मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२० मार्क्सवाद और रामराज्य
यथार्थ एव अयथार्थ—इस तरह दो प्रकारका होता है। तद्वान्में तत्प्रकारक ज्ञान 'यथार्थ' ज्ञान है। जैसे रजतमें रजतज्ञान और अतद्वान्में तत्प्रकारक ज्ञान 'अयथार्थ' है। जैसे शुक्तिमें रजत-ज्ञान यथार्थानुभव या प्रमा, प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्दादि- भेदसे अनेक मतोके अनुसार अनेक प्रकारका होता है। यथार्थानुभव या प्रमाके व्यापारवान् असाधारण कारणोको 'प्रमाण' कहा जाता है। अयथार्थानुभव भी संशय, विपर्यय एवं तर्कभेदसे तीन प्रकारका होता है—एक धर्मीमें विरुद्ध नानाधर्म- वैशिष्ट्यबोधक ज्ञान 'संशय' है, जैसे कि 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' अर्थात् वह स्थाणु है या पुरुष । मिथ्याज्ञान 'विपर्यय' है, जैसे कि शुक्तिमें रजत-ज्ञान । व्याप्यके आरोपसे व्यापकका आरोप तर्क है, जैसे कि यदि वह्नि न होगा तो धूम भी नहीं होगा। यहाँ वह्निके अभावरूप व्याप्यके आरोपसे धूमाभावरूप व्यापकका आरोप किया जाता है। स्मृति भी प्रमाजन्य यथार्थ और अप्रमाजन्य अयथार्थ होती है। सांख्यमतानुसार प्रकृतिका परिणाम बुद्धि स्वतन्त्र पदार्थ है। महत्तत्त्व या बुद्धि अव्यक्ततत्त्वसे उत्पन्न होती है। महत्तत्त्व अर्थात् बुद्धिसे अहंकारकी उत्पत्ति होती है, बुद्धिद्वारा अध्यवसित निश्चित विषयमें 'मै अधिकृत हूँ' इस प्रकारका अभिमान करनेवाला अहंकार है । उसी तरह अहकारसे मन उत्पन्न होता है। इन्द्रियके द्वारा सम्बुद्धाकार पदार्थका संकल्प-विकल्प करना मनका काम है। पहले आलोचनात्मक ज्ञान होता है, उसके बाद सविकल्प ज्ञान होता है। इन्द्रियोके द्वारा मनोव्यापारके पहले प्रतिपत्ताको प्रथम अविकल्पित वस्तुमात्रका ही ग्रहण होता है। उस समय सामान्य-विशेषरूपसे अनाकलित और अविविक्त विषयका ही ग्रहण होता है। प्रतिपत्ता मनके व्यापारसे फिर सामान्य-विशेषरूपसे वस्तुकी विकल्पना करता है। यह सांख्यो तथा भट्टपाद कुमारिल आदिकोको सम्मत है। 'प्रथमं सविकल्पकप्रत्ययात् पुरा यद्वस्तुमात्रगोचरं बालमूकादिविज्ञान- समानं निर्विकल्पज्ञानमस्ति, तत्प्रतीति सिद्धमालोचनात्मकं ज्ञानमभ्युपेयम्, तदभावे सविकल्पज्ञानानुपत्तेः ।' निर्विकल्पक ज्ञानके उपरान्त बुद्धिके द्वारा नीलत्व घटत्वादिरूपसे विविक्त होकर जो गृहीत होता है, वही सविकल्पक ज्ञान है। एतावता केवल इन्द्रियसे उत्पन्न ज्ञान निर्विकल्पक एवं इन्द्रियसहकृत मनसे उत्पन्न ज्ञान सविकल्पकज्ञान है। प्रभाकरके मतानुसार स्वप्रकाशज्ञान विषयरूपसे घटादिका प्रकाश करता है और आश्रयत्वेन आत्माका प्रकाशक होता है। अतः 'अहं जानामि' इस अंशमे अहं रूपसे आत्मा ही भासमान होता है। 'अहं' यह अनात्मा नहीं है। कहा जाता है कि "जैसे 'अयो दहति' (लोहपिण्ड दहन करता है) यहाँ वस्तुतः लौहपिण्डमें जैसे स्वतः दाहकत्व नहीं होता, वैसे ही 'अहं' में भी स्वतः ज्ञातृत्व नही हो सकता ।" परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योकि शीतल लौहपिण्ड और दीप-ज्वालात्मक