मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदग्धा—दोनो जिस प्रकार विविक्तरूपसे उपलब्ध होते हैं, उस प्रकार अहकार और ज्ञाताका कही भी विवेकेन उपलब्ध नहीं हो सकता । इसलिये आत्मा अहकारास्पद है । वही सवित्का आश्रय होनेसे अपरोक्ष है । सांख्यवादी जड अन्तःकरणमें चित् प्रतिबिम्बको देखकर उसके कारणभूत तादृशबिम्बकी कल्पना वैसे ही करते हैं, जैसे दर्पणस्थ प्रतिबिम्बके आधारपर मुखका अनु- मान किया जाता है । परंतु इन पक्षोमें यदि आत्मा नित्यानुमेय है तो अपरोक्षाव- भास विरुद्ध है । नैयायिक आत्माको मानस प्रत्यक्षका विषय मानते हैं । मनका अन्वय-व्यतिरेक विषयानुभवसे ही गतार्थ हो जाता है । वस्तुतः विषयानुभवके आश्रयरूपसे जब आत्माकी सिद्धि हो सकती है, तब पृथक् आत्म विषयक ज्ञान मानना व्यर्थ ही है । भट्टपादके मतानुसार आत्मा प्रत्यक्ष होनेसे घटवत् ज्ञानका विषय है । एक- हीमें कर्म कर्तृविरोध होता है । परंतु यहाँ तो द्रव्यांशमें प्रमेयता और बोधांशमें प्रमातृत्ता है । उसमें भी प्रमेय-अंशमें प्रधानता और प्रमाता-अंशमें अप्रधानता रहती है । प्रभाकर इस पक्षका भी विरोध करते हैं । उनके मतानुसार अचेतन द्रव्याशको आत्मा नही कहा जा सकता । यदि बोधाशको ही कर्म कहा जाय तो कर्म-कर्तृविरोध होगा । बोध समकालमें ही प्रमेयरूपसे और प्रमातारूपसे परिणत हो नहीं सकता; क्योकि वह नित्य है। यदि प्रधान आदिके समान वह परिणत हो, तो भी प्रमातृभागके स्वप्रकाश होनेसे सवित्के आश्रयरूपसे वह प्रतीत न हो सकेगा । ऐसी स्थितिमे अपसिद्धान्त भी होगा । विषयरूपसे प्रतीत होनेपर घटादिके समान प्रमातामे भी अनात्मताकी प्रसक्ति होगी । इसलिये सवित् आश्रयरूपसे ही आत्माका एव सवित्के विषयरूपसे घटादिका प्रत्यक्ष मानना चाहिये । प्रमिति स्वसत्तामें कभी भी अवेद्य होकर नहीं रहती । उपर्युक्त प्रकारसे प्रभाकरका ज्ञान या सवित् स्वप्रकाश है । भट्टपादके अनुसार विषय प्राकट्यरूप ही बोध उत्पन्न होता है। बौद्धोका क्षणिक विज्ञान स्वतन्त्र है। उनमें सौत्रान्तिक ज्ञानमें विषयप्रतिबिम्ब देखकर उसके आधारपर और प्रति- विम्ब बिम्बपूर्वक होता है, इस आधारपर ज्ञाननिष्ठ विषय प्रतिबिम्बके बलपर बिम्ब- रूप सत्य-विषयका अनुमान करते हैं । विज्ञानवादी 'विज्ञानरूप ही विषय है', यह मानकर विषयोकी अपरोक्षता मानते हैं । नैयायिकलोग मनःसंयुक्त आत्मामें प्रमितिरूप ज्ञानकी उत्पत्ति कहते हैं। वे ज्ञानविषयक ज्ञान मानते हैं । 'अय घटः' यह ज्ञान व्यवसायात्मक होता है और 'ज्ञातो मया घटः' अथवा 'घटमह जानामि' इस आकारका ज्ञान अनुव्यवसायात्मक कहा जाता है । उत्तरोत्तर ज्ञानोसे पूर्व-पूर्व- ज्ञानोंका प्रामाण्य भी कहा जाता है। परंतु इस स्थितिमें पूर्व पूर्व ज्ञानोंका अज्ञान भी मानना पडेगा, तभी अज्ञान-निवर्त्तकरूपमे उत्तरोत्तर ज्ञानोकी सार्थकता हो सकती