्कार है । इसी तरह यौगिक चमत्कार भी है । रसायनशास्त्रके कारण भी जिन-जिन सम्बन्धोंसे जिन-जिन धातुओंमें सुवर्ण बननेकी शक्ति है, उन्हीं धातुओसे उन्हीं सम्बन्धोंके द्वारा सुवर्णनिष्पत्ति होती है। इसी तरह क्या गणित क्या अन्य विषय—सबमें सिद्धान्त स्थायी ही होते हैं। उनकी जानकारीके लिये ही शिक्षा-प्रयोग आदि अपेक्षित होते हैं। मार्क्सवादी कहते हैं कि "अनुभव सामाजिक प्रयोगोका परिणाम तथा जोड़ है। लेनिनके शब्दोंमें अनुभवमे हमारी बुद्धिपर अनिर्भर होकर बुद्धिके विषयोंका आविर्भाव होता है। मौसमी हवा और सामुद्रिक धाराएँ जीवरूपके आविर्भावके बहुत पहलेसे थीं। मानव-ज्ञान और सामाजिक प्रयोगके आविर्भावके करोड़ों वर्ष पहले ये वर्तमान थीं, लेकिन बहुत दिनोंके समुद्रयात्राके अनुभवसे ही इन हवाओ और धाराओका ज्ञान सम्भव हो सका । फिर लेनिनके ही शब्दोंमें वह इसी रूपमें अनन्तकालसे चली आ रही है। युक्तियुक्त बुद्धिका आधार है, मानव- व्यवहार, जो लाखो बार दोहरानेपर सज्ञाके अंदर तर्कज्ञानके रूपमें प्रतिष्ठित हो जाता है । यद्यपि व्यावहारिक आवश्यकताओकी पूर्ति के लिये ही सिद्धान्तका जन्म होता है । जन्म ग्रहण करनेके बाद एक सीमातक इसका स्वतन्त्र विकास होता है । और जिस व्यावहारिक आधारपर यह उठ खड़ा होता है, उसको प्रभावित, संशोधित और परिवर्धित किये बिना नहीं रहता । इस प्रकार प्रयोग और सिद्धान्त 'विरोधियोंका एकत्व' है जिनके परस्पर प्रभावका कोई अन्त नहीं है—जबतक मनुष्य-जातिका अस्तित्व है, मानव- व्यवहार प्राथमिक है । गोटेके शब्दोंमें—'आरम्भमें था कर्म' लेकिन चूँकि व्यवहार पूर्णता लाता है, इसलिये प्रयोगका विकास सिद्धान्तको आगे बढाता है और यह पुनः प्रयोगको प्रभावित करता है ।
मार्क्सीय समाज-व्यवस्था ६०५ "यहाँपर बुखारिनके यह उद्धरण अनुपयुक्त न होगा—'उद्योग और सिद्धान्त—दोनों ही सामाजिक मनुष्यकी क्रिया हैं यदि हम सिद्धान्तको एक निश्चित प्रणालीके रूपमें और प्रयोगको एक बनी-बनायी वस्तुकी तरह न देखें, बल्कि क्रियाशील-अवस्थामें इनको देखें तो हमें श्रम-क्रियाके दो रूप दिखलायी पड़ेंगे । श्रमका शारीरिक और मानसिक भागोंमें विभाजन सिद्धान्त-प्रयोगका सञ्चित और साररूप है प्रयोग और सिद्धान्तकी परस्पर क्रिया-प्रतिक्रिया और उनकी एकताका विकास प्रयोगकी प्राथमिकताकी बुनियादपर होता है । इतिहासमें व्यावहारिकताके क्षेत्रमें विज्ञानने जन्म ग्रहण किया, विचारोंकी उपज वस्तुओंकी उपजमे ही अपना रूप ग्रहण करती है । सामाजिकताके क्षेत्रमें सामाजिक रहन-सहन सामाजिक चेतनाका मूल है । सम्पूर्ण सामाजिक विकास वस्तु-उत्पादक श्रम-क्रिया-शक्ति- जनित है । मार्क्समे ही हमें प्रयोगकी प्राथमिकताकी बुनियादपर प्रयोग और सिद्धान्तके समन्वयकी शिक्षा मिलती है । प्रयोग ही सिद्धान्तकी सत्यताका प्रमाण है ।''
६०६ मार्क्सवाद और रामराज्य अनेक उपाधियोंके कारण प्रकट विशिष्ट अग्निके प्रकारोंमें विशेषता आ सकती है। व्यापक मूल अग्निकी सत्तामें इन उपाधियोंके भाव-अभावका कुछ असर नहीं पड़ता। इसी तरह बुद्धिकी विभिन्न अवस्थाओं एवं बाह्य उपाधियोंमें भेद होनेपर भी सर्व- भासक अखण्ड बोधमें इन बाह्य व्यवहारोंका कुछ भीअसर नहीं पड़ता। प्रमाणोंके आधारपर वादिप्रतिवादियोंद्वारा निर्णीत सत्य ही सिद्धान्त होता है। प्रामाणिक निर्णय न तो पुरुषोंकी इच्छापर निर्भर होता है और न आवश्यकताकी अपेक्षा रखता है। अनिष्ट निर्णयकी न तो आवश्यकता ही होती है और न पुरुषकी इच्छा ही वैसी होती है। फिर प्रमाणके द्वारा वस्तुतन्त्रज्ञान होता ही है। हाँ, सिद्धान्तोको जानकर उनके आधारपर आवश्यकता-पूर्ति होती है। जैसे जल-अग्नि आदिका सामान्यरूपसे प्रयोगसे सिद्धान्त, और सिद्धान्तसे प्रयोगमे प्रगति होती है, परंतु ये बातें आपेक्षिक हैं। सिद्धान्त न तो रबडछन्दकी तरह घटता-बढ़ता है और न तो गिरगिटकी तरह क्षण-क्षणमें रंग ही बदलता रहता है। कहा जा चुका है कि प्रमाणोंके आधारपर वादि-प्रतिवादिद्वारा सत्यका निर्णय ही सिद्धान्त है। त्रिकालबाध्य सत्य परिवर्तनशील नहीं होता है। अग्नि उष्ण है—यह सिद्धान्त अस्थायी नहीं। उद्योग और सिद्धान्त दोनो ही सामाजिक मनुष्यकी क्रिया है। बुखारिनका यह कहना भी इसी अंशमें सही है कि जानकारी मानसी क्रिया है। परंतु इससे भी प्रकाशस्वरूप ज्ञानकी नित्यता एवं सिद्धान्तकी स्थिरतामें फरक नहीं पडता। हाँ, यह सही है कि जिस वस्तुका ज्ञान अपूर्ण है, उसके सिद्धान्त भी अपूर्ण होंगे। उस सम्बन्धमें जितना ही अधिकाधिक परिचय हेगा उतनी जानकारी होगी, उसी ढंगका सिद्धान्त बनेगा। इसमें भी सदेह नहीं है कि प्रयोगमें शारीरिक श्रमकी विशेषता रहती है और सिद्धान्तमें मानसिक श्रमकी विशेषता। फिर भी यह व्यवस्थित नहीं है। कितने ही प्रयोग भी मानसिक ही होते हैं। प्रयोग और सिद्धान्त जबतक अन्तिम रूपसे निश्चित नहीं होते, तबतक उनमें विकास या परिवर्तन होता रहता है। परंतु अन्तिम रूपसे निश्चित हो जानेपर विकास समाप्त हो जाता है। इसीलिये यह भी नहीं कहा जा सकता कि प्रयोग और सिद्धान्तकी क्रिया-प्रतिक्रिया और उनकी एकताका विकास प्रयोगकी प्राथमिकताकी बुनियादपर होता है; क्योकि प्रयोग-प्रवृत्ति भी ज्ञानपूर्वक ही हुआ करती है। प्रवृत्तिमात्रकी प्रथम बुनियाद है ज्ञान। अतएव कहा जा सकता है कि सर्वत्र ज्ञानसे ही व्यवहारने जन्म ग्रहण किया है। सर्वव्यवहारहेतु आत्मा या अन्तःकरणका गुण ही ज्ञान कहा जाता है। जैसे हमारे ज्ञानसे घटादि वस्तुएँ उपजती हैं, उसी तरह ईश्वरीय ज्ञानसे आकाशादि वस्तुएँ उपजती हैं। 'जानाति, इच्छति, अथ करोति' यह व्यापक सिद्धान्त है। कोई व्यक्ति जानता है, इच्छा करता है, फिर क्रिया करता है। सामाजिक रहन-सहन सामाजिक चेतनका मूल है, यह भी अर्धसत्य है। सत्य यह है कि रहन-सहन भी विचारमूलक
होते हैं । उनमें उत्तरोत्तर स्पष्टता होती रहती है । शिक्षणपरम्परा या किसी कारणसे अभिव्यक्त विशेष ज्ञान ही सामाजिक चेतनाका मूल है । अतएव श्रम- क्रिया-शक्तिजनित सामाजिक विकास अंशतः मान लेनेपर भी हर क्रियाके मूलमें ज्ञान है । यह न भूलना चाहिये कि क्रिया इच्छाजन्य है, इच्छा ज्ञान- जन्य है, क्रियाजन्य जब इच्छा भी नहीं है, तब इच्छाका भी जनक ज्ञान क्रियाजन्य कैसे होगा ? प्रयोगकी प्राथमिकताकी बुनियादपर प्रयोग और सिद्धान्तके समन्वय- का मार्क्सकीय शिक्षाका सिद्धान्त सर्वथा असङ्गत है । द्वन्द्वन्याय और विकास मार्क्सवादी कहते हैं कि "जगत् परिवर्तनशील है। विकास परिवर्तनका ही एक प्रकार है। इस परिवर्तनको देखनेके विभिन्न दृष्टिकोण हैं। अतिभौतिकवादी और नैसर्गिकवादीका दृष्टिकोण एक है। और द्वन्द्वात्मक भौतिकवादीका दृष्टिकोण और है। लेनिनकी व्याख्यासे इसपर काफी प्रकाश पड़ता है। विकास विरोधियोंका सङ्घर्ष है। विकासकी दो ऐतिहासिक धाराएँ हैं । पहली विकासवृद्धि और ह्रास तथा दुहरानेके रूपमें और दूसरी विकासविरोधियोंके समन्वित एकत्व तथा परस्परसम्बन्धित रूप- में । पहली धारणा मृत, शुष्क, निःसार है, दूसरी जीवित है । दूसरी धारणाके द्वारा ही हर विद्यमान वस्तुकी स्वयं गति समझी जा सकती है और इसकी कल्पना की जा सकती है कि पुरानेका ध्वंस होकर नयेका आविर्भाव कैसे होता है' ( लेनिन—मेटेरियेलिज्म एण्ड इम्पीरियलिज्म—क्रिटिसिज्म ) "विकासकी पहली धारणासे हम मौलिक परिवर्तनको नहीं समझ सकते । इस धारणाके अनुसार परिवर्तनको क्रमपरिवर्तनके रूपमें देखा जाता है । 'परिवर्तित वस्तु भी मुख्यतः मूल वस्तु ही है। मूल वस्तुमें परिवर्तनकी मात्रा अत्यल्प होती है और इन स्वल्प मात्राओंको जोडकर ही परिवर्तित वस्तु बन जाती है । लेकिन इस प्रकार मौलिक परिवर्तनोंको समझा नहीं जा सकता । उदाहरणोंसे यह सिद्ध है कि प्राकृतिक वस्तुओंकी एक अवस्थासे दूसरी अवस्थाकी कुदान होती है। प्रकृतिमें क्रान्तिकारी परिवर्तनके उदाहरण मिलते हैं । विकास ही प्रकृतिका एक- मात्र नियम नहीं है, क्रान्तिकारी परिवर्तनका भी उसमें स्थान है । किसी वस्तुके आविर्भाव या तिरोभावकी कल्पना उसके क्रमशः आविर्भाव या तिरोभावकी कल्पना है । लेकिन सत् ( अस्तित्व ) का परिवर्तन न केवल एक गुणसे दूसरे गुणका परिवर्तन है, बल्कि परिमाणात्मकसे गुणात्मक परिवर्तन है । इस प्रकार एक परिवर्तन घटित होता है, जो एक दृश्यगत घटनाको दूसरीके स्थानापन्न करता है और धारा टूट जाती है, जब प्रवाहकी धारा टूट जाती है, तब विकासके रास्तेमें एक आकस्मिक परिवर्तन घटित होता है । हीगेलने अनेकों दृष्टान्तोंसे
६०८ मार्क्सवाद और रामराज्य यह प्रमाणित किया है कि 'प्रकृति और इतिहासमें कितनी ही बार आकस्मिक परिवर्तन होते रहते हैं।' साधारण जन-विदित विकासवादके सिद्धान्तके पोलेपनको उन्होंने अच्छी तरह दर्शाया है। हीगेलके शब्दोंमे क्रमविवर्तनकी बुनियादी बात यह है कि जिसका आविर्भाव होता है, वह पहलेसे ही विद्यमान रहता है, केवल सूक्ष्म होनेके कारण अदृश्य रहता है। इसी प्रकार जब हम किसी दृश्यगत घटनाके तिरोभावकी बात करते हैं, तब हम ऐसी कल्पना करते हैं कि जिसका तिरोभाव होता है, वह तिरोहित हो चुका है और पूर्वगत घटनाका जो स्थान लेता है, वह पहलेसे ही विद्यमान है, लेकिन दोनो ही दृष्टिगोचर नही होते। परंतु इस प्रकारसे हम आविर्भाव या तिरोभावके सम्पूर्ण ज्ञानको दबा देते हैं। किसी घटनाके आविर्भाव या तिरोभावकी व्याख्या क्रमविवर्तनके द्वारा करना शब्दसम्भारमात्र है और इसका अन्तर्हित अर्थ यह है कि जो वस्तु आविर्भाव या तिरोभावकी प्रक्रियामें है, हम ऐसा समझते हैं कि वह आविर्भूत या तिरोहित हो चुकी है ! 'हीगेलने स्वयं इस वस्तुका जो वर्णन दिया है, वह महत्त्वपूर्ण है। लोग परिवर्तनको उसके क्रमकी न्यूनतासे अपनी कल्पनाके अन्तर्गत करना चाहते हैं, लेकिन क्रमिक परिवर्तन नाममात्रका परिवर्तन है और गुणात्मक परिवर्तनके विपरीत है। क्रमिकता दो वास्तविकताके संयोगको, चाहे ये दो अवस्थाएँ हों, चाहे दो स्वतन्त्र वस्तु, दबा देती है। परिवर्तन समझनेके लिये जिनकी आवश्यकता है, उनका अपसरण हो जाता है। संगीतसम्बन्धोंमें परवर्ती स्वर आरम्भके मूलस्वरसे दूर हट जाता है। फिर ऐसा मालूम होता है कि एकाएक वह मूलस्वर लौट आया। यह पिछले स्वरमें जोड़का परिणाम नहीं है, इसका सम्बन्ध दूरके स्वरसे मालूम पड़ता है। सब मृत्यु और जन्म धारावाहिक क्रमिक न होकर इसके विघ्न ही हैं और परिमाणात्मकसे गुणात्मक परिवर्तनकी यह एक कुदान है। साधारण कल्पना जब कि किसी उत्थान या निर्वाणका ख्याल करती है, तब इसे वह क्रमिक उत्थान या निर्वाणके रूपमे देखती है, परंतु अस्तित्वमें परिवर्तन न केवल एक परिमाणसे दूसरे परिमाणका रूपान्तरण है, बल्कि गुणात्मकसे परिमाणात्मक तथा इसके विपरीत रूपान्तरणमें है। यह स्वरसे भिन्न होनेकी एक क्रिया है, जो क्रमकी धारा तोड़ देती है। "प्रारम्भिक बात यह है कि प्रकृतिको समझनेके लिये इसके इतिहासके अध्ययनकी आवश्यकता है। परिमाणकी दृष्टिसे यह तो निश्चय ही है कि किसी भी मुहूर्तमें विश्व ( संसार ) वही है, जो पहले था और जो कि भविष्यके संसार- के निर्माणकी क्रियामें है । इसी अनुमानके आधारपर विश्व ( संसार ) बुद्धिगम्य और व्यवहारयोग्य है । गुणात्मक दृष्टिसे यह समानरूपमें स्वयं सिद्ध है कि किन्हीं दो मुहूर्तोंमें विश्व ( ससार ) एक-सा नहीं है। यहाँतक हालत डार्विन
की क्रान्तिकारी पुस्तक 'ओरिजन आफ मैन' के प्रकाशित होनेके बाद, साधारण विकासवादकी कल्पनाके अनुरूप ही है। लेकिन यदि इस कल्पनाको व्यवहारोप- योगी बनाना है तो इसे और गहराईतक ले जाना पड़ेगा। विशेषकर इस जानकारीकी आवश्यकता है कि विश्व ( संसार ) का निरन्तर रूप-परिवर्तन ऊपरी परिवर्तनतक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका बुनियादी संघटन भी उसमें सम्मिलित है और वे गतियाँ भी, जिनके योगकी सम्पूर्णतामें विश्वकी क्रियाशीलता है। इस ज्ञानसे भी इसको समृद्ध करना चाहिये कि विश्वके असीम परिवर्तनमें अपरिवर्तनीयताकी मात्रा कितनी है। विज्ञानमें पुनरावर्तनके दृष्टान्तोंसे यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है।'"
पर ये बातें अविचारितरमणीय हैं। वस्तुतः विकास परिणामका ही एक स्वरूप है। परिणामवादमे सत्कार्यवाद ही मान्य होता है। क्रमपरिवर्तन या प्राकृतिक वस्तुओंकी एक अवस्थासे दूसरी अवस्थामें कुदान अर्थात् क्रान्तिकारी परिवर्तन सब परिणाम ही हैं। बादलोंकी टक्करसे तत्काल दिग्दिगन्तव्यापी महाविद्युत्प्रकाशका विकास, काष्ठसे अग्निका क्रमिक विकास, जलका शीतल होना या बर्फ बन जाना, गर्म होना या भाप बन जाना, कुछ भी परिणामसे भिन्न नहीं है और न तो मूल वस्तुसे अत्यन्त भिन्न किसी वस्त्वन्तरका निर्माण ही होता है। अल्पज्ञ, अल्पायु मानवोंकी दृष्टिमे उत्तरोत्तर नवीन-नवीन वस्तुका ही विकास होता है। परंतु ईश्वर और दीर्घायु, दीर्घज्ञ, दीर्घदर्शी महर्षियोंकी दृष्टिमें वही भूतग्राम पुनः-पुनः उत्पन्न होकर प्रलीन हुआ करता है—'भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।' (गीता ८।१९)। किसी प्रकारका भी परिवर्तन मर्त्यता, शुष्कता एव निःसारताका ही द्योतक है। जड वस्तु न स्वयं गति है, न सार और न अमृत ही है; बल्कि वह क्रियाशील, विकारी एव ध्वस्त होनेवाली वस्तु है। जो भी उत्पन्न होनेवाली वस्तु है; उसकी वृद्धि, परिणाम, अपक्षय एवं विनाश ध्रुव है। अविनश्वर तो सर्वकारण, सर्वाधिष्ठान, अखण्डबोधात्मक ब्रह्मात्मा है, जिसे मोहवश मार्क्सवादी भुलानेका प्रयत्न करते हैं। मार्क्सवादी और हीगेल जिसे 'आकस्मिक घटना एव प्रकृतिकी कुदान या क्रान्ति' कहते हैं, विकासवादी जिसे 'क्रमिक' कहते हैं, दोनोंका ही सांख्यीय परिणामवादमें अन्तर्भाव है। केवल शीघ्रता एव विलम्बमात्रसे परिणाममें भेद नहीं हो जाता और इस अर्थमें कि अत्यन्त अविद्यमान ( बालूमें तेल-जैसी चीज ) का कभी भी आविर्भाव नही हो सकता, कोई भी आकस्मिक घटना नहीं होती। परंतु एक अल्पज्ञकी दृष्टिमें कई वस्तुएँ आकस्मिक ही प्रतीत होती हैं। जलके बर्फ बन जाने या भाप बन जानेपर स्थूल रूपमे क्रमविच्छेद प्रतीत होने-
पर भी सूक्ष्मक्रम ज्यो-का-त्यो विद्यमान रहता ही है। चाहे जन्म और मरण हो, चाहे परिमाणात्मकसे गुणात्मक परिवर्तन हो, चाहे गुणात्मकसे परिमाणात्मक परिवर्तन हो, मूल वस्तुका अत्यन्त विच्छेद कभी नहीं होता। माता-पिताका सूक्ष्म शुक्रशोणित ही एकत्रित होकर क्रमेण विकसित होकर गर्भावस्था, शैशवावस्था, यौवन एवं वार्धक-अवस्थाको प्राप्त होता है। 'जायते अस्ति वर्धते' आदि षड्विध भावविकारको प्राप्त होते हुए भी मूलतः प्राकृतिक वस्तु ही सब कुछ थी और है। परमार्थ-सत्यदृष्टिसे सब कुछ स्वप्रकाश सत्से अनतिरिक्त ही है। दो अवस्थाएँ या दो स्वतन्त्र अवस्थावाली वस्तुएँ मूल वस्तुसे भिन्न नहीं होतीं, अतः उनका संयोग भी कोई नयी वस्तु नहीं है। रूईसे चाहे कितने भी चमत्कारपूर्ण वस्त्र, मृत्तिकासे कितने ही अच्छे मकान और लोहेसे कितने ही अच्छे यन्त्र बन जायँ, फिर भी क्या ये सब वस्तुएँ चाकचिक्यमात्रसे मूल वस्तुसे भिन्न हो जायेंगी ? बर्फ बन जानेपर भी क्या जलसे कोई बर्फ स्वतन्त्र वस्तु हो जायगी ? मार्क्सवादियों एव हीगेलियन लोगोके वागाडम्बरमात्रसे कार्य कभी कारणसे भिन्न नहीं हो सकता। संगीतके स्वरोमें भी परस्परभिन्नता और विच्छिन्नता आरोहावरोहसे भिन्न होते हुए भी परिणामीके क्रमिक परिणाममें कोई अन्तर नहीं है। पुष्कर-शतपत्रका तत्क्षणच्छेद यद्यपि अक्रमिक ही प्रतीत होता है, फिर भी वहाँ सूक्ष्म क्रम रहता ही है। निर्वाण या निर्माणमें भी मूल वस्तुसे भिन्नका अस्तित्व नहीं होता। प्रकृतिके पदार्थोंमें एक-सी परिणामधारा नहीं होती। वह धारा कभी सूक्ष्म होती है, कभी स्थूल। सूक्ष्म धाराका स्थूल धाराके रूपमें परिवर्तन ही जन्म कहा जाता है। स्थूल धाराका पुनः सूक्ष्म धारामें परिवर्तन होनेमे ही ध्वंस या मरणका व्यवहार होने लगता है। इसीको 'धारा टूट जाना' कहा जाता है। इसीमें मूल वस्तु भिन्न होनेकी भ्रान्ति होने लगती है। इतिहासका अध्ययन और उससे भी अधिक दर्शनका अध्ययन - प्राकृतिक परिणाम समझनेके लिये आवश्यक है। किसी प्रकारके परिवर्तन एवं परिवर्तनशील विश्वके मूलमें एक अपरिवर्तनशील, स्वतःसिद्ध स्वप्रकाश अखण्डबोध साक्षीका रहना अनिवार्य है, जिसके बिना न क्रमिक परिवर्तन, न आकस्मिक परिवर्तन ही सिद्ध होता है। विश्व एवं उसकी मूलभूत सप्तप्रकृति, विकृति एवं अविकृतिभूत मूलप्रकृति, सबका ही परिवर्तन तत्त्वदर्शियोंद्वारा अनुभूत है। परंतु उससे भी परस्तात् वह स्वयंसिद्ध सत्ता, जिसके बिना सब असत् एव अप्रकाश, निरात्मक हो जाते हैं, महर्षियोंद्वारा साक्षात्कृत है।
दशम परिच्छेद मार्क्स और ज्ञान ( मार्क्सीय मन या ज्ञानपर विचार ) ( १ ) मन और शरीर मोरिस कॉर्न फोर्थकी ‘दि थ्योरी आफ नालेज’में कहा गया है कि— “मन शरीरसे विभाज्य नहीं है। मानसिक क्रियाएँ मस्तिष्ककी क्रियाएँ हैं। मस्तिष्क प्राणीके बाह्य जगत्के साथ रहनेवाले जटिलतम सम्बन्धोंका अवयव है। वस्तुओंकी प्रत्यात्मिका जानकारी ( Conscious, awareness ) का प्रथम रूप ‘सेंसेशन’ ( Sensation ) अनुभूति है, जो प्रतिनियत सहज प्रति- क्रियाओ; ‘कण्डीशण्ड रिफ्लेक्सेज़’ ( Conditioned reflexes ) के विकाससे उत्पन्न होता है। अनुभूतियाँ ( सेसेशन ) प्राणीके लिये बाह्य-जगत्के साथ उसका जो सम्बन्ध है, उसके सकेतोंकी एक पद्धति निर्मित करती हैं। मनुष्यमें एक द्वितीय संकेतपद्धति विकसित हो गयी है—वाणी ! यह काल्पनिक ( भावप्रधान ) [ ऐब्स्ट्रेक्टिंग ] और साधारणीकरणके कार्य करती है और इसी वाणीसे सम्पूर्ण उच्चतर मानसिक जीवन बढ़ चलता है, जो कि मनुष्य प्राणीकी निजी विशेषता है। मानसिक प्रक्रियाओंकी अनिवार्य बात यह है कि उन्हीं गतिविधियोंके भीतर और उन्हींके द्वारा प्राणी अपने चारों ओरके वातावरणके साथ जटिल और विभिन्न सम्बन्ध अनवरत बनाता रहता है । इसलिये प्रत्ययोंकी प्रक्रियाएँ वास्तवमें बाह्य जड़ ( मेटोरियल ) सत्यको प्रतिबिम्बित करनेवाली प्रक्रियाएँ हैं। मस्तिष्ककी जीवन प्रक्रियामें जड ( भौतिक ) जगत्का प्रतिबिम्ब ही ‘प्रत्यय’ ( कौन्शसनेस ) है।”
६१२ मार्क्सवाद और रामराज्य आश्चर्य है कि इस विज्ञानके युगमें जब कि सूक्ष्म-से-सूक्ष्म वस्तुओकी खोज हो रही है, तब भी मन-जैसी सूक्ष्मवस्तुको जड स्थूल देहकी ही एक अवस्था माना जाता है । इसपर आगे पर्याप्त विवेचन किया जायगा कि मन दर्शन, श्रवण आदि इन्द्रियजन्य क्रियाओमे सहकारी सूक्ष्म देहसे भिन्न तत्त्वान्तर है । 'मनुष्यकी मानसिक क्रियाओंका विकास उसके सामाजिक कार्यकलापोंसे उद्भूत होता है । इसकी प्रक्रिया है—दर्शन, प्रेक्षण, अनुभूति, प्रतीति, ज्ञान ( Perception ) से विचारणा । विचारने एवं बोलनेकी क्षमता उत्पन्न होती है, सामाजिक श्रमकी प्रक्रियासे; जो ( सामाजिक श्रम ) कि मनुष्यका मूलभूत ( आधारभूत ) सामाजिक कार्य ( प्रवृत्ति ) है ।'' सामाजिक कार्य-कलापोका प्रभाव यद्यपि क्रियाओपर अवश्य पड़ता है, परन्तु एतावता प्रकाशस्वरूप बोध, जड, बाह्य वस्तुओ एवं उनकी जड़ क्रियाओका परिणाम नहीं हो सकता । “विचारनेमें हम उन प्रारम्भिक धारणाओंसे, जिनके अनुसार साक्षादिन्द्रिय- गम्य वस्तुएँ हैं—प्रारम्भकर कल्पनामयी धारणाओकी ओर आगे बढ़ते हैं । कल्पनामयी धारणाओका उद्गम है सामाजिक सम्बन्धोंके विकास तथा बाह्य प्रकृतिसे सम्बद्ध उत्पादनविषयक एवं अन्य प्रवृत्तियोंके विकाससे, जब कि मनुष्योके अज्ञान तथा असहायता जन्म देती है रहस्यमयी, इन्द्रजालमयी तथा स्वप्निक, मृगमरीचिकामयी काल्पनिक धारणाओको । मानसिक श्रम, मस्तिष्किक श्रम (दिमागी मेहनत) का भौतिक श्रमसे विभाजन काल्पनिक धारणाओसे ही प्रारम्भ होता है और फिर सैद्धान्तिक प्रवृत्तियोंका व्यावहारिक प्रवृत्तियोंसे सम्बन्धविच्छेद होता है; जिसमें कि सिद्धान्तकी सत्यसे दूर उड़ चलनेकी प्रवृत्ति हो जाती है । आदर्शवादी एवं भौतिकवादी दलोकी विचारपद्धतिके विरोधकी शाखाएँ ही नहीं, स्कन्ध भी यहींसे पृथक् होते हैं ।” वस्तुतः किन्हीं भी प्रवृत्तियोंमें ज्ञान ही मूल होता है । ज्ञानसे ही संघ या समाजका निर्माण होता है । स्थूल बाह्य-जगत्की अपेक्षा मन बहुत सूक्ष्म है । अतः मानसिक ज्ञान-विज्ञान तथा कल्पनामें एक ही भौतिक स्थूल प्रवृत्तियाँ आगे बढ़ी होती हैं, यह स्वाभाविक है । इतना ही क्यों, मन ही तो सबका मूल भी है । आदर्शवाद ‘काल्पनिक धारणाओका प्रयोग किसी न-किसी प्रकारकी वस्तुओ अथवा विचार-पद्धतियोकी सुव्यवस्थित दृष्टियोंके निरूपणमें ही किया जाता है । ये दृष्टियाँ या विचारपद्धतियाँ समाज-विकासकी विभिन्न अवस्थाओमें विभिन्न
मार्क्स और ज्ञान ६१३ सामाजिक वर्गोंद्वारा आविष्कृत होती हैं । आदर्शविषयक विकास समाजके भौतिक जीवनके विकासपर अवलम्बित है तथा आदर्शादि वर्गविशेषकी रुचियों या स्वार्थोंकी पूर्ति करते हैं । परन्तु इसके साथ-ही-साथ यह भी आवश्यक है कि आदर्शवाद ऐसा बनाया जाय कि वह बौद्धिक आवश्यकताओंकी भी पूर्ति कर सके । इसीके परिणामस्वरूप आदर्शवादोंके विकास तथा उनकी आलोचनामे निरन्तर वदतोव्याघात या विरुद्धताएँ रहा करती हैं और इसीलिये उसकी आलोचना भी की जाती है । इसीलिये आदर्शवादोंमें सत्य एव कल्पना-मृगमरीचिका दोनोंके तत्त्व साथ-साथ रहते हैं ।” वस्तुतः सूक्ष्मबोधतक बुद्धिके न पहुँचनेके कारण ही भौतिकवादियोंको बहुत-से निगूढ़ तत्त्वोंमें केवल कल्पना ही दृष्टिगोचर होती है । व्यवहारमे उच्च आदर्शके अनुसार देह-इन्द्रियादिकी प्रवृत्ति बनानेकी चेष्टा होती है, पर कभी-कभी बाह्य प्रवृत्तियाँ वहाँतक नहीं पहुँच पातीं । उन्हीं उच्च आदर्शोंको भौतिकवादी मृगमरीचिकातुल्य समझने लगते हैं । “आदर्शवादी मृगमरीचिकाओं; स्वप्नोंका उद्गम है समाजके उत्पादन- सम्बन्धोंसे, परन्तु वे इस उद्गम या स्रोतसे विदितरूपमें उद्भूत नहीं होतीं, परन्तु अविदित या अप्रतिभातरूपमें अनजाने या सहजरूपमें ही उद्भूत हो आती हैं । आदर्शवादियोंको यह ज्ञात ( पता ) तो रहता नहीं कि उनकी इन भ्रान्त स्वाप्निक धारणाओंका वास्तविक मूलस्रोत क्या है; वे सोचते हैं कि ‘हमने शुद्ध विचारकी पद्धतिसे इन्हें जन्म दिया ।’ और इसलिये आदर्शवादमें प्रतीपन ( उलट देने ) की प्रक्रियाका आगमन होता है, जिसके द्वारा वास्तविक सामाजिक सम्बन्धोंको काल्पनिक धारणाओंके प्रतिनिधि- रूपमें दिखलाया जाता है । अन्तमें, आदर्शवादी स्वप्न एक वर्गविशेषलक्षित प्रवञ्चनापद्धति ( धोखेकी पद्धति ) का निर्माण करते हैं ।” यह भी ‘अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते’ का ही उदाहरण है । सदा ही आत्मचालित स्थूल-सूक्ष्म देहके समान ही सम्पूर्ण जड़- जगत्की चेष्टाएँ अध्यात्मनियन्त्रित होती हैं—यही तथ्य है । सुतरा इनकी प्रवृत्तिका निर्धारण भी ज्ञान-विज्ञानके आधारपर ही होता है । “आदर्शवादी मृगमरीचिकाओंके ठीक विपरीत, लोग अपने व्यावहारिक प्रत्यक्ष क्रियाकलापों या प्रवृत्तियोंकी शृंखलामे सत्यकी खोज करते हैं । ऐसी खोजका प्रथम मूलस्रोत सामाजिक उत्पादनमें निहित है । उत्पादन-विषयकी प्रक्रियासे आविष्कृत धारणाओंसे प्राकृतिक विज्ञान ( नेचुरल साइंस ) उत्पन्न होते हैं, जो कि उत्पादनसे पृथक्कृत, विशिष्ट
६१४ मार्क्सवाद और रामराज्य गवेषणाका रूप ग्रहण करते हैं। यह कार्य कुछ विशिष्ट वर्गोंद्वारा किया जाता है और ये वर्ग अपने वर्ग-विशेषके आदर्शोंको विज्ञानोंमें घुसेड़ देते हैं । इसीके साथ सामाजिक विज्ञानोंका विकास होता है, जिसका मूल वर्ग-संघर्षमें प्राप्त अनुभवोंमें होता है और जो सामाजिक मामलोंके सामान्य व्यवस्थापन एवं नियन्त्रणके अन्तका काम देते हैं । परंतु शोषक-वर्गोंके हाथोंमें रहकर सामाजिक विज्ञान कभी भी प्राकृतिक विज्ञानोंके वैज्ञानिक स्तरको नहीं प्राप्त कर सकते ।” मार्क्सवादी सत्यकी खोजमें भी अपने वर्ग-संघर्षको ही घुसेड़नेका प्रयत्न करते हैं। वस्तुतः सत्यकी खोज-प्रमाणोंपर ही निर्भर होती है । प्रत्यक्ष प्रमाण नेत्र-श्रोत्रादि एव उनके सहायक सूक्ष्म-दूरवीक्षणयन्त्र काच आदिके द्वारा जैसे सत्यका पता लगता है, वैसा वर्णन करना विज्ञानका काम है । वस्तुस्थिति किसी आवश्यक क्रिया एव सघर्ष-विशेषसे सम्बन्ध रखनेके लिये बाध्य नहीं हो सकती । इसके अतिरिक्त जैसे नेत्रगम्य रूपकी खोज कानसे करनी व्यर्थ है, वैसे अनुमान या आगमगम्य बातोंकी खोज आँख-कानसे करनी व्यर्थ है । विज्ञान एवं समाजवाद “बोर्जुआई विज्ञानने जहाँ महान् वैज्ञानिक उन्नतियाँ प्राप्त की हैं, वहीं पूँजीवादी सम्बन्धोंने विज्ञानोंके विकासपर बन्धन (सीमाएँ) लगा दिये। समाजवादके अधीन जहाँ विज्ञानका जनताकी सेवाके लिये विकास किया जाता है, ये बन्धन दूर कर दिये जाते हैं । विशेषतः समाजवादके लिये मजदूर- वर्गके संघर्षके उदयके साथ समाजविज्ञान स्थापित हुआ है। समाजवादी समाजमे पुरानी आदर्शवादी मृगमरीचिकाएँ या स्वप्न नष्टमूल हो जाती हैं और एक विश्वव्यापी वैज्ञानिक आदर्शवाद अस्तित्वमें आने लगता है ।” यदि पूँजीपति अपने स्वार्थ-साधनके लिये विज्ञानका विकास करना चाहते हैं तो मार्क्सवादी भौतिकवादतक ही उसे सीमित रखना चाहते हैं । अपने मतके विरुद्ध तथ्य निकालनेवाले वैज्ञानिकोको फाँसीतककी सजा रूसमे दी गयी है, अगर सत्यकी खोज विज्ञानका लक्ष्य है, तो भी जैसा भी सत्य हो और जैसे उपलब्ध होता हो, वैसा ही प्रयत्न वैज्ञानिक प्रयत्न है । सत्य “सत्यका अर्थ होता है धारणाओ एवं वस्तुगत सच्चाईकी समन्विति । ऐसी समन्विति बहुधा केवल आंशिक एवं प्रायिक (लगभग) ही होती है । हम जिस सत्यताको स्थापित कर सकते हैं, वह सर्वदा सत्यके अन्वेषण एव अभिव्यञ्जनके हमारे साधनोंपर अवलम्बित रहती है, परंतु इसीके साथ धारणाओं- की सत्यता, यहाँके अर्थमें आपेक्षिक ही सही, उन वस्तुगत तथ्योंपर आधारित रहती है जिनके साथ धारणाओंकी समन्विति है । हम कभी भी सम्पूर्ण, समग्र विशुद्ध सत्यताको प्राप्त कर ही नही सकते, परंतु सदा उस ओर बढ़ते जा रहे हैं ।”
मार्क्स और ज्ञान ६१५ ठीक है, जिसके मतमें मनुष्य एव उसका ज्ञान-विज्ञान सब जडभूत- का ही परिणाम है और अभी विकास ही हो रहा है, वह परम सत्यके सम्बन्धमें इससे अधिक कह ही क्या सकता है ? परंतु अध्यात्मवादी इससे सहमत नहीं होता; क्योंकि वह तो सर्वदा सर्वशक्तिमान् परमेश्वरसे विश्वका निर्माण मानता है । उसीके द्वारा विश्वका निर्धारण एवं संचालन होता है । उस दृष्टिसे सत्य त्रिकालाबाध्य है, पर मार्क्सवादी किसी भी सर्वसम्मत तर्क या सिद्धान्त तथा सत्यको नहीं मानते; इसलिये सब सत्योंको भी अपूर्ण ही कहते हैं । ज्ञानका मूल "ज्ञान वस्तुगत सत्यताकी यथासम्भव निर्दुष्ट प्रतिच्छायाओके रूपमें प्रतिष्ठापित एवं परीक्षित मान्यताओं, दृष्टियो एव प्रस्तावनाओंका योग है । यह निश्चितरूपसे एक सामाजिक उपज है, जिसकी जड़ें सामाजिक व्यवहारोंमें हैं, जिन्हें व्यावहारिक आशाओ एवं अपेक्षाओंकी पूर्तिद्वारा परीक्षित एवं संशोधित कर लिया जाता है । सभी ज्ञानोका प्रारम्भ उन इन्द्रियानु- भूतियोमें निहित है, जिनकी विश्वसनीयता मनुष्यके व्यवहारोंमें सिद्ध है । ज्ञान कभी भी सम्पूर्ण या अन्तिम नहीं हो सकता, परंतु उसका सर्वदा विस्तृत एवं आलोचित होते रहना आवश्यक है ।" वस्तुतः नित्य ज्ञान ही सबका मूल है, उसका मूल कोई नहीं । अनित्य-ज्ञान विषयों एव इन्द्रियोंके सन्निकर्षसे अन्तःकरण-वृत्तिरूप ज्ञान उत्पन्न होता है । वह भी ज्ञान तभी बनता है, जब उसमें नित्य-बोधका प्रतिबिम्ब पड़ता है । सामान्यतया क्रियाएँ ज्ञानके प्रतिफल भले ही हों, परंतु ज्ञान क्रियाओका फल नहीं हो सकता । जड वायु, जल एवं अग्निमें अनेक प्रकारकी क्रियाएँ होती हैं, उन्हें अन्तर्यामी चेतनसे प्रेरित तो कहा जा सकता है, परंतु उन क्रियाओंके द्वारा उनमें कोई ज्ञान नहीं उत्पन्न होता । 'ज्ञायते अनेनेति ज्ञानम्' इस व्युत्पत्तिसे ज्ञान शब्दका अन्तःकरण-वृत्ति अर्थ है । परंतु 'ज्ञप्तिर्ज्ञानम्' इस व्युत्पत्तिसे स्फुरणमात्र ही ज्ञानपदार्थ है । ज्ञानमें क्रिया और स्फुरण दो अंश हैं । जानातिके 'तिङ्'का अर्थ चिदाभास है, धात्वर्थ क्रिया है । दोनोंको मिलाकर ही 'जानाति'का व्यवहार होता है । चैतन्य प्रतिबिम्बयुक्त बुद्धिकी घटादिवृत्ति चैतन्यसे व्याप्त होती है; इसीलिये बुद्धिवृत्तिमें ही ज्ञानकी भ्रान्ति होती है। आरोपित सर्वदृश्यका भासक होनेसे ब्रह्ममें ही ज्ञानता मुख्य है। प्रत्ययकारिता बुद्धिके साक्षीमे अध्यस्त होनेसे साक्षीमें भी भासकत्वकी कल्पना होती है, वस्तुतः है वह भानस्वरूप ही । बुद्धिकर्तृक सभी प्रत्यय चैतन्यखचित ही उत्पन्न होते हैं, इसी आधारपर 'ज्ञानं क्रियते' (ज्ञान किया जाता है) यह व्यवहार होता है। जैसे बुद्धिके पहले अनवच्छिन्नबोध कूटस्थ है, वैसे ही बुद्धि उत्पन्न होनेपर भी वह बोध निष्किय
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ही रहता है; इसीलिये श्रुतियाँ द्रष्टाकी स्वरूपभूता दृष्टिका सर्वथा अविपरिलोप ही बतलाती हैं— न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते । (बृहदारण्यकोपनिषद् ४।३।२३) आलोचन-सङ्कल्प-अभिमानादिकरण व्यापार बुद्धिमे उपसंक्रान्त होकर बुद्धिके अध्यवसायरूप व्यापारके साथ उसी तरह एक व्यापारवान् हो जाते हैं, जैसे अपनी सेनाके साथ ग्रामाध्यक्षादिकी सेना सर्वाध्यक्षकी ही हो जाती है । वेदान्त-मतानुसार सूक्ष्म पञ्चभूतोंके समष्टि सात्त्विक अंशोंसे मन या अन्तःकरण उत्पन्न होता है । व्यष्टि सात्त्विक अंगोसे श्रोत्रादि पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ- उत्पन्न होती हैं और चित्त, अहङ्कार, बुद्धि सब उसी मन या अन्तः करणकी ही वृत्तियाँ हैं, जैसे लोहपिण्डमें स्वतः दाहकत्व न होनेपर भी वह्निके साथ तादात्म्यसम्बन्ध होनेसे लोहपिण्डमें दाहकत्व होता है, उसी तरह भौतिक अन्तः- करण यद्यपि जड है, उसमें प्रकाशकत्व नहीं है, फिर भी स्वप्रकाश आत्मचैतन्यके तादात्म्याध्यास-सम्बन्धसे उसमें भी चैतन्यका उपलब्ध होने लगता है । स्वप्रकाश अखण्डबोध आत्मा ही मुख्य-ज्ञान है, उसीके प्रकाशसे मन अन्तःकरण आदिमें भी प्रकाश व्यक्त होता है । अनन्त आकाशस्वरूप बोधात्मक ब्रह्म ही उपाधिभेदसे विभिन्न ज्ञानोंके रूपमे भासित होताहै, जैसे घटादि उपाधि-भेदसे घटाकाश आदिका भेद प्रतीत होता है । जहाँ विषयावच्छिन्न चैतन्यका प्रमातृचैतन्यके साथ अभेद होता है, वहाँ अपरोक्ष-ज्ञान होता है । जहाँ प्रमातृचैतन्यसे विषयचैतन्यका भेद विद्यमान रहता है, वहाँ प्रमाणके बलसे केवल परोक्ष ज्ञान होता है । इसलिये अनुव्यवसायको विशिष्ट विषय बनानेके लिये सामान्य-विशेषविषयक ही इन्द्रियोको मानना चाहिये । ‘योगभाष्यकार’का भी यही कहना है— न च तत्सामान्यमात्रग्रहणाकारम्, कथमनालोचितः, विषयविशेष इन्द्रियेण मनसानुव्यवसीयेत । (योगभाष्य ३।४७) कुछ लोग कहते हैं आलोचन-ज्ञान सामान्यज्ञान विषयको ग्रहण करता है; किंतु मन विशिष्टविषयको ग्रहण करता है । परंतु यह ठीक नहीं, वस्तुतः इन्द्रिय- जन्य आलोचन अविविक्त सामान्यविशेषको ग्रहण करता और अनुव्यवसाय-ज्ञान विविक्त सामान्यविशेषको ही ग्रहण करता है इसीलिये ‘योगवार्तिक’में कहा गया है— निर्विकल्पकबोधेऽपि द्वयात्मकस्यापि वस्तुनः । ग्रहणं लक्षणाख्येयं ज्ञात्रा शुद्धं तु गृह्यते ॥ निर्विकल्पकज्ञान सामान्यमात्रको ही नहीं ग्रहण करता; क्योकि उसमें विशेष- का भी प्रतिभास होता है । इसी तरह विशेषमात्रका ही ग्रहण होता है, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि उसमें सामान्याकारका भी भान होता है, किंतु सामान्य- विशेष—दोनोंहीका ग्रहण करता है,परंतु ‘यह सामान्य है, यह विशेष’ इस तरह विवेचन-
पूर्वक ग्रहण नहीं होता है; क्योंकि कालान्तरका अनुसंधान नहीं होता । जैसे ग्रामाध्यक्ष कुटुम्बियोंसे कर लेकर विषयाध्यक्षको अर्पण करता है, विषयाध्यक्ष सर्वा- ध्यक्षको, सर्वाध्यक्ष भूपतिको कर समर्पण करता है; इसी तरह बाह्येन्द्रिय विषयोंका आलोचन करके मनको अर्पण करती है, मन संकल्प करके अहंकारको अर्पण करता है, अहंकार उसका अभिमान करके अर्थात् संवेदन और स्मृतियोंके समूहको आत्मीयत्वेन ग्रहण करके अर्थात् बाह्येन्द्रियोपलब्ध क्षणिक संवेदन एवं स्मृतियोंको संग्रथित करके सर्वाध्यक्षभूता बुद्धिको समर्पण करता है; इस तरह सभी करण बुद्धिमें अर्थ समर्पण करके पुरुषको अर्थ-प्रकाश कराते हैं। विकास "ज्ञान, जब हम वस्तुओंके साथ सक्रिय सम्बन्धोंमें आते हैं, तब प्राप्त होता है और प्रतीतिसे निर्णयकी ओर विकसित होता है । ज्ञानका विकास प्रत्ययात्मकसे उपपत्त्यात्मक ( युक्तिपूर्ण सिद्धि ) तक, वस्तुओंके रूप-रङ्ग आदिके केवल बहिरङ्ग (ऊपरी-ऊपरी) निर्णयोंसे उनके आवश्यक गुण-धर्मों, पारस्परिक संयोगों तथा नियमोंके विषयमें तर्कपूर्ण निष्कर्षोंतकके मार्गपर होता है । इस प्रकार हम बाह्य ( वस्तुमय ) संसारका उत्तरोत्तर अधिक पूर्ण एवं गम्भीर ज्ञान प्राप्त करते चलते हैं । प्रत्येक अवस्थामें हमारा ज्ञान सीमित है । पर वह इन सीमाओंको जीतता हुआ प्रगति कर रहा है, करता जा रहा है ।" बुद्धिवृत्तिरूप ज्ञानोंका विकास ही नहीं, किंतु ह्रास भी होता है। कोई प्राणी ज्ञान- साधनोंसे ज्ञानार्जन, ज्ञान विकास करता है, किंतु प्रमादसे वह उत्पन्न ज्ञान भी नष्ट हो जाता है । आजके पुरातत्त्ववेत्ता तो यह भी कहते हैं- 'प्रथम ज्ञान अत्यन्त विकसित था, परन्तु अब वह संकुचित हो गया है।' पर वेदों, पुराणों, भारतादि ग्रन्थोंको पढ़नेसे मालूम होगा कि आज पहलेकी अपेक्षा सभी क्षेत्रोंमें ज्ञानका संकोच हो गया है । नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा तो चित् नित्य स्वप्रकाश ही है । उसके विकासका प्रश्न ही नहीं उठता । आवश्यकता एवं स्वतन्त्रता "युक्तिपूर्ण या उपपत्त्यात्मक ज्ञान वस्तुओंकी 'आवश्यकताओं' का उद्घाटन करता है और यह भी बतलाता है कि आवश्यकताका महत्त्व सर्वदा काकतालीय ( ऐक्सिडेण्टल ) से ही विदित होता है । ज्ञानकी प्राप्ति ( Acquisition ) से हमें स्वतन्त्रता मिलती है, जो आवश्यकता- के ज्ञानपर आधारित आत्मनियन्त्रण एवं बाह्यप्रकृति-नियन्त्रणके ही रूपमें है । हम उस समय स्वतन्त्र हैं, जब ज्ञानके आधारपर निश्चित करते हैं कि 'क्या करें' और अपने उद्देश्यकी पूर्तिको प्रभावित करनेवाले विदित विषयोंपर जान-बूझकर नियन्त्रण करनेका प्रयत्न करते हैं ।"
६१८ मार्क्सवाद और रामराज्य भौतिक, औपपत्तिक, आगमिक, आनुमानिक, प्रत्यक्षात्मक, संशयात्मक या विपर्ययात्मक—ये सभी ज्ञान बुद्धि अथवा मनके तत्तत्साधनोंसे होनेवाले परिणामविशेष हैं। इन सभीमें स्फुरण, स्फूर्त्ति या बोध समानरूपसे होता है। ज्ञानके अनुसार क्रिया होती है, ज्ञानसे भ्रमात्मक बन्धन भी कटते हैं तभी स्वतन्त्रता मिलती है। वैसे पूर्ण स्वतन्त्रता तो नित्य ज्ञानसे ही होती है। आवश्यकताकी प्रतीतिके साथ असाधारण सम्बन्ध रहता है । आत्मनियन्त्रण या बाह्य प्रकृतिपर नियन्त्रण स्वतन्त्रताकी मंजिल है, सम्पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं। अन्योपर नियन्त्रण शासन कहलाता है, आत्मगत स्वतन्त्र नियन्त्रणादि ही स्वतन्त्रता है । यह भौतिक- वादीके लिये आकाशकुसुम-तुल्य ही है । स्वतन्त्रताका अवबोध मार्क्सवादी कहते हैं कि “जनता जन्मतः ही स्वतन्त्र नहीं उत्पन्न होती, परंतु शनैः-शनैः स्वतन्त्रता उपार्जित कर लेती है । स्वतन्त्रता प्रकृतिपर प्रभुत्व प्राप्त करनेके लिये किये जानेवाले संघर्ष एव वर्गसंघर्षद्वारा उपार्जित एव विकसित की जाती है । समाजमें विभिन्न वर्गोंद्वारा वस्तुतः उपार्जित एव अधिकृत स्वतन्त्रता एव उस स्वतन्त्रताके बन्धन तत्तद्वर्गोंकी स्थिति एव उद्देश्योके अनुसार स्थूलतः एवं स्पष्टतः विभिन्न होते हैं । साररूपमें, स्वतन्त्रताका संघर्ष जनताका अपनी निजी आवश्यकताओकी पूर्ति या संतुष्टि करनेमें समर्थ हो जानेका संघर्ष है । मनुष्यजाति पशुस्थितिसे उठकर स्वतन्त्रताके अवबोधकी उस राजमार्गपर अनवरत गतिसे प्रगति कर रही है जो कि वर्गवादी समाजकी ओर ले जाता है । स्वतन्त्रताके विकासकी सीढियाँ नैतिकता ( चरित्र या सदाचार ) के विकासकी भी सीढियाँ हैं ।” पर स्वतन्त्रताका अवबोध भौतिकवादमें सम्भव ही नहीं । मनुष्य स्वतन्त्रताका उपार्जन करता है, फिर भी प्रभुत्व प्राप्त करना चाहता है, शासन- शक्ति प्राप्त करना चाहता है । पराधीनताराहित्य ही स्वतन्त्रता है । यह देहधारी पराधीन जीवके लिये सापेक्ष ही होती है । यो तो बकरीके गलेसे रस्सी खुल जानेपर बकरी भी स्वतन्त्र कही जा सकती है । परंतु यह स्वतन्त्रता कितनी है ? बहुत छोटी-सी मंजिल है । वस्तुतः देह-इन्द्रिय-मन-बुद्धि आदि कार्यकारण-संघटन- सम्पर्कजनित आत्मनिष्ठ पारतन्त्र्यकी निवृत्ति ही स्वतन्त्रता है । तदर्थ ही विविध क्रियाओ एव ज्ञानोकी आवश्यकता होती है । आत्मा नित्य अखण्ड बोधरूप है । उसमें ही अनात्माका अध्यास एव तन्मूलक ही भ्रमात्मक बन्धन होता है । क्रियाओ, ज्ञानो एवं अन्तिम परम तत्त्व-विज्ञानसे इस बन्धनकी पूर्णतया निवृत्ति होती है, उसे ही मोक्ष कहा जाता है । उसके पहले भी जिसमे जितना अधिकाधिक ज्ञान-क्रिया-शक्ति व्यक्त होती है, उतनी ही उसमें स्वतन्त्रता एवं
शासनशक्ति व्यक्त होती है। सङ्घर्ष जब विजयका जनक होता है, तब स्वतन्त्रता एव शासन-शक्तिका कारण बनता है। जब पराजयका कारण होता है, तब परतन्त्रताका भी कारण होता है। मार्क्सवादका 'वर्गसङ्घर्ष' तो काकतालीयन्यायसे कहीं ही स्वतन्त्रताका कारण हो सकता है। अन्यथा तो अनर्थका ही कारण होता है, वस्तुतः वर्गसङ्घर्ष मिटाकर वर्गप्रेम फैलाकर एक वर्गको दूसरे वर्गका पोषक बनानेसे ही अधिकांशमें अनर्थ-निवृत्ति एवं स्वतन्त्रता-प्राप्ति होती है। समन्वय- सामञ्जस्यकी स्थापनासे ही निराकुल समाज स्वधर्मनिष्ठा तथा उपासनाके द्वारा मनकी एकाग्रताका सम्पादन करके श्रवण-मनन-निदिध्यासन-क्रमसे परम तत्त्वका साक्षात्कार करके सर्वबन्धनविमुक्त होकर पूर्ण स्वतन्त्रता भी प्राप्त कर सकता है। आवश्यकताओकी पूत्ति एव सतुष्टि भी विचार एव सयमसे ही हो सकती है, केवल सङ्घर्षसे नहीं। जैसे घृतकी आहुतिसे अग्निका प्रज्वलन बढता ही जाता है, उसी तरह वस्तुओंकी प्राप्ति एवं संघर्षसे भी उत्तरोत्तर असंतुष्टि बढती जाती है। तृष्णा—कामनाका कभी अन्त नहीं होता। 'जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई' के अनुसार जैसे-जैसे लाभ बढता है, वैसे-वैसे तृष्णा भी बढती है— न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मैव भूय एवाभिवर्धते ॥ (मनु० २। ९४, विष्णुपु० ४। १०। २३; लिङ्गपु० ६७। १७, महा० १। ७५।५७) अभीष्ट पदार्थोंके उपभोगसे काम कभी भी प्रशान्त नहीं होता; किंतु घृताहुतिसे अग्नि-ज्वालाके समान वह उत्तरोत्तर बढ़ता ही जाता है। रामराज्यके अनुसार सङ्घर्षके स्थानपर समन्वय अपनानेसे ही सर्वत्र सुख-शान्ति सम्भव होती है— सब नर करहिं परस्पर प्रीती । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ॥ भारतीय दर्शनमें ज्ञान-सिद्धान्त 'कांट'के भी अनुभव और ज्ञान—दोनोंका भेद सिद्ध नहीं हो सकता। भारतीय दर्शनोंके अनुसार अनुभवके ही भ्रम और प्रमा—ये दो भेद होते हैं। उसे ही ज्ञान भी कहते हैं। 'सर्वव्यवहारहेतुर्गुणो बुद्धिर्ज्ञानम्' अर्थात् आहार-विहार, शब्द- प्रयोगादि सभी व्यवहारोका असाधारण कारण गुण ही बुद्धि है, वही ज्ञान भी है। ज्ञानके बिना कोई भी व्यवहार नहीं बन सकता, यह स्पष्ट ही है। शब्द-वाक्यादि प्रयोग भी बिना ज्ञानके नहीं बनता। घटादिका दण्डादि कारण सर्वव्यवहारका कारण नही है। कालादि सर्वकारण होते हुए भी असाधारण कारण नहीं है। इसीलिये बुद्धि या ज्ञानका यह लक्षण दण्डादि एव कालादिमें अतिव्याप्त नहीं है। वह बुद्धि या ज्ञान दो प्रकारका है—एक स्मृति और दूसरा अनुभव। इनमें संस्कारमात्र- जन्य ज्ञान 'स्मृति' कही जाती है और स्मृतिभिन्न ज्ञान अनुभव है। अनुभव भी