भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 378, कुल 866 में से

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पृष्ठ 378

शासनशक्ति व्यक्त होती है। सङ्घर्ष जब विजयका जनक होता है, तब स्वतन्त्रता एव शासन-शक्तिका कारण बनता है। जब पराजयका कारण होता है, तब परतन्त्रताका भी कारण होता है। मार्क्सवादका 'वर्गसङ्घर्ष' तो काकतालीयन्यायसे कहीं ही स्वतन्त्रताका कारण हो सकता है। अन्यथा तो अनर्थका ही कारण होता है, वस्तुतः वर्गसङ्घर्ष मिटाकर वर्गप्रेम फैलाकर एक वर्गको दूसरे वर्गका पोषक बनानेसे ही अधिकांशमें अनर्थ-निवृत्ति एवं स्वतन्त्रता-प्राप्ति होती है। समन्वय- सामञ्जस्यकी स्थापनासे ही निराकुल समाज स्वधर्मनिष्ठा तथा उपासनाके द्वारा मनकी एकाग्रताका सम्पादन करके श्रवण-मनन-निदिध्यासन-क्रमसे परम तत्त्वका साक्षात्कार करके सर्वबन्धनविमुक्त होकर पूर्ण स्वतन्त्रता भी प्राप्त कर सकता है। आवश्यकताओकी पूत्ति एव सतुष्टि भी विचार एव सयमसे ही हो सकती है, केवल सङ्घर्षसे नहीं। जैसे घृतकी आहुतिसे अग्निका प्रज्वलन बढता ही जाता है, उसी तरह वस्तुओंकी प्राप्ति एवं संघर्षसे भी उत्तरोत्तर असंतुष्टि बढती जाती है। तृष्णा—कामनाका कभी अन्त नहीं होता। 'जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई' के अनुसार जैसे-जैसे लाभ बढता है, वैसे-वैसे तृष्णा भी बढती है— न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मैव भूय एवाभिवर्धते ॥ (मनु० २। ९४, विष्णुपु० ४। १०। २३; लिङ्गपु० ६७। १७, महा० १। ७५।५७) अभीष्ट पदार्थोंके उपभोगसे काम कभी भी प्रशान्त नहीं होता; किंतु घृताहुतिसे अग्नि-ज्वालाके समान वह उत्तरोत्तर बढ़ता ही जाता है। रामराज्यके अनुसार सङ्घर्षके स्थानपर समन्वय अपनानेसे ही सर्वत्र सुख-शान्ति सम्भव होती है— सब नर करहिं परस्पर प्रीती । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ॥ भारतीय दर्शनमें ज्ञान-सिद्धान्त 'कांट'के भी अनुभव और ज्ञान—दोनोंका भेद सिद्ध नहीं हो सकता। भारतीय दर्शनोंके अनुसार अनुभवके ही भ्रम और प्रमा—ये दो भेद होते हैं। उसे ही ज्ञान भी कहते हैं। 'सर्वव्यवहारहेतुर्गुणो बुद्धिर्ज्ञानम्' अर्थात् आहार-विहार, शब्द- प्रयोगादि सभी व्यवहारोका असाधारण कारण गुण ही बुद्धि है, वही ज्ञान भी है। ज्ञानके बिना कोई भी व्यवहार नहीं बन सकता, यह स्पष्ट ही है। शब्द-वाक्यादि प्रयोग भी बिना ज्ञानके नहीं बनता। घटादिका दण्डादि कारण सर्वव्यवहारका कारण नही है। कालादि सर्वकारण होते हुए भी असाधारण कारण नहीं है। इसीलिये बुद्धि या ज्ञानका यह लक्षण दण्डादि एव कालादिमें अतिव्याप्त नहीं है। वह बुद्धि या ज्ञान दो प्रकारका है—एक स्मृति और दूसरा अनुभव। इनमें संस्कारमात्र- जन्य ज्ञान 'स्मृति' कही जाती है और स्मृतिभिन्न ज्ञान अनुभव है। अनुभव भी

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