मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१८ मार्क्सवाद और रामराज्य भौतिक, औपपत्तिक, आगमिक, आनुमानिक, प्रत्यक्षात्मक, संशयात्मक या विपर्ययात्मक—ये सभी ज्ञान बुद्धि अथवा मनके तत्तत्साधनोंसे होनेवाले परिणामविशेष हैं। इन सभीमें स्फुरण, स्फूर्त्ति या बोध समानरूपसे होता है। ज्ञानके अनुसार क्रिया होती है, ज्ञानसे भ्रमात्मक बन्धन भी कटते हैं तभी स्वतन्त्रता मिलती है। वैसे पूर्ण स्वतन्त्रता तो नित्य ज्ञानसे ही होती है। आवश्यकताकी प्रतीतिके साथ असाधारण सम्बन्ध रहता है । आत्मनियन्त्रण या बाह्य प्रकृतिपर नियन्त्रण स्वतन्त्रताकी मंजिल है, सम्पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं। अन्योपर नियन्त्रण शासन कहलाता है, आत्मगत स्वतन्त्र नियन्त्रणादि ही स्वतन्त्रता है । यह भौतिक- वादीके लिये आकाशकुसुम-तुल्य ही है । स्वतन्त्रताका अवबोध मार्क्सवादी कहते हैं कि “जनता जन्मतः ही स्वतन्त्र नहीं उत्पन्न होती, परंतु शनैः-शनैः स्वतन्त्रता उपार्जित कर लेती है । स्वतन्त्रता प्रकृतिपर प्रभुत्व प्राप्त करनेके लिये किये जानेवाले संघर्ष एव वर्गसंघर्षद्वारा उपार्जित एव विकसित की जाती है । समाजमें विभिन्न वर्गोंद्वारा वस्तुतः उपार्जित एव अधिकृत स्वतन्त्रता एव उस स्वतन्त्रताके बन्धन तत्तद्वर्गोंकी स्थिति एव उद्देश्योके अनुसार स्थूलतः एवं स्पष्टतः विभिन्न होते हैं । साररूपमें, स्वतन्त्रताका संघर्ष जनताका अपनी निजी आवश्यकताओकी पूर्ति या संतुष्टि करनेमें समर्थ हो जानेका संघर्ष है । मनुष्यजाति पशुस्थितिसे उठकर स्वतन्त्रताके अवबोधकी उस राजमार्गपर अनवरत गतिसे प्रगति कर रही है जो कि वर्गवादी समाजकी ओर ले जाता है । स्वतन्त्रताके विकासकी सीढियाँ नैतिकता ( चरित्र या सदाचार ) के विकासकी भी सीढियाँ हैं ।” पर स्वतन्त्रताका अवबोध भौतिकवादमें सम्भव ही नहीं । मनुष्य स्वतन्त्रताका उपार्जन करता है, फिर भी प्रभुत्व प्राप्त करना चाहता है, शासन- शक्ति प्राप्त करना चाहता है । पराधीनताराहित्य ही स्वतन्त्रता है । यह देहधारी पराधीन जीवके लिये सापेक्ष ही होती है । यो तो बकरीके गलेसे रस्सी खुल जानेपर बकरी भी स्वतन्त्र कही जा सकती है । परंतु यह स्वतन्त्रता कितनी है ? बहुत छोटी-सी मंजिल है । वस्तुतः देह-इन्द्रिय-मन-बुद्धि आदि कार्यकारण-संघटन- सम्पर्कजनित आत्मनिष्ठ पारतन्त्र्यकी निवृत्ति ही स्वतन्त्रता है । तदर्थ ही विविध क्रियाओ एव ज्ञानोकी आवश्यकता होती है । आत्मा नित्य अखण्ड बोधरूप है । उसमें ही अनात्माका अध्यास एव तन्मूलक ही भ्रमात्मक बन्धन होता है । क्रियाओ, ज्ञानो एवं अन्तिम परम तत्त्व-विज्ञानसे इस बन्धनकी पूर्णतया निवृत्ति होती है, उसे ही मोक्ष कहा जाता है । उसके पहले भी जिसमे जितना अधिकाधिक ज्ञान-क्रिया-शक्ति व्यक्त होती है, उतनी ही उसमें स्वतन्त्रता एवं